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अनुच्छेद 35 ए का दंश

भारतीय संविधान के अध्याय-3 में भारतीय नागरिकों को जो मानवाधिकार दिए गए हैं, वे जम्मू-कश्मीर में भी लागू हो सकते थे, लेकिन उन्हें अनुच्छेद-35 ए के अनुसार जम्मू-कश्मीर में दबोच कर रख दिया गया

Author August 23, 2017 5:38 AM
कश्मीर में पुलिसवालों पर पत्थर बरसाते छात्र (AP Photo) फाइल फोटो

भीमसिंह 

अनुच्छेद-35 ए जम्मू-कश्मीर में भारतीय नागरिकों पर एक दोमुंही तलवार है जिसे आज तक देश के बुद्धिजीवियों और राजनीतिकों के संज्ञान में नहीं लाया गया। यह जम्मू-कश्मीर के लोगों के खिलाफ एक साजिश थी, जिसकी शुरुआत हुई 14 मई 1954 को, जब भारत के राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने एक अध्यादेश जारी करके अनुच्छेद-35 के साथ ‘ए’ जोड़ दिया। भारतीय संविधान के अध्याय-3 में भारतीय नागरिकों को जो मानवाधिकार दिए गए हैं, वे जम्मू-कश्मीर में भी लागू हो सकते थे, लेकिन उन्हें अनुच्छेद-35 ए के अनुसार जम्मू-कश्मीर में दबोच कर रख दिया गया और 14 मई, 1953 के बाद शेख मोहम्मद अब्दुल्ला पर कई प्रकार के मामले चलाकर जम्मू-कश्मीर की जनता को मानव अधिकारों से वंचित कर दिया गया।  अनुच्छेद 35(ए) के अध्यादेश के कारण केवल शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को बारह साल की कैद नहीं झेलनी पड़ी, इससे जम्मू-कश्मीर के हजारों राजनीतिक कार्यकर्ता भी प्रभावित हुए। लगभग साढ़े आठ साल जम्मू-कश्मीर की जेलों में मुझे भी रहना पड़ा।

शेख अब्दुल्ला को 1975 में मुख्यमंत्री के ताज से नवाजा गया। शेख अब्दुल्ला ने उन्हीं को कुचलने वाले कानून को जम्मू-कश्मीर के उन लोगों के खिलाफ इस्तेमाल किया जो उनका विरोध करते थे, जिसकी त्रासदी इस लेखक ने भी झेली है। यह था कमाल अनुच्छेद-35 ए का और उसके साथ अनुच्छेद 370 का, जो एक अस्थायी कानून था और तिरसठ वर्षों से लोगों के गले पर तलवार बनकर लटका हुआ है। जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्तूबर, 1947 को भारत संघ से विलयपत्र पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन इस विलयपत्र को भारतीय संसद ने आज तक अमलीजामा नहीं पहनाया। जबकि 577 रियासतों को भारत संघ में शामिल किया गया, जिनमें दो रियासतें हैदराबाद और जूनागढ़ भी थीं, जिन्होंने विलयपत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। जम्मू-कश्मीर को अलग रखा गया और उसका एकीकरण आज तक नहीं हो सका है।

अनुच्छेद 370 को अस्थायी तौर पर भारतीय संविधान में जोड़ना जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ एक बहुत बड़ा धोखा है, यानी 35 (ए) एक गैरकानूनी कदम था; राष्ट्रपति को भारतीय संविधान के तहत ऐसा कानून बनाने की अनुमति नहीं थी। राष्ट्रपति केवल अनुच्छेद 370 के तहत कार्रवाई कर सकते थे। दूसरी त्रासदी यह है कि अनुच्छेद 370 के खंड (3) में, जिसके तहत राष्ट्रपति के बनाए हुए कानून के लिए जम्मू-कश्मीर संविधान सभा से अनुमति लेना आवश्यक था, उस पर अमल नहीं किया गया और यह प्रावधान भी 26 जनवरी, 1957 को कानूनी दायरे से गायब हो चुका था, क्योंकि जम्मू-कश्मीर में उस दिन एक नया संविधान लागू किया गया था और संविधान सभा उसी दिन निष्फल हो गई।

शेख अब्दुल्ला को 20 अगस्त, 1952 को जम्मू-कश्मीर के सदर-ए-रियासत डॉ कर्णसिंह ने पंडित जवाहरलाल नेहरू की सलाह पर सत्ता से हटा कर जेल में बंद कर दिया और बख्शी गुलाम मोहम्मद को जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। बख्शी गुलाम मोहम्मद के लिए कश्मीर के लोगों की आवाज को नियंत्रण में करना संभव नहीं था, उनके कहने पर नेहरू ने राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद से 35 (ए) लागू करवाया। कर दिए सब दरवाजे बंद उन हवाओं के लिए, जो हवाएं भारतीय संविधान से मानवाधिकार लेकर आई थीं, यानी जम्मू-कश्मीर में कोई मानवाधिकार नहीं रहा और कानून के शासन की जगह स्थापित हुआ बंदूक का शासन।

