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Jammu-Kashmir: बलिदान दिवस पर छुट्टी के विरोध में उतरे कश्मीर पंडित और राजपूत युवा, बोले- हिंदुओं के खिलाफ नरसंहार का प्रतीक है ये दिन

युवा राजपूत सभा (वाईआरएस) के अध्यक्ष सुरिंदर सिंह गिल्ली ने बताया कि 1931 में डोगरा के शासक महाराजा हरिसिंह के सैनिकों की गोलीबारी में मारे गए लोगों की याद में जम्मू कश्मीर में हर साल 13 जुलाई को बलिदान दिवस मनाया जाता है।

Author श्रीनगर | July 14, 2019 6:23 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर (एक्सप्रेस फाइल)

जम्मू-कश्मीर में 13 जुलाई को मनाए जाने वाले ‘बलिदान दिवस’ को ‘काला दिवस’ करार देते हुए युवा राजपूत सभा ने यहां विरोध प्रदर्शन किया और शनिवार (13 जुलाई) को इसके लिए अवकाश समाप्त करने की मांग की। बता दें कि कश्मीरी पंडितों ने भी इसी मांग को लेकर प्रदर्शन किया।

युवा राजपूत सभा (वाईआरएस) के अध्यक्ष सुरिंदर सिंह गिल्ली ने बताया कि 1931 में डोगरा के शासक महाराजा हरिसिंह के सैनिकों की गोलीबारी में मारे गए लोगों की याद में जम्मू कश्मीर में हर साल 13 जुलाई को बलिदान दिवस मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि राजपूत समुदाय ने इस अवसर पर अवकाश को ‘काला दिवस’ के रूप में मनाया है क्योंकि यह राज्य में अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ बड़े पैमाने पर आगजनी, लूट और सांप्रदायिक नरसंहार की याद दिलाता है।

गिल्ली की अगुवाई में 300 कार्यकर्ता यहां एकत्र हुए और बलिदान दिवस के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस घटना को सही तरीके से चित्रित नहीं किया गया था। गिल्ली ने जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक से 13 जुलाई को अवकाश की जगह कार्य दिवस घोषित करने की अपील की। गिल्ली ने बताया कि वाईआरएस ने केंद्र की मोदी सरकार से 13 जुलाई को सार्वजनिक अवकाश खत्म करने और 23 सितंबर को महाराजा हरिसिंह की जयंती पर राजपत्रित अवकाश घोषित करने का आग्रह किया है ।

विस्थापित कश्मीरी पंडितों का प्रतिनिधित्व कर रहे कुछ संगठनों ने भी 13 जुलाई को ‘काला दिवस’ मनाया और कहा कि 1931 में इसी दिन कश्मीर घाटी में समुदाय को अत्याचार का सामना करना पड़ा। संगठन के सदस्यों ने यहां राजभवन के बाहर प्रदर्शन किया जबकि जम्मू कश्मीर में शहीदी दिवस मनाया गया।

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