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जनसंख्या नियंत्रण को राह दिखाता असम

असम सरकार का कहना है कि इस मसले पर सार्वजनिक सुझाव लेने के बाद वह इसे विधानसभा में बहस के लिए पेश करेगी, जिसके लिए एक प्रस्ताव तैयार किया जाएगा। यह भाजपा के ‘विजन दस्तावेज’ में किया गया वादा है, जिससे राज्य के लोगों का दीर्घकालिक हित जुड़ा है।
Author July 20, 2017 04:48 am
असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल (फाइल फोटो)

जयप्रकाश पाडे

महात्मा गांधी ने जब कहा था, ‘धरती पर सबकी जरूरत भर का सामान है, मगर सबके लालच को पूरा करने भर का नहीं’, तब उन्हें आभास भी नहीं रहा होगा कि आने वाले समय में उन्हीं का देश जनसंख्या बढ़ोतरी से संत्रस्त हो जाएगा। आज स्थिति यह है कि तमाम कल्याणकारी योजनाएं उस रूप में जरूरतमंदों और आम जन तक पहुंच ही नहीं पा रही हैं, जिस रूप में उन्हें पहुंचना चाहिए। यहां तक कि अन्न से लेकर आरक्षण तक का लाभ भी जनसंख्या विस्फोट के कारण जरूरतमंदों के लिए नाकाफी साबित हो रहा है। यह अच्छी बात है कि देश के एक राज्य; असम ने जनसंख्या की समस्या को सबसे ठीक ढंग से समझा है और इससे निपटने की दिशा में वह गंभीर प्रयास कर रहा है। यह और बात है कि असम सरकार ने राज्य जनसंख्या नीति का जो मसविदा पेश किया है, उसे राष्ट्रीय मीडिया में यथोचित जगह नहीं मिली हालांकि देशहित में जगह मिलनी चाहिए थी। कोई एक राज्य अगर सार्थक पहल करता है और दूसरे राज्यों में भी अधिक से अधिक लोगों तक यह बात पहुंचती है तो एक माहौल तो बनता ही है, जिसका लाभ आखिरकार दूसरे राज्य के बाशिंदों को भी मिलता है।
असम सरकार के स्वास्थ्य मंत्री ने गुवाहाटी में जब जनसंख्या नीति की घोषणा की तब किसी को अनुमान नहीं था कि पूर्वोत्तर का यह राज्य दूसरे राज्यों के लिए उदाहरण बनने जा रहा है। पर जैसे-जैसे मसविदे के मुख्य बिंदुओं का खुलासा हुआ, स्थिति साफ हो गई। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा था, ‘हमने सुझाव दिया है कि राज्य में दो से अधिक बच्चे वाले लोग किसी भी सरकारी नौकरी के लिए पात्र नहीं होंगे। यही नहीं, इस शर्त को पूरा करने के बाद ही किसी भी व्यक्ति को नौकरी मिलनी चाहिए कि वह अपनी सेवा के अंत तक इसका पालन करेगा।’
असम सरकार के इस मसविदे में रोजगार दिलाने में मदद करने वाली योजनाओं के अलावा ट्रैक्टर और घर बनाने के लिए दी जाने वाली मदद और दूसरे सरकारी लाभों के लिए भी दो बच्चों के आदर्श को लागू करने की बात कही गई है। यही नहीं, राज्य चुनाव आयोग की देखरेख में संचालित होने वाले सभी चुनावों- जिनमें पंचायत, नगर निकाय और स्वायत्त परिषद के चुनाव भी शामिल हैं, में उम्मीदवारों के लिए इस आचार संहिता का अनुपालन जरूरी होगा।

मजे की बात यह है कि ‘भारत के करदाता संघ’ नामक एक समूह ने देश के आर्थिक विकास में करदाताओं के पैसे के उचित उपयोग के लिए लंबे समय से दो बच्चों की नीति अपनाने का अभियान चला रखा है। भारत की आबादी की बढ़ती रफ्तार को देखते हुए इसके चीन से आगे निकल जाने के अंदेशे के बीच इस संगठन का प्रयास है कि देश के सभी राज्य ‘दो-बालक नीति’ अपना लें, ताकि देश के समस्त संसाधनों और करदाताओं के पैसे का अच्छी तरह से उपयोग किया जा सके। इस दो साल पुराने अभियान के साथ मशहूर हस्तियों के साथ दो लाख से अधिक लोग जुड़ चुके हैं। अब समूह ने देश के सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख कर असम की तर्ज पर जनसंख्या नियंत्रण के लिए नीति बनाने को कहा है। दरअसल, असम सरकार के जनसंख्या नीति के इस मसविदे में राज्य में एक जनसंख्या परिषद और जनसंख्या अनुसंधान केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव भी है। सरकार का दावा है कि जनसंख्या नियंत्रण पर इस मसविदे में सुझाए गए उपायों पर अगर अमल किया गया तो राज्य की आबादी ही नहीं बल्कि दूसरे सभी आर्थिक मसलों को भी सुलझा लिया जाएगा। सरकारी नीतियां तेजी से जरूरतमंदों के पास पहुंचेंगी। राज्य सरकार का यह भी दावा है कि इस नीति का उद्देश्य सभी लड़कियों को विश्वविद्यालय स्तर तक मुफ्त शिक्षा मुहैया कराने के साथ ही छात्रावास शुल्क, परिवहन, किताबें और मेस में भोजन जैसी सभी सुविधाओं को निशुल्क बनाना है, ताकि छात्रों के स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाई जा सके। बाल विवाह को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य करार देने के साथ ही प्रस्तावित जनसंख्या नीति में लड़कियों के लिए शादी की कानूनी उम्र अठारह साल और लड़कों के लिए इक्कीस साल को बढ़ाने पर लोगों के बीच रायशुमारी कराने का भी जिक्र है। इससे न केवल जनसंख्या वृद्धि पर लगाम लगेगी, बल्कि महिलाओं के यौन शोषण को रोकने में भी मदद मिलेगी। इसके अलावा मसविदा प्रस्ताव में सरकारी नौकरियों और चुनावों में महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण के साथ ही उन गरीब लोगों को प्रोत्साहन देने का सुझाव भी दिया गया है, जो अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करते हैं। इस नीति में किशोरों की भी परवाह की गई है। सरकार इस दिशा में सार्वजनिक जागरूकता के लिए धार्मिक नेताओं, गैरसरकारी संगठनों, सांसदों और मीडिया के माध्यम से सीधे जनता से संपर्क करेगी।

