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आमने-सामनेः ‘मेरी सामाजिक पृष्ठभूमि लेखन की सबसे बड़ी ताकत है’

अपने लेखन के माध्यम से लोक-मानस की अनुकृतियों को उकेरने वाले और सक्रिय कथाकारों में से एक भगवानदास मोरवाल की समकालीन हिंदी-कथा साहित्य में एक खास पहचान है।
सक्रिय कथाकारों में से एक भगवानदास मोरवाल

अपने लेखन के माध्यम से लोक-मानस की अनुकृतियों को उकेरने वाले और सक्रिय कथाकारों में से एक भगवानदास मोरवाल की समकालीन हिंदी-कथा साहित्य में एक खास पहचान है। ‘काला पहाड़’, ‘बाबल तेरा देस में’, ‘रेत’, ‘नरक मसीहा’, ‘हलाला’ और हाथरस शैली की नौटंकी को केंद्र में रख कर लिखे गए और शीघ्र प्रकाशित ‘सुर बंजारन’ जैसे उपन्यास बताते हैं कि मोरवाल किस तरह आम आदमी की प्रबल अदम्यता और जिजीविषा से जूझते हैं।

सवाल : अभी के माहौल में एक बेचैनी है। एक रचनाकार के रूप में आज के समाज की कौन सी चीज आपको सबसे ज्यादा बेचैन करती है?
’आज के माहौल में बेचैनी रेखकीय नहीं बल्कि एक साथ कई मोर्चों पर देखी जा सकती है। एक तरफ यह बेचैनी आर्थिक मोर्चे पर रोजाना घटते रोजगारों के रूप में, तो दूसरी तरफ समाज में निरंतर बढ़ती असहिष्णुता के रूप में देखी जा सकती है। कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां कोई बेचैनी न हो। मेरा मानना है कि इस बेचैनी को धार्मिक उन्माद सबसे ज्यादा पोषित कर रहा है। इसके कारण हमारी सामाजिक समरसता, सौहार्द और अखंडता को सबसे अधिक चोट पहुंची है।

सवाल : उग्र राष्ट्रवाद के इस दौर में साहित्य की ऊर्जा को कैसे देखते हैं?
’राष्ट्रवाद की आम अवधारणा के मुताबिक, राष्ट्र सर्वोपरि होता है। किसी भी राष्ट्र की उन्नति एवं संपन्नता के लिए नागरिकों में सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई विविधता से ऊपर उठकर यह अवधारणा राष्ट्र के प्रति अनुराग की भावना को मजबूती देती है। दुर्भाग्य से धार्मिक पहचान और विचार को जिस तरह राष्ट्रवाद का पर्याय बना दिया गया है, वह अतिरंजित तो है ही खतरनाक भी है। ईमानदारी से कहूं तो मैं इसे अपने साहित्य की बहुत बड़ी ऊर्जा मानता हूं।

सवाल :सोशल मीडिया ने लिखने वालों का एक नया वर्ग पैदा किया है। क्या इसने साहित्य को किसी तरह की संस्कृति दी है?
’सोशल मीडिया ने बहुत-सी सत्ताओं और चौहद्दियों को नेस्तनाबूद किया है। मगर इसके साथ हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इसमें हो रहा लेखन या साहित्य कोई प्रचार या नाम कमाने का माध्यम या औजार भर नहीं है। न ही लेखन जिंदगी में सफल-विफल होने का कोई गुरुमंत्र है। लेखन तो एक निरंतर चलने वाली और लंबी साहित्य साधना है। मुझे नहीं पता, सोशल मीडिया पर आज जो लेखक नजर आ रहे हैं, वे कल साहित्य की कसौटी पर कितना खरा उतरेंगे। हां, इसने साहित्य को एक नई संस्कृति तो दी है।

सवाल : दलित, आदिवासी और स्त्री। हिंदी साहित्य में इनकी मौजूदगी को कैसे देखते हैं?
’हिंदी साहित्य में इन वर्गों की मौजूदगी से न केवल हिंदी साहित्य का रकबा बढ़ा है बल्कि वह और अधिक समृद्ध हुआ है। कुछ ऐसे समुदाय, जिन्हें हमारा कुलीन सवर्णवादी लेखक समुदाय कभी स्वीकार नहीं करता था, आज दलित और आदिवासी साहित्य के बिना हिंदी साहित्य की परिकल्पना ही असंभव है। स्त्री लेखन ने अपनी जो पहचान और जमीन आज तैयार कर ली है वह इसी विमर्श का परिणाम है। यह बात दूसरी है कि जो व्याधियां पहले कुलीन सवर्णवादी लेखकों में थीं, वैसी ही दलित व आदिवासी लेखन में आ गई हैं।
सवाल :आप अपने लेखन की सबसे बड़ी ताकत किसे मानते हैं?

’मेरे लेखन की सबसे बड़ी ताकत है मेरी सामाजिक पृष्ठभूमि है। मेरी यह पृष्ठभूमि जहां कभी-कभी मेरे आत्मविश्वास को डगमगाती है, वहीं यह मुझे मजबूती भी देती है। शायद यह इसी पृष्ठभूमि के डर का नतीजा है कि मैं अपनी हर रचना को पहले से अधिक चुनौती के रूप में लेता हूं।

सवाल : एक लेखक के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता कितनी जरूरी है?
’बिना वैचारिक प्रतिबद्धता कोई भी व्यक्ति लेखक नहीं हो सकता। यह जहां लेखक की समझ और उसके लेखन को धारदार बनाती है, वहीं वह उसे स्याह और सफेद, अच्छे और बुरे, झूठ और सच का फर्क भी बताती है। यह प्रतिबद्धता किसी विचारधारा विशेष की राजनीतिक पार्टी या सांस्कृतिक मंच में शामिल होने से नहीं बनती है, बल्कि लेखक के समाज में व्याप्त असमानता, शोषण, भेदभाव और उसके लोक की विद्रूपताओं और विडंबनाओं से पैदा होती है।

हां, विचारधारा विशेष की राजनीतिक पार्टी या सांस्कृतिक मंच से जुड़े लेखक में वह आत्मविश्वास जरूरत पैदा करती है। लेकिन कभी-कभी इनसे जुड़ने से उसमें जड़ता का भाव पैदा होता है। सच तो यह है कि एक लेखक की प्रतिबद्धता और उसके सरोकारों की असली परख तो उसके लेखन से होती है।

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