पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर अब भारत पर भी पड़ने लगा है। दिल्ली-NCR में गैस एजेंसियों के बाहर उपभोक्ताओं की लंबी कतारें लग रही हैं। कई जगहों पर हालात इतने बिगड़ गए कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन को पुलिस बल तैनात करना पड़ रहा है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति बाधित होने का असर स्थानीय बॉटलिंग प्लांट और वितरण व्यवस्था पर साफ दिखाई दे रहा है।
आम जनता की क्या स्थिति है?
जनसत्ता के सहयोगी शुभम गर्ग ने बुधवार को ग्राउंड जीरो पर हालात का जायजा लिया। इस दौरान उन्होंने विभिन्न उपभोक्ताओं और सर्विस प्रोवाइडर से बात करके यह जानने की कोशिश की कि दिक्कतें कहां और क्यों आ रही और आम जनता की क्या स्थिति है।
जनसत्ता से बात करते हुए एक उपभोक्ता ने कहा – मुझे सुबह से दौड़ा रहे हैं। कहते हैं 31 दिनों के अंतराल पर एक सिलेंडर मिलेगा। मेरी 8-9 लोगों की फैमिली है। ऐसे में हम किस तरह खाना बनाएं और खाएं। कस्टमर केयर से भी कोई मदद नहीं मिल रही। भाग-भागकर परेशान हो रहे बस। आम लोगों को काफी दिक्कत हो रही है।
एक अन्य महिला ने बताया कि वो मंगलवार रात से ही लाइन में लगी है। घर में ईंधन नहीं होने की वजह से चूल्हे पर खाना बनाने को मजबूर है। लकड़ियां भी नहीं मिल रही हैं। परिवार में 5 लोग हैं। ब्लैक में एक सिलेंडर का 2500 रुपये मांग रहे। दोगुना से अधिक पैसे वसूल रहे। रिफीलिंग के भी चार्ज 200-250 रुपये प्रति किलो हो गए हैं।
सिलेंडर लेने आए एक बच्चे ने बताया कि एक दुकान पर 600 रुपये प्रति किलो गैस रिफीलिंग हो रही थी। घर में 5 दिन से गैस नहीं है। खाना होटल से खा रहे। एक महिला ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि घर में ईंधन नहीं है, ड्यूटी छोड़कर गैस की सिलेंडर के लिए भागदौड़ कर रहे। ऐसे तो बच्चे भूखे मर जाएंगे।
वहीं, इस दौरान एक सर्विस प्रोवाइडर ने जनसत्ता को बताया कि सरकार की गाइडलाइन घरेलू गैस सिलेंडर देने को लेकर 25 दिन की हो गई। पहले यह अवधि 15 दिन थी, फिर 21 दिन हुई और अब 25 दिन हो गई। 25 दिन पूरे होने के बाद जिस उपभोक्ता की बुकिंग हो जाएगी, उसे सिलेंडर मिलेगा। इस परिस्थिति में नहीं बुकिंग होने पर भी गैस मिलेगी। बशर्ते मेरे पास सिलेंडर हों। बुकिंग में दिक्कतें सरकार की समस्या है। हमारी नहीं।
दिहाड़ी करने वाली एक महिला ने कहा कि अब मैं लकड़ी चुनकर लाऊंगी और खाना बनाऊंगी। सिलेंडर खरीदना अब हमारे वश की बात नहीं है। एक अन्य महिला ने बताया कि घर में 4 दिन से गैस नहीं है। परिवार को लोग खाना होटल से खरीदकर खा रहे। वहां भी खाना महंगा हो गया है। सिलेंडर मिलने के बाद एक शख्स ने कहा कि बहुत जद्दोजहद करनी पड़ी। काफी भागदौड़ के बाद गैस सिलेंडर मिल पाई।
गैस को लेकर समस्या बयां करने के साथ ही लोगों ने अमेरिकी राष्ट्रपति और युद्ध पर भी अपनी प्रतिक्रिया दी। लोगों ने कहा कि पहले से ही महंगाई है। ऊपर से युद्ध के कारण स्थिति और बदतर हो रही है। बहरहाल, कई लोगों से बातचीत के बाद जनसत्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि घरेलु गैस की समस्या वाकई है। हालांकि, बेहतर मैनेजमेंट और समझादारी से इसे सुलझाया जा सकता है। साथ ही लोग दूसरे विक्लप जैसे इंडक्शन व अन्य उपकरण का भी रूख कर सकते हैं, जो खाने बनाने के सहायक हैं।
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पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर अब देश के औद्योगिक शहरों तक पहुंचने लगा है। नोएडा और गाजियाबाद में गैस एजेंसियों के बाहर उपभोक्ताओं की लंबी कतारें लग रही हैं। कई स्थानों पर हालात इतने बिगड़ गए कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन को पुलिस बल तैनात करना पड़ा। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति बाधित होने का असर स्थानीय बॉटलिंग प्लांट और वितरण व्यवस्था पर साफ दिखाई दे रहा है। पूरी खबर पढ़ें…
