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अब मौसम की मार से बचाया जा सकेगा सियाचिन में सैनिकों को

इसरो के वैज्ञानिकों ने खोज एवं बचाव कार्य में मदद करने वाले छोटे उपकरण भी तैयार किए हैं। दुर्गम और निर्जन इलाकों में जाते समय पर्वतारोही या सैनिक इन छोटे उपकरणों को अपने हाथ में रख सकते हैं।

Author तिरुवनंतपुरम | April 4, 2016 02:42 am
सियाचिन में अक्सर दिन में तापमान शून्य से 40 डिग्री नीचे और रात में माइनस 70 डिग्री तक चला जाता है।

बेहद ऊंचाइयों पर स्थित सियाचिन ग्लेशियर में तैनात सैनिकों के लिए पाकिस्तानी सेना की गोलियों से भी बड़ा दुश्मन है वहां का बेहद सर्द मौसम। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा अतंरिक्ष में इस्तेमाल के लिए विकसित की गई कुछ तकनीकों को यदि जल्द ही प्रभावी तरीके से हमारे सैनिकों की सुरक्षा में लगाया जाए, तो वहां मरने वाले सैनिकों की संख्या में बड़ी गिरावट आ सकती है।

इसरो ने दुनिया का सबसे हल्का उष्मारोधी पदार्थ खोजा है और उच्च क्षमता से लैस खोजी एवं बचाव बीकन (संकेत दीप) तकनीकें विकसित की हैं। ये सियाचिन जैसे इलाके में भारतीय सैनिकों के लिए मददगार साबित हो सकते हैं। 1984 में भारत द्वारा इन बर्फीली चोटियों को अपने अधिकार में लिए जाने के बाद से अब तक वहां लगभग 1000 सैनिक जान गंवा चुके हैं। आधिकारिक रिकॉर्डों के मुताबिक इनमें से सिर्फ 220 सैनिक ही ऐसे थे, जिनकी मौत दुश्मन की गोलियों से हुई। 6000-7000 मीटर ऊंचाई पर खराब मौसम सैनिकों की मौत का एक बड़ा कारण है।

कई सुधारों के बावजूद, अब भी भारतीय सैनिक बहुत भारी कपड़े ही पहनते हैं। अब इसरो के वैज्ञानिकों ने एक बेहद हल्के वजन वाला पदार्थ विकसित किया है, जो एक प्रभावी ऊष्मारोधक (इंसुलेटर) की तरह काम करता है। हाथ में पकड़कर इस्तेमाल किया जा सकने वाला ‘खोज एवं बचाव’ रेडियो सिग्नल एमिटर (उत्सर्जक) सैनिकों के लिए एक अन्य उपयोगी उपकरण साबित हो सकता है। इसके सिग्नलों को उपग्रहों के जरिए पहचाना जा सकता है। इससे लापता या हिमस्खलन में दबे सैनिकों की स्थिति का प्रभावी ढंग से पता लगाने में मदद मिल सकती है।

जाने-माने रॉकेट वैज्ञानिक एवं तिरूवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) के निदेशक के. सिवान का कहना है कि उच्च स्तरीय अंतरिक्षीय अनुप्रयोगों के लिए विकसित किए गए इन पदार्थों और तकनीकों में थोड़े से सुधार के बाद इन्हें सामाजिक इस्तेमाल के लिए आसानी से तैयार किया जा सकता है।

उन्होंने कहा,‘इसरो करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल करता है, इसलिए यह भारतीय जनता के प्रति जवाबदेह है।’ वीएसएससी जैसे ‘प्रौद्योगिकी के मंदिरों’ में ऐसी कई और चीजें हैं, जिनका इस्तेमाल जिंदगियां बचाने के लिए किया जा सकता है। यदि इनमें से कुछ तकनीकों का इस्तेमाल किया गया होता, तो इस साल की शुरूआत में सियाचिन में अपनी जान गंवाने वाले लांस नाइक हनमनथप्पा कोप्पड और अन्य नौ सैनिकों की जिंदगियां शायद बचाई जा सकती थीं। अगर इन सैनिकों के कपड़े ही ‘सिलिक एयरोजेल’ से बने होते, तो भी शायद उन्हें ठंड से मरने से बचाया जा सकता था। इसी तरह यदि इन सैनिकों के हाथों में ‘खोज और बचाव’ उपकरण होते तो उनकी स्थिति का पता भारतीय उपग्रहों का इस्तेमाल करके आसानी से और जल्दी लगाया जा सकता था।

