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साहित्य उत्सव में शब्दों के साथ ही नज्मों पर भी चर्चा के दौर चले

साहित्य उत्सव में रविवार को गुलजार के सत्र में ही लोगों की खास रुचि भी झलकी। साहित्य उत्सव में रविवार को छुट्टी होने के कारण खासी रंगत रही। गीतकार गुलजार के सत्र के चलते पूरे आयोजन में रौनक बनी रही।

गीतकार गुलजार। (फाइल फोटो)

जयपुर साहित्य उत्सव के चौथे दिन रविवार को भी साहित्यकारों, लेखकों और गीतकारों ने अपने शब्दों के साथ ही कई विधाओं पर अपने विचार रखे। नज्म उलझी हुई है सीने में विषय पर हुए सत्र में गीतकार गुलजार के साथ लेखक पवन वर्मा ने चर्चा की। साहित्य उत्सव में रविवार को गुलजार के सत्र में ही लोगों की खास रुचि भी झलकी। साहित्य उत्सव में रविवार को छुट्टी होने के कारण खासी रंगत रही। गीतकार गुलजार के सत्र के चलते पूरे आयोजन में रौनक बनी रही। गुलजार ने प्रकृति और पर्यावरण को लेकर कई गंभीर संदेश दिए। उन्होंने कहा कि प्रकृति को नजरअंदाज नहीं कर उसे अपने साथ जोड़कर रखना है। उनका कहना था कि उन्होंने अपने घर और आसपास खुद के साथ पेड़ों को भी बड़ा होता देखा है। इससे मुझे प्रकृति अपने परिवार और अपने जैसा ही लगती है। गुलजार ने प्रकृति के कई रूपों का मार्मिक वर्णन किया तो श्रोताओं में भी भावुकता पनप गई।

उन्होंने कहा कि हम अपने सगे संबंधियों और मानव जाति तक ही सीमित रहते हैं। पेड़, पौधों, हवा, पानी, आकाश आदि सबसे जुड़ना होगा। उन्होंने कहा कि यहां खड़े पेड़ भी आपके साथ साहित्य की सरिता में बह रहे हैं। वो शब्दों को महसूस कर खिलखिला रहे हैं और प्रतिक्रिया दे रहे हैं। बस जरूरत है उसे समझने की। गुलजार का क्रेज लोगों में जबरदस्त दिखा। लोगों की भारी भीड़ के चलते उनके सत्र के दौरान दरवाजे तक बंद करने पड़े।

महिलाओं के लेखन से जुड़े एक अन्य सत्र में महिलाओं के लेखन को चुनौतीपूर्ण करार दिया गया। गुजराती लेखिका इला अरब मेहता ने महिलाओं के लेखन से जुड़े कई पहलुओं को उजागर किया। इसमें शामिल कई लेखिकाओं ने कहा कि सैकड़ों साल हो गए, पर अभी भी ज्यादा कुछ नहीं बदला है। महिलाओं को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है जो रोजमर्रा की बन गई हैं। पूर्व पुलिस अधिकारी और साहित्यकार हरिराम मीणा ने अपने उपन्यास धूणी तपे तीर पर चर्चा करते हुए कहा कि अभी भी जल, जंगल और जमीन के लिए आदिवासी संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने मानगढ़ में आदिवासियों के संघर्ष और बलिदान का विस्तार से जिक्र करते हुए इस वर्ग की पीड़ा को उजागर किया।

उत्सव में गीतकार जावेद अख्तर ने अरविंद कुमार की लिखित पुस्तक शब्द वेद का लोकार्पण किया। जावेद अख्तर ने कहा कि लोगों को शब्दों का तप करना चाहिए। उनका कहना था कि शब्द ही लोगों को लोगों से जोड़ते हैं। शब्द का सही इस्तेमाल नहीं होने से रिश्ते तक खराब हो जाते हैं। हिंदी भाषा के लिए काम करने वाले समानांतर के लेखक 85 साल के अरविंद कुमार का कहना था कि जो शब्द लुप्त हो गए है, उनको बचाने में लगा हूं। उन्होंने अपने जीवन में आए उतार चढ़ावों का जिक्र करते हुए शब्दों को लेकर कई जानकारियां दीं।

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