शेख अब्दुल्ला 1964 में जेल से रिहा हुए। नेहरू भी इस दुनिया से विदा हो गए। इंदिरा-शेख समझौता हुआ और शेख अब्दुल्ला 1975 में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मनोनीत हुए। और जो कानूनी तलवार शेख अब्दुल्ला और उनके साथियों को कुचलने के लिए बनाई गई थी उसी तलवार का सहारा लेकर शुरुआत हुई शेख मोहम्मद अब्दुल्ला और उनके परिवार की सत्ता। 1975 में शेख अब्दुल्ला फिर बने मुख्यमंत्री (प्रधानमंत्री नहीं); उनके साथ हुए कई राजनीतिक समझौते सार्वजनिक जानकारी में आ गए और कई अब भी राजनीतिक फाइलों के कब्रिस्तान में दबे हुए हैं दिल्ली और कश्मीर में। 26 जनवरी, 1957 को जम्मू-कश्मीर के संविधान को थोपा गया और यह कमाल था कि उस संविधान में मानव अधिकारों का नाम तक नहीं है और न ही इसकी आवाज कहीं से उठी। जम्मू-कश्मीर संविधान को श्रीनगर और दिल्ली में उछाला गया, जैसे वह जम्मू-कश्मीर के लोगों की स्वतंत्रता का स्तंभ था। ये सब राजनीतिक वादे अनुच्छेद 370 में किए गए, जो उस समय भी अस्थायी थे और आज भी अस्थायी हैं। इन दिनों डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी जम्मू-कश्मीर में पंजाब से बिना परमिट के प्रवेश कर गए। जम्मू से साढ़े तीन सौ किलोमीटर की दूरी पर उन्हें श्रीनगर जेल में बंद कर दिया गया। दिल्ली में सरकार थी कांग्रेस की, और जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रधानमंत्री थे शेख मोहम्मद अब्दुल्ला।

यह था माजरा 1953 का। जम्मू-कश्मीर का झंडा अलग, संविधान अलग और हाईकोर्ट अलग।राष्ट्रपति को अनुच्छेद 370 (3) के तहत और ज्यादा शक्तियां दी गर्इं कि वे 370 में दिए गए विशेष अधिकार जम्मू-कश्मीर सरकार से कभी भी ले सकते थे। यहां तक 370 (3) में एक प्रावधान जोड़ दिया गया कि राष्ट्रपति 370 में कोई भी संशोधन कर सकते हैं। बशर्ते यह कि उन्हें जम्मू-कश्मीर संविधान सभा इसकी अनुमति दे दे। यह प्रावधान उस दिन ही समाप्त हो गया जिस दिन जम्मू-कश्मीर में यानी 26 जनवरी, 1957 को अपना संविधान लागू हुआ। आज के दिन राष्ट्रपति जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 में बिना मंत्रिमंडल की सिफारिश के संशोधन करने में सक्षम हैं और अनुच्छेद 370 की कमान के तहत कोई भी अधिसूचना जारी कर सकते हैं। धारा 370 लगभग 70 वर्षों से अस्थायी चल रही है और आज यह भारत की राष्ट्रीय एकता की मजबूती के लिए आवश्यक है। राष्ट्रपति अपनी अधिसूचना से कम से कम तीन विषयों रक्षा, विदेश मामले, संचार आदि के बारे में कोई भी कानून बनाने का अधिकार भारतीय संसद को दे सकते हैं और बाकी विषयों के बारे में जम्मू-कश्मीर के लोगों की राय ली जा सकती है।

अनुच्छेद-35 ए का मामला सुप्रीम कोर्ट में भी आया था। इस लेखक ने एक अधिवक्ता के रूप में कई दलीलें पेश की थीं कि 35 (ए) जम्मू-कश्मीर के भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों, मानव अधिकारों पर एक तलवार का काम करता है और 35 (ए) का जम्मू-कश्मीर के ‘स्टेट सब्जेक्ट’ कानून से कोई लेना-देना नहीं है।  अनुच्छेद 11 से 35 तक, जो भारतीय नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करते हैं उन पर धारा ‘ए’ जोड़ कर जम्मू-कश्मीर की सरकार को अधिकार दिया गया कि वह जम्मू-कश्मीर के निवासियों को किसी भी मौलिक अधिकार से कभी भी वंचित कर सकती है। यह था 35 (ए), और भारतीय मीडिया का एक हिस्सा देश के लोगों को गुमराह करता रहा और आज भी कर रहा है। चिल्ला-चिला कर जम्मू-कश्मीर के लोगों को डराया जा रहा है कि 35 (ए) हटाया गया तो जम्मू-कश्मीर में ‘स्टेट सब्जेक्ट’ कानून समाप्त हो जाएगा और भारतीय नागरिक जम्मू-कश्मीर की जमीन पर काबिज हो जाएंगे। अफसोस इस बात का है कि मोदी सरकार भी इसी प्रचार को हवा दे रही है। 35(ए) की वजह से जम्मू-कश्मीर के लोगों और उनके मौलिक अधिकारों के बीच एक पत्थर की दीवार है और उसका स्टेट सब्जेक्ट कानून से कोई लेना-देना नहीं है। स्टेट सब्जेक्ट कानून महाराजा हरिसिंह ने 1927 और 1932 में लागू किया था, जो जम्मू-कश्मीर के लोगों के अधिकारों का एक हिस्सा बन चुका है, जिसकी भारतीय संविधान में पूरी गांरटी है। 35 (ए) की वजह से जम्मू-कश्मीर के लोग तिरसठ सालों से मानव अधिकारों से वंचित हैं।

 

 

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