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दिल्ली मेरी दिल्ली: एलान बना आफत

ऐसा वादा करते वक्त शायद उन्हें ध्यान नहीं रहा कि हाल ही में उन्होंने पथरी का ऑपरेशन करवाया है। दिन बीतने के साथ ही उन्हें दोबारा दर्द शुरू हो गया और जैसे-तैसे उनका अनशन खत्म करवा के उनके समर्थक उन्हें अस्पताल ले गए।

Author May 7, 2018 4:26 AM
दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी (पीटीआई फाइल फोटो)

आनन-फानन में किसी भी तरह की घोषणा करना नेताओं की आदत सी बन गई है। पिछले दिनों इसी तरह की एक घोषणा दिल्ली भाजपा अध्यक्ष और भोजपुरी गायक मनोज तिवारी के लिए मुसीबत बन गई। भाजपा ने विपक्ष पर संसद न चलने देने का आरोप लगाकर देशभर में एक दिन का उपवास किया। तिवारी ने भी अपने संसदीय क्षेत्र के शास्त्री पार्क चौक पर समर्थकों के साथ उपवास रखा और लगे हाथ यह कह डाला कि शास्त्री पार्क चौराहे पर फ्लाईओवर बनाने में दिल्ली सरकार अड़ंगा लगा रही है और इसे बनाने की घोषणा होने तक वे आमरण अनशन करेंगे। ऐसा वादा करते वक्त शायद उन्हें ध्यान नहीं रहा कि हाल ही में उन्होंने पथरी का ऑपरेशन करवाया है। दिन बीतने के साथ ही उन्हें दोबारा दर्द शुरू हो गया और जैसे-तैसे उनका अनशन खत्म करवा के उनके समर्थक उन्हें अस्पताल ले गए। लेकिन यह संयोग भी अजीब रहा, इतने हो-हल्ले के बावजूद फ्लाईओवर बनाने का एलान नहीं हो पाया।
दूर होते साथी

पांच साल पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की और इतने कम समय में ही उनके ज्यादातर साथी उन्हें छोड़कर चले गए। 2015 में भारी बहुमत से दिल्ली में सरकार बनाने के बाद से उनके ग्रह ठीक नहीं चल रहे हैं। कायदे से तो लोग सत्ता के साथ जुड़ना चाहते हैं लेकिन असल में लोग उन्हें छोड़ते जा रहे हैं। हालांकि संसदीय सचिव मामले में केजरीवाल का संयोग ठीक था कि दिल्ली हाई कोर्ट ने बिना कानून बदले संसदीय सचिव बनाए गए 20 विधायकों की सीटों पर उपचुनाव पर रोक लगा दी, वरना कुछ और नेता उनका साथ छोड़ जाते। हालांकि इसके बावजूद केजरीवाल का साथ छोड़ने वालों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में लोकसभा का ही नहीं, दिल्ली का अगला चुनाव भी उनके लिए मुश्किल हो जाएगा।

तवज्जो की वजह
दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार और सूबे की नौकरशाही के बीच के रिश्ते किसी से छिपे नहीं हैं। मुख्य सचिव सहित ज्यादातर आला नौकरशाहों से मुख्यमंत्री व उनके मंत्रियों की ठनी रहती है, लेकिन एक अधिकारी ऐसे भी रहे जिन्होंने लड़ाई-झगड़े के इस माहौल में बीच-बचाव किया। एक तरह से उनको सरकार और अफसरों के बीच की कड़ी माना जाता था। वे अधिकारी थे संजीव नंदन सहाय, जिनका हाल ही में केंद्र सरकार में तबादला हो गया। सरकार के गुस्से का सामना उनको भी कई बार करना पड़ा, लेकिन वे अपनी व्यवहार कुशलता के दम पर सरकार में महत्त्वपूर्ण कुर्सी पर जमे रहे। सहाय का केंद्र सरकार में तबादला हो जाने के बाद कहा यही जा रहा है कि सरकार और नौकरशाही के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी टूट गई है। उनकी जगह लेने के लिए कोई भी दूसरा अफसर आगे आने को तैयार नहीं है और जिस तरह के हालात बने हुए हैं उसे देखते हुए यही माना जा रहा है कि विकास से संबंधित फाइलों को आगे बढ़ाने में और ज्यादा दिक्कतें पेश आएंगी। दिल्ली सरकार के एक पूर्व मुख्य सचिव ने कहा कि यह बात बिल्कुल सही है कि सहाय पर नाराज होने के बावजूद मुख्यमंत्री ने हमेशा उन्हें तवज्जो दी और ऐसा क्यों हुआ यह बात या तो मुख्यमंत्री जानते होंगे या खुद सहाय।

मन में फूटे लड्डू
रामलीला मैदान में कांग्रेस की जन आक्रोश रैली के सफल आयोजन की खबरों से खुश सूबे के कांग्रेसियों के बीच पिछले दिनों यह अफवाह तेजी से फैली कि दिल्ली कांग्रेस नेतृत्व में बदलाव होगा। बस, फिर क्या था कई नेताओं के मन में लड्डू फूटने लगे। दिलचस्प बात यह है कि मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन को हटाकर जिन नेताओं को दिल्ली की बागडोर सौंपने की बात हुई उनमें ज्यादातर 70 पार कर चुके हैं। पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तो 80 पार कर चुकी हैं। उनकी सरकार में मंत्री रहे डॉ अशोक कुमार वालिया व योगानंद शास्त्री की गिनती भी वरिष्ठों में की जाती है। कई अन्य नेताओं के नामों की चर्चा भी संभावित प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर हुई। इनमें से एक नेता ने कहा कि यह बात सच है कि उन्हें यह सुनकर अच्छा लगा कि उन्हें भी इस योग्य समझा गया है लेकिन यह बात भी उतनी ही सच है कि उन्हें ऐसा कोई पद नहीं मिलने वाला। दूसरी ओर जिन वरिष्ठ नेताओं के नाम की चर्चा हो रही है उनमें से भी किसी की भी किस्मत नहीं खुलने वाली। वजह यह है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मिशन 2019 की तैयारियों में जुटे हैं। हर प्रांत में युवाओं को पार्टी का चेहरा बनाया जा रहा है। दिल्ली में भी इसी आधार पर माकन को बागडोर सौंपी गई। अब लड्डू चाहे जिसके भी मन में फूटे लेकिन सच तो यही है कि दिल्ली में केजरीवाल और मनोज तिवारी को चुनौती देने के लिए 80 साल के नेताओं की नहीं, बल्कि युवा और योग्य नेता की जरूरत है। जाहिर है कि इस सांचे में माकन फिलहाल पूरी तरह फिट बैठते हैं।
-बेदिल

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