इसरो ने हाल ही में ‘दुनिया का सबसे हल्का कृत्रिम पदार्थ’ बनाने में दक्षता हासिल की है। इस पदार्थ का नाम ‘सिलिका एयरोजेल’ है। यह ठोस है लेकिन इसकी जटिल संरचना कुछ ऐसी है कि इसमें 99 प्रतिशत हवा है। इसके कारण यह बेहद हल्का और ऊष्मा का जबरदस्त रोधक है। इस पदार्थ को बनाने वाले दल की सदस्य और एडवांस्ड मैटिरियल्स एंड सिरेमिक्स डिविजन में वैज्ञानिक नागा प्रिया ने बताया कि ‘सिलिका एयरोजेल’ बनाने की प्रक्रिया बेहद महफूज है, इसलिए इस प्रक्रिया के मानकीकरण में उनके दल को बहुत प्रयास करने पड़े।

उनकी टीम को उम्मीद है कि कुछ ‘सिलिका एयरोजेल’ का इस्तेमाल क्रायोजेनिक इंजनों में द्रवित हाइड्रोजन और द्रवित ऑक्सीजन वाले टैंकों के ताप अवरोधन के लिए किया जा सकता है। चूंकि इसका वजन कम है, ऐसे में इसका इस्तेमाल अंतरिक्ष में पहने जाने वाले स्पेस सूट बनाने में किया जा सकता है और इसका इस्तेमाल भारतीय अंतरिक्षयात्री भविष्य में कर सकते हैं। 2018 में चंद्रमा की सतह पर उतरने वाले चंद्रयान-2 के साथ जाने वाली छोटी बग्गी में भी ‘सिलिका एयरोजेल’ का इस्तेमाल ऊष्मा रोधक के रूप में किया जा सकता है।

नागा प्रिया ने कहा कि ‘सिलिका एयरोजेल’ की पतली परत खिड़कियों के शीशों पर चढ़ा दी जाती है तो प्रकाश तो आसानी से अंदर आएगा लेकिन गर्मी वहीं रुक जाएगी,‘जरा ऐसी इमारत की कल्पना कीजिए जिसके बाहरी हिस्से पर ‘सिलिका एयरोजेल’ की परत चढ़ी हो। यह इमारत गर्मियों में ठंडी और सर्दियों में गर्म रहेगी।

इसरो के वैज्ञानिकों ने खोज एवं बचाव कार्य में मदद करने वाले छोटे उपकरण भी तैयार किए हैं। दुर्गम और निर्जन इलाकों में जाते समय पर्वतारोही या सैनिक इन छोटे उपकरणों को अपने हाथ में रख सकते हैं। इन्हें एक बटन दबाकर सक्रिय किया जा सकता है। इनके चालू होते ही इनसे एक रेडियो सिगनल निकलता है, जिसकी पहचान उपग्रहों के माध्यम से हो सकती है। जीपीएस का इस्तेमाल करके मुसीबत में फंसे व्यक्ति की मौजूदा स्थिति का पता लगाया जा सकता है।
वीएसएससी ने एक ऐसा ही थोड़ा बड़ा उपकरण भी तैयार किया है, जिसे मछली पकड़ने वाली नौकाओं पर लगाया जा सकता है। इसे खुद भी चालू किया जा सकता है और नमकीन पानी के संपर्क में आने पर यह अपने आप भी चालू हो सकता है। यह समुद्र में खोए हुए जहाजों का पता लगाने में मदद कर सकता है।

इनकी बैटरियां कम से कम 65 घंटे तक सिगनल दे सकती हैं। इसरो ने हिमालय क्षेत्र में फंसे कई पर्वतारोहियों को बचाने में मदद की है और वह भारतीय सशस्त्र बलों की भी मदद का इच्छुक है। आपात स्थिति में सुदूर इलाकों में इस उपकरण का इस्तेमाल करके ऐसा किया जा सकता है।

सुदूर इलाकों में निर्बाध बिजली आपूर्ति तकनीकविदों के लिए एक सपने की तरह रही है लेकिन अब वीएसएससी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी हल्की ईंधन सेल प्रणाली विकसित की है, जो एक विद्युत रासायनिक प्रक्रिया की मदद से सीधे ईंधन से बिजली बना सकती है। इसमें सिर्फ हाइड्रोजन और हवा की जरूरत होगी। यह गैजेट 100 वॉट तक की बिजली पैदा कर सकता है। इन सेलों से चलने वाले और आॅटोमेटिक रूप से संचालित होने वाले कैमरों का इस्तेमाल सुदूर इलाकों में सीसीटीवी कैमरों के रूप में किया जा सकता है। इससे सैनिकों को दूर से भी किसी क्षेत्र विशेष की निगरानी करने में मदद मिलेगी।

सिवान ने कहा कि इन तकनीकों के लिए उद्योग जगत के उचित साझेदारों की पहचान की जा रही है और तकनीकों का हस्तांतरण किया जाएगा ताकि कथित ‘रॉकेट साइंस’ सिर्फ रॉकेट साइंस ही बनकर न रह जाए। इससे भी अहम यह है कि ‘देसी तकनीक’ का इस्तेमाल ‘मेक इन इंडिया’ के प्रयास को बल देने के लिए और जिंदगियों को बचाने में किया जा सके।

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