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उड़ान: घाटी की गहराइयों में ही दफन हो जाते हैं सपने

जम्मू और कश्मीर के वे हिस्से जो विकास में पीछे रह गए हैं वहां की लड़कियों के लिए शहर जाकर पढ़ना काफी मुश्किल होता है। क्योंकि वहां के लोगों की सोच को अलगावाद प्रभावित करता है। मेरी स्कूली पढ़ाई कश्मीर के अखनूर आर्मी स्कूल में हुई है। मेरा परिवार कानपुर से अब कश्मीर में बस गया है।

Author July 19, 2018 2:57 AM
सुनहरे भविष्य का सपना लेकर दिल्ली आए छात्र मानते हैं कि जब तक हालात नहीं सुधरते वहां बढ़िया तालीम मिल पाना मुमकिन नहीं है

सुमन केशव सिंह

इन दिनों घाटी सुलग रही है। कभी अलगाववादियों की ओर से बंद तो कभी प्रशासन की ओर से कर्फ्यू, कभी राजनीतिक पार्टियों की ओर से बंद की अपील। इन सब के बीच वहां कोई पिस रहा है तो केवल वहां के बच्चे, युवा, लड़कियां और उनकी पढ़ाई। सुनहरे भविष्य का सपना लेकर दिल्ली आए छात्र मानते हैं कि जब तक हालात नहीं सुधरते वहां बढ़िया तालीम मिल पाना मुमकिन नहीं है…

शहर जाकर पढ़ना मुश्किल

जम्मू और कश्मीर के वे हिस्से जो विकास में पीछे रह गए हैं वहां की लड़कियों के लिए शहर जाकर पढ़ना काफी मुश्किल होता है। क्योंकि वहां के लोगों की सोच को अलगावाद प्रभावित करता है। मेरी स्कूली पढ़ाई कश्मीर के अखनूर आर्मी स्कूल में हुई है। मेरा परिवार कानपुर से अब कश्मीर में बस गया है। कश्मीर में केवल 30 फीसद लड़कियां ही शिक्षित हो पाती हैं। वहां की लड़कियां को बहुत सी ऐसी समस्याओं से रूबरू होना पड़ता है । मैं वहां सैन्य क्षेत्र में रहती हूं, इसलिए सुरक्षित महसूस करती हूं। लेकिन आस-पास की स्थिति काफी खराब है। मेरे पिता सैन्यकर्मी हैं इसलिए कश्मीर से निकलना आसान था लेकिन बाकी के सपने घाटी में दम तोड़ देते हैं।
-संगीता यादव, दिल्ली के आंबेडकर कॉलेज की छात्रा

पलायित होने के लिए मजबूर

मैं एक प्रतिष्ठित समाचार चैनल के लिए सोपोर से अल्पकालिक फोटोग्राफी भी करता हूं। पलायन की सबसे बड़ी वजह वहां लगातार जारी आंदोलन और टकराव है। इसलिए वहां कॉलेजों में उच्च शिक्षा की बेहतर व्यवस्था नहीं हो पा रही है। छात्रों के बेहतर भविष्य के लिए जरूरी है वहां शांति का माहौल बने। परीक्षाएं सही समय पर हों। यहां एक कोर्स पूरा होने में इतना समय लग जाता है कि छात्र करिअर का चयन ही नहीं कर पाते हैं। इसलिए कुलीन और मध्यवर्गीय परिवार अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए उन्हें बाहर भेजना ज्यादा उचित समझते हैं। जिस प्रकार वहां की स्थिति बनी हुई है उससे वहां न कोई कंपनी आती है और न ही वहां कोई प्लेसमेंट होता है। ऐसे में बेहतर पढ़ाई और अच्छे भविष्य के लिए छात्रों के सामने अपना घर छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है।
-इशान पीर, जलंधर के एक कॉलेज में बीजेएमसी छात्र