असम सरकार का कहना है कि इस मसले पर सार्वजनिक सुझाव लेने के बाद वह इसे विधानसभा में बहस के लिए पेश करेगी, जिसके लिए एक प्रस्ताव तैयार किया जाएगा। यह भाजपा के ‘विजन दस्तावेज’ में किया गया वादा है, जिससे राज्य के लोगों का दीर्घकालिक हित जुड़ा है। माना जा रहा है कि इसे कानूनी दर्जा मिलने के बाद लागू करने में समस्या आएगी। असम सरकार ने इसके लिए कुछ तैयारी की है। जैसे, प्रस्तावित नीति को अपनाने के लिए अड़तालीस विभागों के सेवा नियमों को संशोधित करना होगा। इसमें कम से कम तीन साल लग जाएंगे। अगर 2021 में अगले विधानसभा चुनाव से पहले यह नीति अंतिम रूप ले लेती है, इसे असम सरकार की कामयाबी कहा जा सकता है। असल में, असम सरकार मुख्य रूप से चिकित्सा आधारित नीति को सामाजिक रूप से उत्तरदायी नीति में बदलना चाहती है, जिससे लोगों में जनसंख्या को लेकर न केवल जागरूकता बढ़े बल्कि व्यावहारिक परिवर्तन भी हो। सरकार इसके लिए नीतिगत प्रोत्साहन भी देना चाहती है।इसे एक तरह से असम सरकार की दूरदर्शिता ही कहा जाएगा कि उसने समय रहते जनसंख्या की समस्या से निपटने के लिए अपनी तैयारी शुरू कर दी है। 2011 की जनगणना के मुताबिक असम की जनसंख्या 3.12 करोड़ थी। यह 2001 की गणना के सापेक्ष एक करोड़ ज्यादा है। यानी दस साल में एक करोड़ की आबादी के बढ़ने के साथ असम सरकार को लग गया कि आने वाला समय इस लिहाज से ज्यादा विस्फोटक हो सकता है। ‘भारत के करदाता संघ’, जिसने बहुत पहले जनसंख्या बढ़ोतरी की भयावहता को भांप लिया था, ने भी असम सरकार के इस फैसले को सही समय पर उठाया गया एक कदम बताया है। अगर दूसरे राज्य भी असम की राह पर चल निकलेंगे तो देर से ही सही, देश के विकास को न केवल गति मिलेगी, बल्कि कल्याणकारी योजनाओं का लाभ आम जन तक पहुंच सकेगा।

ऐसे समय में जब देश में बढ़ती जनसंख्या को लेकर चिंता जताई जा रही है, जब असम ने एक कड़ा फैसला लेने का साहस जुटाया है। हालांकि जनसंख्या नियंत्रण शुरू से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। राज्य की तरफ से किसी तरह के फैसले को थोपने की स्थिति में समाज किस तरह प्रतिक्रिया करेगा, यह तो भविष्य ही बताएगा। जनसंख्या नियंत्रण को केवल सरकारी नजरिए से देखने और उसे सरकारी लाभ-हानि के दायरे में रखने की भी अपनी सीमाएं हैं। दो बच्चों की नीति को लागू कर पाना भी एक कठिन काम होगा। मान लीजिए, किसी पुरुष या महिला को सरकारी नौकरी मिल भी गई और नौकरी के दौरान उसके दो से ज्यादा बच्चे हो गए तो क्या उसे सेवामुक्त कर दिया जाएगा? अगर ऐसा हुआ तो दूसरी तमाम तरह की कठिनाइयां सरकार के सामने आएंगी, जिनका समाधान भी तलाशना होगा। इन सबके बावजूद, असम सरकार ने अगर कुछ सार्थक पहल की है तो उस पर गंभीरता से विचार करना जरूरी हो जाता है।

 

 

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