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आम आदमी पार्टी की फेहरिस्त से गायब हुआ जनलोकपाल बिल

दिल्ली में लगातार दो साल तक अण्णा और उनसे जुड़े लोग मसलन अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, योगेंद्र यादव, किरण बेदी और वीके सिंह रामलीला मैदान से लेकर जंतर-मंतर तक जनलोकपाल बिल को लेकर आंदोलन चलाते रहे।

Author नई दिल्ली | July 18, 2016 4:36 AM
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (पीटीआई फाइल फोटो)

किसी वक्त अण्णा आंदोलन और आम आदमी पार्टी (आप) की राजनीति का केंद्र बिंदु रहे जनलोकपाल बिल का अब दूर-दूर तक नाम भी नहीं सुनाई देता। इस मुद्दे को अपने पाले से हटाने के मकसद से दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने इसे गैर-संवैधानिक तरीके से विधानसभा में पारित करवाकर केंद्र सरकार के पास भेज दिया। फिलहाल यह बिल दिल्ली के अन्य 14 बिलों की तरह केंद्र सरकार के पास लंबित पड़ा है। छह महीने पहले आप सरकार की ओर से पेश जनलोकपाल बिल बिना किसी मशक्कत के दिल्ली विधानसभा में पारित हो गया था, लेकिन बिल पास होने के बाद जो उत्साह दिल्लीवासियों और आप के कार्यकर्ताओं में होना चाहिए था, वह कहीं भी दिखाई नहीं पड़ा।

दिल्ली में लगातार दो साल तक अण्णा और उनसे जुड़े लोग मसलन अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, योगेंद्र यादव, किरण बेदी और वीके सिंह रामलीला मैदान से लेकर जंतर-मंतर तक जनलोकपाल बिल को लेकर आंदोलन चलाते रहे। इस बिल को लेकर एक समय दिल्ली की राजनीति काफी गरम रही। अण्णा और उनकी टीम के लोगों ने दिल्लीवासियों को भरोसा दिलाया कि अगर यह बिल पास हो गया तो देश में पूर्ण स्वराज आ जाएगा। इसी आस में दिल्ली और देशभर के स्कूल-कॉलेजों के छात्र अपनी कक्षाओं को छोड़कर सड़कों पर आ गए। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में योगदान करने के लिए हजारों छात्र अण्णा आंदोलन से जुड़ गए और एक समय दिल्ली में अराजकता का माहौल बन गया।

कुछ समय बाद दिल्ली की राजनीति ने एक बार फिर करवट ली और अण्णा से जुड़ा एक बड़ा समूह उनसे अलग हो गया और आम आदमी पार्टी के नाम से एक नया राजनीतिक संगठन बना लिया। अरविंद केजरीवाल, योगेंद्र यादव, मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास और आम आदमी पार्टी के नाम से बनी उनकी नई टीम ने दिल्लीवासियों को विश्वासदिलाया कि दिल्ली में उनकी सरकार आएगी, तो वे सबसे पहले जनलोकपाल बिल्पारित कराएंगे। दिल्लीवासियों ने एक बार फिर आप पर भरोसा किया और केजरीवाल ने कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली में सरकार बनाई।

सरकार बनने के बाद केजरीवाल और उनकी टीम ने फिर जनलोकपाल बिल का राग अलापना शुरू कर दिया। सरकार ने जनलोकपाल बिल तैयार करवाया, लेकिन उसे पता नहीं था कि केंद्र की मंजूरी के बिना वह ये बिल पारित नहीं करवा सकती। उधर केजरीवाल एक नई रणनीति के तहत जनलोकपाल बिल को विधानसभा में लाने के लिए अड़ गए। भाजपा पहले ही से इस बिल को असंवैधानिक बता रही थी और कांग्रेस ने भी कह दिया कि वह असंवैधानिक बिल का समर्थन नहीं करेगी। सरकार विधानसभा में बिल लाई, लेकिन वह पास नहीं हो सका। इसके विरोध में केजरीवाल और उनकी टीम ने अपनी 49 दिन पुरानी सरकार से इस्तीफा दे दिया और सरकार गिर गई।

इस्तीफा देने के बाद केजरीवाल एक बार फिर जनलोकपाल बिल लेकर दिल्लीवासियों के बीच गए। दिल्ली में फिर चुनाव हुए और आम आदमी पार्टी 70 में 67 सीटें जीतक र फिर सत्ता में आ गई। भारी बहुमत पाने के बाद केजरीवाल ने जनलोकपाल बिल के मुद्दे को फिर से गरम किया और एक बार फिर इस बिल को असंवैधानिक तरीके से विधानसभा में पेश किया, लेकिन इस बार दिल्लीवासी और आप के विधायक तक समझ गए कि बिल असंवैधानिक है और केंद्र के पास जाकर वहां से लौट आएगा। इसीलिए दिल्ली विधानसभा में जब यह बिल पास हुआ, तो वहां मौजूद आप के विधायकों में इसे लेकर कोई खास उत्साह नहीं दिखा। दिलचस्प यह भी है कि कोई भी छोटा-मोटा काम करने के बाद उसका अखबारों और रेडियो के माध्यम से प्रचार करने वाली आप सरकार ने भी अब इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली है।

दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने और अनियमित कालोनियों को नियमित कराने के सरकार के संकल्प का हश्र दिल्लीवासी देख चुके हैं। वे जानते हैं कि केंद्र सरकार की मदद के बिना इस तरह के मामलों का कोई हल नहीं निकल सकता। दिल्ली के मामलों के जानकार लोगों ने जनलोकपाल बिल के पारित होने से पहले ही प्रचार शुरू कर दिया था कि आप सरकार जो बिल ला रही है वह संवैधानिक नहीं है। आम आदमी पार्टी व लोगों को पता है कि इस बिल का क्या हश्र होना है। इसे देखते हुए आप सरकार और उसके कार्यकर्ता जनलोकपाल बिल को लेकर काफी सोच-समझकर कदम उठा रहे हैं।

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