पढ़ाई-लिखाई में होता है भेदभाव

मैं कश्मीर के नवाकडल के महिला कॉलेज से पढ़ाई की है।1986 के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई की। वहां और यहां की पढ़ाई में खुलेपन का अंतर है। मैं श्रीनगर के गाउन टाउन में रहती थी। वहां लड़कियों की संख्या कम होती थी। वहां हर जगह धार्मिक आधार पर भेदभाव दिखाई देता है।
-रीता धर, भारतीय लोक प्रशासन संस्थान में
स्वास्थ्य शिक्षा की सह निदेशक

स्कूल-कॉलेज जाने पर अभिभावक रहते हैं चिंतित

कश्मीर में मदरसों की पढ़ाई पर जोर है। आइटी कॉलेज खोले गए हैं लेकिन जब तक माहौल नहीं सुधरेगा, पढ़ाई संभव नहीं है। कॉलेज खोल देना समस्या का हल नहीं है। माहौल में सुधार जरूरी है। लड़कों को तो फिर भी दूसरे स्कूलों-कॉलेजों में पढ़ने की इजाजत मिल जाती है लेकिन लड़कियों को नहीं। वहां धार्मिक कट्टरपंथ मदरसों की पढ़ाई पर जोर देता है। मैं जम्मू-कश्मीर के तलाब तिलोह इलाके का हूं। वहां शाम पांच बजे के बाद घर से निकलने की इजाजत नहीं होती। नौ बजे कर्फ्यू लग जाता है। घरों में बत्ती जलाने पर रोक है। ऐसे में चाह के भी कोई बच्चा कैसे पढ़ सकता है।
-चिराग कौल , दिल्ली में मीडिया के छात्र

माहौल ठीक नहीं

दि ल्ली और देश के दूसरे हिस्सों के माहौल से कश्मीर घाटी की शिक्षा व्यवस्था की तुलना नहीं की जा सकती है। पुंछ, राजौरी और टांडा जैसे इलाके में शिक्षा का माहौल नहीं है। वहां लड़कियों के लिए मदरसे की शिक्षा पर जोर दिया जाता है। यदि कोई कश्मीरी अपने बच्चे को पढ़ाना भी चाहे तो वहां के इलाकों में परिवहन की व्यवस्था ठीक नहीं है। अब कश्मीर के लोग भी अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं लेकिन वहां से बाहर निकले बगैर पढ़ाई संभव नहीं है।
-फिजा काजमी

दिल्ली सरीखा पढ़ाई का वातावरण घाटी में नहीं

कश्मीर में पढ़ाई का बिल्कुल भी माहौल नहीं। वहां शाम ढलने के बाद बत्ती जलाने की इजाजत नहीं है। 10वीं व 12वीं के बच्चों तक की कभी भी कहीं भी तलाशी ली जा कसती है। मैं करीब पांच साल से दिल्ली में हूं। जाहिर है यहां घाटी जैसा माहौल नहीं है। लेकिन घाटी में हर पांच मिनट में दो बार सेना के गश्ती दल और फौजियों के जूतों की आवाज आती है। ऐसे में वहां माहौल पढ़ाई के लिए नहीं बन पाता। मैं कश्मीर के बारामुला टाउन शोपोर का रहने वाला हूं। मेरे घर वाले चाहते हैं कि मैं वहां कभी न जाऊं।
– अशफाक अहमद ,
सिक्किम मनिपाल यूनिवर्सिर्टी में एमबीए के छात्र

घाटी में ज्यादा स्कूल-कॉलेज नहीं

घाटी में जारी अलगाववाद और सैन्य गतिविधियों के कारण पढ़ाई का माहौल नहीं बन पाता। फिर घाटी में बहुत ज्यादा स्कूल कॉलेज नहीं। बाहर जाकर पढ़ने के लिए घाटी से जम्मू तक जाने के लिए समुचित परिवहन के साधन उपलब्ध नहीं। कश्मीर के मूल निवासी मध्य और निम्न आय वर्ग के हैं और वे अपनी बच्चियों को बाहर पढ़ने के लिए नहीं भेज सकते। मुझे 12वीं के बाद स्कूल छोड़ना पड़ा। हालांकि मैं पढ़ना चाहती थी लेकिन वहां के माहौल से यह मुमकिन नहीं हुआ।
-आसफा कुरैशी

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