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जजों का किरदार जूलियस सीजर की पत्नी सरीखा, होना चाहिए संदेह से परे- जानिए जम्मू-कश्मीर HC ने ऐसा क्यों कहा

जम्मूः हाईकोर्ट ने कहा कि जज एक ऐसे संस्थान में काम करते हैं जिसमें जनता की गहरी आस्था है। लिहाजा उन्हें अपनी ड्यूटी को संजीदगी से अंजाम देने की जरूरत होती है।

जजों का किरदार जूलियस सीजर की पत्नी सरीखा, होना चाहिए संदेह से परे- जानिए जम्मू-कश्मीर HC ने ऐसा क्यों कहा
प्रतीकात्मक तस्वीर।(Photo Credit – Freepik)

32 लाख स्टैंप ड्यूटी की चोरी के मामले में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि जजों का किरदार जूलियस सीजर की पत्नी सरीखा होना चाहिए। उन पर संदेह की कोई वजह नहीं होनी चाहिए। सभी उनसे अपेक्षा करते हैं कि वो अपना काम आला दर्जे की ईमानदारी के साथ करें। वो दूसरे सरकारी कर्मियों की तरह से नहीं होते। वो एक ऐसे संस्थान में काम करते हैं जिसमें जनता की गहरी आस्था है। लिहाजा उन्हें अपनी ड्यूटी को संजीदगी से अंजाम देने की जरूरत होती है।

जस्टिस पंकज मिथाल और जस्टिस संजीव कुमार की बेंच ने ये तल्ख टिप्पणी उस याचिका पर फैसला देते हुए की जिसमें जज रहे जावीद अहमद नाईक ने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी थी। जावीद ने अपने खिलाफ हुई जांच और कारण बताओ नोटिस को भी चुनौती दी थी। लेकिन कोर्ट ने राहत देने से इन्कार कर दिया। बेंच का कहना था कि राहत देने से गलत संदेश जाएगा।

मामले के मुताबिक जावीद 2003 में मुंसिफ भरती हुआ था। 2011 के शीतकालीन अवकाश के दौरान उसे ड्यूटी मजिस्ट्रेट नियुक्त किया गया। इस दौरान उसने सब रजिस्ट्रार के तौर पर मिले अधिकारों का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया। उसने एक प्रवासी की जमीन से जुड़ी पांच सेल डीड रजिस्टर कीं। ये सारा मसला 450 कनाल 17 मरले जमीन का था। आरोप है कि जावीद ने सेल डीड रजिस्टर करते समय 32 लाख रुपये की स्टांप ड्यूटी को अनदेखा कर दिया। सरकार को इससे मोटी चपत लगी।

बशीर अहमद नाम के शख्स ने इस बारे में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को इत्तला दी। उसके बाद जावीद के खिलाफ जांच बैठाई गई। उसे 32 लाख की स्टैंप ड्यूटी की चोरी के मामले में दोषी पाया गया। 2019 में जावीद को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गय़ा। जांच रिपोर्ट में कहा गया कि जावीद की हरकतें संदेह के घेरे में थीं। हालांकि जावीद ने फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी तो उसका कहना था कि एक खतरनाक आतंकवादी बदला लेने के लिए उसे फंसा रहा है, क्योंकि बतौर जज उसने आतंकी के पिता की सिविल केस में अर्जी को खारिज कर दिया था।

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