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Gyanvapi Masjid: शिवलिंग नहीं फव्वारा है अंदर, बचपन से देखता आया हूं- मस्जिद के पीछे वाले मंदिर के पुजारी का दावा

ज्ञानवापी मस्जिद विवाद पर वाराणसी कोर्ट में सोमवार को सुनवाई पूरी हुई। कोर्ट में कुल 3 याचिकाएं दायर की गई हैं जिसपर कोर्ट सुनवाई ने सुनवाई की। जिला जज ने मंगलवार दोपहर 2 बजे तक के लिए फैसला सुरक्षित रख लिया है।

ज्ञानवापी मस्जिद मामला |  Gyanvapi Mosque Case |  Gyanvapi Masjid Case|
ज्ञानवापी मस्जिद (फोटो: पीटीआई)

ज्ञानवापी मस्जिद का मामला इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। हिंदू पक्ष जहां परिसर में शिवलिंग होने का दावा कर रहा है, वहीं मुस्लिम पक्ष उसे फव्वारा बता रहा है। ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में किए गए सर्वे की रिपोर्ट वाराणसी की कोर्ट को सौंप दी गयी है और मामले में कोर्ट का फैसला आना अभी बाक़ी है। वहीं, काशी विश्वनाथ मंदिर के ठीक पीछे स्थित काशी करवत मंदिर के महंत पंडित गणेश शंकर उपाध्याय ने इस विषय पर कुछ और ही दावा किया है। महंत गणेश शंकर उपाध्याय का कहना है कि ज्ञानवापी मस्जिद सर्वे में जो शिवलिंग जैसी आकृति मिली है वो शिवलिंग नहीं, बल्कि फव्वारा ही है।

50 सालों से फव्वारे को देखते आ रहे: गणेश शंकर उपाध्याय ने यह भी दावा किया कि वह पिछले 50 सालों से फव्वारे को देखते आ रहे थे, लेकिन उन्होंने इसे कभी भी चालू नहीं देखा था। आजतक के साथ एक इंटरव्यू में काशी करवत के महंत ने कहा, “ये संरचना कई लोगों को शिवलिंग की तरह लग सकती है, लेकिन मेरी जानकारी के अनुसार यह एक फव्वारा है। इस फव्वारे को मैंने बचपन से देखा है। अब लगभग 50 साल हो गए हैं।” महंत ने कहा कि उन्होंने कई बार संरचना को बहुत करीब से देखा और मस्जिद के कार्यकर्ताओं और मौलवियों के साथ बातचीत की।

मुगल काल का है फव्वारा: महंत ने कहा कि मैंने मस्जिद में लोगों ने इस बारे में पूछा भी कि ये कब चलता है, उसका फव्वारा देखने में कैसा लगता है। इस पर सेवादार या मौलवी बताते थे कि ये फव्वारा मुगल काल का है। महंत गणेश शंकर उपाध्याय ने आगे बताया कि मीडिया में जो वीडियो दिखाया जा रहा है, जिसमें वहां कुछ सफाईकर्मी दिख रहे हैं। चूंकि जो फोटो ऊपर से लिया गया है उसमें नीचे दिख रही आकृति शिवलिंग जैसी लग रही है।

ठीक सामने नंदी की मौजूदगी के सवाल पर पंडित गणेश शंकर उपाध्याय ने कहा कि यह तो कटु सत्य है कि वहां मंदिर था और मुगल शासन में उसे तोड़कर उस पर मस्जिद बनाया गया था। उन्होंने कहा कि पीछे अभी भी मंदिर का कुछ भाग बचा हुआ है। साथ ही उन्होंने कहा कि जिसे तहखाना बताया जा रहा है, वह वास्तव में तहखाना नहीं है।

महंत उपाध्याय ने कहा कि फर्स्ट फ्लोर पर ही सिर्फ मस्जिद है। तहखाने में जो खंभे दिख रहे हैं, उसे देखने से लगता है कि वहां मंदिर था। वजूखाने के सवाल पर महंत ने कहा कि लोग कहते हैं कि मुस्लिम वहां कुल्ला करते हैं, हाथ धोते हैं। कुल्ला करने की जगह बाहर है। मुस्लिम समाज के लोग वहां से पानी लेते थे और फिर बाहर आकर वजू करते थे।

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