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दुनिया मेरे आगे: हौसले की चमक

जिस लक्ष्य को साध कर उन्होंने इतनी लंबी लड़ाई लड़ी है, सिर्फ उसे ही वे अपने व्यक्तित्व से जुड़ा सबसे प्राथमिक विषय मानती हैं।

Author September 27, 2016 5:13 AM
प्रेस कॉन्फ्रेंस करतीं इरोम शर्मिला। (पीटीआई फाइल फोटो)

ज्योति ठाकुर

कुछ समय पहले इरोम शर्मिला से मिली तो उन्होंने बहुत सारी बातों के बीच यह भी कहा था- ‘मैं भी एक सामान्य जीवन जीना चाहती हूं, और लोगों की तरह।’ उनकी इस बात का महत्त्व तात्कालिक नहीं, स्थायी है, लेकिन यह मेरे जेहन में बीते कुछ दिनों लगातार उथल-पुथल मचा रही है और इस कोशिश में हूं कि इसकी संवेदना को समझ सकूं। इरोम चानू शर्मिला ने हाल ही में अब तक का सबसे लंबा अनशन इस घोषणा के साथ समाप्त किया कि वे मणिपुर की क्षेत्रीय राजनीति में उतरेंगी। लेकिन ये बातें उनके प्रत्यक्ष सरोकार से जुड़ी थीं। एक खास बात उन्होंने यह कही कि वे पिछले कई सालों से जिस व्यक्ति से प्रेम करती हैं, उससे विवाह भी करेंगी। हालांकि उन्होंने साफ कहा कि ‘अफस्पा’ यानी सशस्त्र बल विश्ोष शक्ति अधिनियम के खिलाफ उनकी लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक वे जिंदा हैं।

लेकिन मेरी हैरानी का मामला उनके राजनीतिक फैसलों पर उभरे मतविरोध पर नहीं है। उनके प्रेम विवाह करने के फैसले की घोषणा से लोग जिस तरह चौंके और इसे उनकी प्रच्छन्न राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा का परिणाम बताया, उसने मुझे बेहद परेशान किया। मेरे सामने सबसे पहला सवाल यही उभरा कि क्या एक आंदोलन करने वाली स्त्री को प्रेम करने का अधिकार नहीं है? आखिर इरोम को प्रेम क्यों नहीं करना चाहिए? प्रेम एक निजी भाव है। लेकिन सामाजिक जीवन में शांति लाने के लिए निरंतर सोलह सालों तक जिस महिला ने अन्न-जल त्याग कर सत्याग्रह किया, उन पर आत्महत्या करने के प्रयास के आरोप लगाए गए, वे अनेक बार गिरफ्तार हुर्इं, अपने घर-परिवार से दूर रहीं, उसे किस ‘नैतिक आधार’ पर प्रेम के अधिकार से वंचित माना जाए? क्या प्रेम करना किसी भी विशेष हो गए व्यक्ति के सामान्य अधिकारों में नहीं आता है? सामान्य हुए बिना क्या विशेष हुआ जा सकता है?

मैं इन सवालों का आदर्शीकरण नहीं कर रही। इन्हें अनुत्तरित छोड़ने के बावजूद मैं इरोम के उन्हीं शब्दों को दोहराना चाहती हूं कि ‘मैं भी एक सामान्य जीवन जीना चाहती हूं, और लोगों की तरह।’ एक नहीं, दो नहीं, अपना परिवार या गांव नहीं, पूरे मणिपुर से ‘अफस्पा’ को हटाने के लिए इरोम ने एक ऐसा आंदोलन शुरू किया जो केवल अन्न-जल के त्याग से जुड़े शारीरिक कष्ट तक सीमित नहीं था। उसमें शामिल था एक अट्ठाईस वर्षीय स्त्री द्वारा अपनी हर स्त्रियोचित इच्छा, हर सपने का त्याग, अपनी मां को न देख पाने का त्रास और सबसे बढ़ कर अपनी आत्मा की आवाज को सत्ता की बहरी गलियों में सुनाने के लिए निरंतर प्रयास।

यह सब क्या मानवता के प्रति उनके प्रेम के बिना संभव हो सकता था? अगर प्रेम नहीं होता तो नौ बच्चों के परिवार में सबसे छोटी शरारती लड़की इरोम उम्र के उस पड़ाव में जब अमूमन कोई स्त्री प्रेम या विवाह कर अपना परिवार बसाती है, वह तमाम स्त्रियों और अन्य लोगों पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए इतना लंबा अनशन नहीं करती। प्रेम केवल दो लोगों को नहीं जोड़ता है, एक को दूसरे के लिए सब कुछ की तय सीमा को तोड़ कर लड़ने के लिए भी प्रेरित करता है। ‘सर्वस्व’ के हित के लिए ‘स्व’ के स्तर पर त्याग करने के लिए मजबूर कर देता है।

हालांकि इरोम से हुई चंद मुलाकातों में उन्होंने मुझसे अपने निजी जीवन या परिवार के बारे में कम बातें की। जिस लक्ष्य को साध कर उन्होंने इतनी लंबी लड़ाई लड़ी है, सिर्फ उसे ही वे अपने व्यक्तित्व से जुड़ा सबसे प्राथमिक विषय मानती हैं। इन सब बातों के बावजूद इरोम के जीवन का एक निजी पक्ष भी है। वे जिस परिवार से संबंध रखती हैं या जो उनके मित्र हैं, उनकी इरोम वह नहीं है, जिसे दुनिया जानती है। ‘लौह-स्त्री’ की छवि से अलग एक इरोम वह भी हैं, जो बात-बात पर बच्चों की तरह खिलखिला उठती हैं या आहत होने पर रोने लगती हैं। यानी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में ख्यात होने के साथ उनके व्यक्तित्व का एक सामान्य मानवीय पहलू भी है, जिसे नकारने या जिसके विषय में कोई निर्णय लेने का अधिकार किसी और को नहीं है। इरोम अगर प्रेम या विवाह करती हैं तो यह उनका निजी फैसला है। अगर हम इसके आधार पर इरोम के विषय में कोई धारणा या पूर्वग्रह बनाते हैं तो समस्या हमारे भीतर है, इरोम के साथ नहीं। वे एक आंदोलनकारी हैं, समाज के लिए समर्पित जुझारू मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। लेकिन इन सबसे पहले वे एक इंसान हैं। इंसानी जीवन से जुड़े भावबोध और अनिवार्यताओं से अलग कर या काट कर उन्हें किसी सतही आदर्श या नैतिक कठघरे में बांध कर देखने का हमें कोई हक नहीं है। जिस तरह वे अब तक के अपने जीवन के सामने खड़ी चुनौतियों का सामना करती रही हैं, आगे भी उसी हौसले के साथ हम सबको दिखेंगी। उनके लिए मेरे शब्द भी वही हैं जो उन्होंने मुझसे कहा था- इरोम ‘जस्ट ग्लो, डोंट ब्लो’! इरोम की यह चमक कभी धीमी नहीं पड़े।

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