उत्तर प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होना है। वर्तमान हालातों के अनुसार, यूपी विधानसभा चुनाव 2027 में सीधा मुकाबला बीजेपी और सपा गठबंधन के बीच होता नजर आएगा। लोकसभा चुनाव 2024 के परिणामों से उत्साहित सपा, जहां इस चुनाव में भी अपने PDA वाले नैरेटिव के साथ आगे बढ़ेगी तो वहीं बीजेपी चाहेगी कि हिंदू वोटों का बिखराव न हो।

आइए आज आपको लेकर चलते हैं साल 1993 में, जब यूपी में सपा और बसपा पहली बार साथ आए थे और उन्होंने राम मंदिर आंदोलन के बाद बीजेपी के बढ़ते ग्राफ को झुका दिया। उस दौर में सपा और बसपा ने साथ आकर ओबीसी और दलित वोटों को एकजुट करने की कोशिश, जिसका यूपी की सियासत में लंबे समय तक असर भी दिखाई दिया।

सबसे पहले नजर यूपी विधानसभा चुनाव 1991 पर

उतर प्रदेश विधानसभा चुनाव 1993 समझने से पहले जरूरी है कि हम बाबरी विध्वंस से पहले हुए यूपी विधानसभा चुनाव 1991 के परिणाम पर एक नजर डाल लें। राम मंदिर आंदोलन के दौरान हुए इस चुनाव में बीजेपी पहली बार यूपी की सत्ता में काबिज हुई। महज एक दशक पहले पहले बनी पार्टी को उत्तर प्रदेश में 31.45% वोट और 221 सीटें मिलीं।

क्रम संख्यापार्टीसीटें जीतीसीटों पर चुनाव लड़ावोट प्रतिशत
1बीजेपी22141531.45%
2कांग्रेस4641317.32%
3जनता दल9237418.84%
4जनता पार्टी3439912.52%
5लोकदल01070.35%
6बीएसपी123869.44%

इस चुनाव में कांग्रेस को बड़ा नुकसान झेलना पड़ा। कांग्रेस यूपी में 94 सीटों से घटकर 46 पर आ गई। यूपी विधानसभा चुनाव 1991 में जनता दल (मुलायम सिंह इसी पार्टी में थे) को 92 सीटें मिलीं। इस चुनाव में बसपा ने 386 सीटों पर चुनाव लड़ा और 12 सीटें हासिल की। चुनाव में बसपा को 9.44% वोट मिले।

1993 में मिले मुलायम-कांशीराम

अब बात करते हुए यूपी विधानसभा चुनाव 1993 की। यूपी विधानसभा चुनाव 1993 के लिए सपा और बसपा ने हाथ मिलाया। बसपा इससे पहले दो चुनावों में 9% से कुछ ज्यादा वोट हासिल कर चुकी थी। बाबरी विध्वंस के बाद हुए इस चुनाव में सपा-बसपा का नारा ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ छाया हुआ था।

क्रम संख्यापार्टीसीटें जीतीसीटों पर चुनाव लड़ावोट प्रतिशत
1बीजेपी17742233.30%
2कांग्रेस2842115.08%
3जनता दल2737712.33%
4जनता पार्टी12980.52%
5सपा10925617.94%
6बीएसपी6716411.12%

इस चुनाव में सपा ने 256 सीटों पर प्रत्याशी उतारे जबकि बसपा ने 164 सीटों पर किस्मत आजमाई। जब चुनाव परिणाम आए तो सपा-बसपा गठबंधन को तकरीबन बीजेपी के बराबर सीटें मिलीं। चुनाव में बीजेपी को 177 सीटों पर जीत मिली जबकि सपा 109 और बसपा 67 सीटों पर विजयी रही। इसके अलावा इस चुनाव में कांग्रेस को 28, जनता दल को 27 और जनता पार्टी को एक सीट हासिल हुई।

1993 विधानसभा चुनाव बो गया सामाजिक गठबंधन का बीज

बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हुए इस चुनाव में सपा-बसपा गठजोड़ ने ‘सामाजिक गठबंधन’ की राजनीति का आगाज किया। कुछ समय पहले तक यूपी में दिखाई दे रहे राम मंदिर आंदोलन का असर इस चुनाव से कम होने लगा और आने वाले चुनावों में बीजेपी का ज्यादा लगातार गिरता गया। 1993 के चुनाव में इस गठबंधन की वजह से कांग्रेस, जनता दल का भी बुरा हाल हुआ और चुनाव बाद मुलायम सिंह यादव दूसरी बार यूपी के सीएम बने।

सरकार की नीतियों में भी दिखाई दिया गठबंधन का असर

पत्रकार श्याम लाल यादव ने अपनी पुस्तक ‘At the Heart of Power: The Chief Ministers of Uttar Pradesh’ में लिखा है कि मुलायम सिंह यादव के दूसरे कार्यकाल में बसपा का सरकार की नीतियों पर स्पष्ट प्रभाव दिखाई दिया, खासकर दलितों और पिछड़ों के मुद्दे पर। अंबेडकर और महर्षि वाल्मीकि की जयंती को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया। मुलायम सिंह की इस सरकार में केंद्र सरकार के निर्देश का पालन करते हुए सरकारी नौकरियों में OBCs के लिए 27% आरक्षण लागू किया। यह लाभ उन्हें शैक्षणिक संस्थानों में भी दिया गया।

आगे के चुनावों में भी दिखाई दिया असर

यूपी विधानसभा चुनाव 1993 में हुआ सपा-बसपा भले ही कम समय तक चला हो लेकिन उनका यह गठबंधन यूपी में राष्ट्रीय पार्टियों का बड़ा नुकसान कर गया। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 1996 में तकरीबन सभी दलों को 1991 चुनाव के बराबर ही सीटें मिलीं लेकिन राज्य में हुए आगामी चुनावों में बीजेपी-कांग्रेस का ग्राफ गिरता ही चला गया।

विधानसभा चुनावबीजेपी की सीटेंसपा की सीटेंबसपा की सीटेंकांग्रेस की सीटें
19961741106733
2002881439825
2007519720622
2012472248028

साल 2002 के चुनाव में सपा 143 सीटों के साथ प्रदेश की सबसे बड़ी और बसपा 98 सीटों के साथ दूसरे नबंर की पार्टी बनी। इस चुनाव में बीजेपी को 88 सीटें और 20% वोट प्राप्त हुआ। कांग्रेस को राज्य में सिर्फ 25 सीटें मिलीं। इसके बाद साल 2007 के चुनाव में बसपा और फिर साल 2012 में सपा ने राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।

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