जम्मू के सिधरा इलाके में हुई बुलडोजर कार्रवाई ने एक बुजुर्ग परिवार को फिर से बेघर कर दिया। 80 वर्षीय अब्दुल रजाक और उनकी 75 साल की पत्नी खातून बी पिछले 30 साल में दूसरी बार अपना घर खो चुके हैं। इस बार उनका घर जम्मू-कश्मीर पुलिस और वन विभाग की कार्रवाई में तोड़ा गया। अधिकारियों का कहना है कि ये मकान वन भूमि पर बने थे।

मंगलवार को हुई कार्रवाई में करीब 25 से 30 घर गिराए गए। इनमें ज्यादातर घर गुर्जर और बकरवाल समुदाय के लोगों के थे। घर टूटने के अगले दिन भीषण गर्मी में यह बुजुर्ग दंपति खुले आसमान के नीचे पेड़ की छांव में बैठे नजर आए। उस दिन जम्मू का तापमान 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था।

अब्दुल रजाक मूल रूप से दक्षिण कश्मीर के कोकेरनाग इलाके के रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि पहली बार उन्हें 1997 में अपना घर छोड़ना पड़ा था। उस समय दक्षिण कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था। रज़ाक के गांव में सेना की एक यूनिट आई थी, जिसने स्थानीय लोगों से आतंकियों के बारे में जानकारी मांगी थी।

रजाक के अनुसार, उन्होंने और कुछ अन्य लोगों ने सुरक्षा बलों की मदद की थी। यहां तक कि सेना के लिए बंकर भी बनाए थे। बाद में मिली जानकारी के आधार पर कई आतंकी मारे गए। लेकिन जब हालात सामान्य हुए और सेना वहां से चली गई, तब आतंकियों ने गांव लौटकर उन लोगों को निशाना बनाना शुरू किया जिन्होंने सुरक्षा बलों की मदद की थी।

रजाक ने बताया कि आतंकियों ने गांव में कई घरों और स्कूल को आग लगा दी। लोगों से पूछा गया कि सेना की मदद किसने की थी। कुछ ग्रामीणों ने उनका नाम बता दिया। इसके बाद आतंकियों ने उनके रिश्तेदार समेत तीन लोगों की हत्या कर दी। डर के माहौल में परिवार को कश्मीर छोड़कर जम्मू आना पड़ा।

जम्मू आने के बाद यह परिवार पहले भटिंडी इलाके में किराये के मकान में रहा। बाद में स्थानीय लोगों ने उनकी हालत देखकर उन्हें सिधरा इलाके की खाली जमीन पर बसने की सलाह दी। धीरे-धीरे वहां घर बने और सरकारों की ओर से बिजली-पानी जैसी सुविधाएं भी दी गईं।

अब्दुल रजाक और उनका परिवार कश्मीर से विस्थापित प्रवासी के तौर पर पंजीकृत है। उन्हें सरकार की ओर से मुफ्त राशन और हर महीने 3250 रुपये की राहत राशि मिलती है। उनके दामाद मंजूर अहमद, बेटी जरीना बेगम और उनके बच्चों के नाम भी प्रवासी रिकॉर्ड में दर्ज हैं। उनका घर भी कार्रवाई में तोड़ दिया गया।

रजाक का कहना है कि अधिकारियों ने सामान निकालने तक का समय नहीं दिया। उनका प्रवासी राशन कार्ड भी मलबे में दब गया। वहीं मंजूर अहमद के राशन कार्ड में परिवार को “केएम” यानी कश्मीरी माइग्रेंट श्रेणी में दर्ज किया गया है।

आतंकवाद के दौरान 2500 मुस्लिम परिवारों ने घाटी छोड़ी थी

कश्मीर में 1989 में आतंकवाद शुरू होने के बाद हजारों कश्मीरी पंडित परिवारों के साथ-साथ करीब 2500 मुस्लिम परिवारों ने भी घाटी छोड़ी थी। इन मुस्लिम परिवारों को भी जम्मू में प्रवासी के रूप में पंजीकृत किया गया था।

हाल के वर्षों में सिधरा इलाके की जमीन को लेकर विवाद बढ़ा। भाजपा और कुछ दक्षिणपंथी संगठनों ने आरोप लगाया कि सरकारी और वन भूमि पर अवैध कब्जे किए गए हैं। 13 मई को भाजपा विधायक विक्रम रंधावा ने सिधरा रोड पर प्रदर्शन कर अतिक्रमण हटाने की मांग की थी। प्रदर्शन के दौरान सड़क भी जाम की गई थी।

इसके कुछ दिनों बाद वन विभाग और पुलिस की टीम जेसीबी मशीनों के साथ पहुंची और महमाया मंदिर के पास बने घरों को गिरा दिया। अधिकारियों का दावा है कि करीब 60 कनाल जमीन खाली कराई गई है।

हालांकि जम्मू-कश्मीर के वन और जनजातीय मामलों के मंत्री जावेद राणा ने कहा कि लोग वन भूमि पर नहीं बल्कि सरकारी जमीन पर रह रहे थे। उन्होंने कार्रवाई के बाद प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा दिया।

मंत्री ने इस मामले की जांच के लिए दो सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग कमेटी भी बनाई है। यह समिति जांच करेगी कि कहीं वन अधिकार कानून 2006 का उल्लंघन तो नहीं हुआ। इस कानून के तहत जनजातीय समुदायों को वन भूमि पर रहने का अधिकार मिलता है। समिति को सात दिन में रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।

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पुलवामा आतंकी हमले में शामिल आतंकी हमजा बुरहान की पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में गोली मारकर हत्या कर दी गई। मुजफ्फराबाद के एक कॉलेज के बाहर अज्ञात बंदूकधारियों ने उस पर कई गोलियां बरसाईं। इसकी वजह से उसकी मौके पर ही मौत हो गई। बुरहान को केंद्र सरकार ने 2022 में आतंकवादी घोषित किया था। एक आधिकारिक अधिसूचना में सरकार ने कहा था, “अरजुमंद गुलजार डार उर्फ ​​हमजा बुरहान उर्फ ​​डॉक्टर, उम्र 23 साल खरबतपोरा, रत्नीपोरा, पुलवामा का रहने वाला है और अल बदर का सहयोगी सदस्य है, जो UAPA के तहत नामित एक आतंकवादी संगठन है।” पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक