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जम्मू-कश्मीर विधानसभाः परिसीमन से कैसे बदलेगी तस्वीर

चुनाव आयोग पहले विधानसभा सीटों का परिसीमन करेगा और उसके बाद ही चुनाव की प्रक्रिया शुरू की जा सकेगी। इसमें कम से कम चार महीने का वक्त लग सकता है।

Author नई दिल्ली | August 13, 2019 1:47 PM
जम्मू- कश्मीर विधानसभा

केंद्र सरकार विधानसभा चुनाव से पहले जम्मू-कश्मीर राज्य का परिसीमन करना चाहती है और इसकी तैयारी अंतिम चरण में है। इस मसले पर गृह मंत्रालय, राज्यपाल और चुनाव आयोग एक-दूसरे के संपर्क में हैं। जम्मू-कश्मीर में इस साल के आखिर में विधानसभा चुनाव कराए जाने की मंशा सरकार जता चुकी है, लेकिन विधानसभा चुनावों में अभी कुछ और महीनों का वक्त लग सकता है। चुनाव आयोग पहले विधानसभा सीटों का परिसीमन करेगा और उसके बाद ही चुनाव की प्रक्रिया शुरू की जा सकेगी। इसमें कम से कम चार महीने का वक्त लग सकता है। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक, 2019 के मुताबिक सूबे में विधानसभा सीटों का परिसीमन जरूरी है। परिसीमन की सुगबुगाहट से राजनीतिक गहमागहमी तेज हो गई है।

जल्द शुरू होगी कवायद
चुनाव आयोग ने अभी औपचारिक तौर पर सीटों के परिसीमन को लेकर सरकार से बातचीत नहीं की है। राज्य के मुख्य निर्वाचन आयुक्त जल्द ही चुनाव आयोग से राज्य को लेकर पारित विधेयकों और परिसीमन के प्रस्ताव की जानकारी साझा करेंगे। नए परिसीमन के तहत केंद्र शासित प्रदेश बनने वाले जम्मू-कश्मीर में अब विधानसभा की सीटों में एससी और एसटी को आरक्षण भी मिल सकेगा। चुनाव आयोग कह चुका है कि जम्मू-कश्मीर में 15 अगस्त और अमरनाथ यात्रा के बाद ही चुनाव के बारे में बात की जा सकती है।

सीटों का गणित क्या हो सकता है?
सीटों की संख्या बढ़कर 114 की जा सकती है। अब तक 24 सीटें पाक अधिकृत कश्मीर के नाम पर रिक्त रखी जाती थीं और अब भी यह सीटें खाली छोड़ी जाएंगी। जम्मू-कश्मीर में पहले 87 विधानसभा सीटें थीं। लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद चार सीटें कम हो जाएंगी। अभी पूरे कश्मीर में 46 विधानसभा और तीन लोकसभा सीटें हैं। जम्मू में 37 विधानसभा और दो लोकसभा सीटें हैं।

बढ़ेगी मतदाताओं की संख्या
करीब सात लाख ऐसे मतदाता बढ़ेंगे, जिन्हें धारा 35ए लागू होने के कारण विधानसभा चुनाव में मताधिकार नहीं था। अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होते ही घाटी से 35ए भी हट गया है। नए वोटरों में दलित, शरणार्थी, गोरखा और राज्य से बाहर शादी करने वाली महिलाएं होंगी। 2014 की तुलना में 2019 के लोकसभा चुनाव में जम्मू-कश्मीर में 6.40 लाख वोटर बढ़े हैं। 2014 में भाजपा का वोट शेयर 32.6 फीसद था, जो 2019 के लोकसभा चुनाव में 46.40 फीसद हो गया। साल के अंत तक होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची संशोधित होगी। अनुच्छेद 35ए के तहत जम्मू-कश्मीर के गैर-नागरिकों को सिर्फ लोकसभा चुनाव में वोट डालने का अधिकार मिल रहा था। परिसीमन के बाद आने वाली नई मतदाता सूची में मतदाताओं की संख्या 7 से 15 लाख के बीच बढ़ सकती है।

सामाजिक समीकरणों पर असर
2011 की जनगणना के मुताबिक जम्मू संभाग की आबादी 5378538 है, जो राज्य की 42.89 फीसद आबादी है। जम्मू संभाग 26200 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है, यानी राज्य का 25.93 फीसद क्षेत्र जम्मू संभाग में आता है। यहां विधानसभा की कुल 37 सीटें हैं। कश्मीर की आबादी 6888475 है, जो राज्य की आबादी का 54.93 फीसद हिस्सा है। कश्मीर संभाग का क्षेत्रफल राज्य के क्षेत्रफल 15900 वर्ग किलोमीटर है, जो 15.73 फीसद है। यहां से कुल 46 विधायक चुने जाते हैं। सरकार यहां इसलिए परिसीमन पर जोर दे रही है ताकि एससी और एसटी समुदाय के लिए सीटों के आरक्षण की नई व्यवस्था लागू की जा सके। घाटी की किसी भी सीट पर आरक्षण नहीं है, लेकिन यहां 11 फीसद गुज्जर-बक्करवाल और गद्दी जनजाति समुदाय के लोगों की आबादी है। जम्मू संभाग में सात सीटें एससी के लिए आरक्षित हैं, जिनका रोटेशन नहीं हुआ है।

राजनीतिक गणित पर असर
कश्मीर संभाग की आबादी राज्य की जनसंख्या का लगभग 55 फीसद है। जबकि राज्य के कुल क्षेत्रफल में कश्मीर का हिस्सा सिर्फ 16 फीसद है। यानी कश्मीर में एक विधायक प्रति 349 वर्ग किमी पर चुना जाता रहा है, जबकि जम्मू क्षेत्र में एक विधायक 710 वर्ग किमी पर चुना जाता है। कश्मीर की आबादी में 96फीसद मुसलिम और 2.5 फीसद हिंदू हैं। वहीं, जम्मू में 62.6 फीसद हिंदू और 33.5 फीसद मुसलिम हैं। नए सिरे से परिसीमन होने से राज्य में राजनीतिक असंतुलन खत्म होगा।

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