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उत्तर प्रदेशः बिचौलियों के हाथों की कठपुतली!

उत्तर प्रदेश के बिचौलियों ने महंगाई को अपने हाथों की कठपुतली बना लिया है। महंगाई नाम के जिस शब्द से सरकारों की रूह कांपती है, वो बिचौलियों के इशारे पर नाचती है।

Author लखनऊ | December 21, 2017 1:52 AM
फाइल फोटो

उत्तर प्रदेश के बिचौलियों ने महंगाई को अपने हाथों की कठपुतली बना लिया है। महंगाई नाम के जिस शब्द से सरकारों की रूह कांपती है, वो बिचौलियों के इशारे पर नाचती है। जवान किसान की कमर झुकाने और उसे फांसी पर लटक जाने के लिए मजबूर करने में इन्हीं बिचौलियों की बड़ी भूमिका है, जिसकी वजह से महंगाई विकराल रूप धारण करती है। उत्तर प्रदेश में इस वक्त खाद्य सामग्रियों के दाम तय करने वाले बिचौलियों की संख्या करीब दस लाख है। सरकारों से अपने काले कारनामों को सुरक्षित रखने के लिए इन बिचौलियों ने अपने संगठन बना रखे हैं जिनके जिलों से लेकर प्रदेश तक में प्रभारी हैं। प्रदेश की राजनीति में इन बिचौलियों का पिछले दरवाजे से दखल होने की वजह से प्रदेश सरकार का बाट व माप विभाग छापेमारी की खानापूरी के अलावा कुछ नहीं कर पाता। किसान को जिस फसल से बेहतर कमाई की उम्मीद होती है, उसे केवल एक हिस्सा मिल पाता है जबकि दस गुना तक फायदा बिचौलियों के हिस्से जाता है। यह परंपरा पुरानी है, लेकिन अब तक बदस्तूर कायम है। चाहे सरकार योगी की हो या अखिलेश और मायावती की।

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इस बार प्रदेश सरकार ने धान का खरीद मूल्य 1460 रुपए प्रति क्विंटल तय किया है। लेकिन जानकारों का कथन है कि किसान को क्या इस तय राशि का असली भुगतान हो रहा है? यही धान गल्ला मंडियों से होकर चावल मिल तक पहुंचने पर 2200 रुपए की कीमत तक पहुंच जाता है। और थोक विक्रेता के दरवाजे तक पहुंचते-पहुंचते इसकी कीमत 32 रुपए प्रति किलो तक पहुंच जाती है। ये 32 रुपए 35 रुपए में बदल जाते हैं जब ग्राहक मोहल्ले के किराना स्टोर से इसे खरीदते हैं। यानी 14 रुपए 60 पैसे की धान आम आदमी की थाली तक पहुंचते-पहुंचते ढाई गुना बढ़कर 35 रुपए की हो जाती है। बिचौलियों की कोठियां खड़ी हो जाती हैं और किसान कर्ज न चुका पाने की वजह से फंदे पर लटकने को मजबूर हो जाता है।
कुछ ऐसा ही हाल दालों का भी है। औसतन अरहर की दाल 60 रुपए प्रति किलो के दाम पर थोक विक्रेता के गोदाम तक पहुंचती है। यह वह दाल है जिसे बिचौलिए, किसानों से 40 रुपए में खरीदते हैं। बिचौलियों के गोदाम से किराना स्टोर तक पहुुंचने में इस दाल का दाम 80 रुपए से 120 रुपए प्रति किलो तक पहुंच जाता है।

कुछ ऐसा ही हाल सब्जियों का भी है। जो आलू किसान अपने खेत में 15 रुपए में पांच किलो बेच रहा है वही नया आलू लखनऊ समेत उत्तर प्रदेश के खुदरा बाजार में 80 रुपए पसेरी है। मटर 60 रुपए किलोग्राम किसान से खरीद कर 200 रुपए किलोग्राम बेची जा रही है। न कोई रोकने वाला, न ही कोई टोकने वाला। गोभी का फूल दस से पंद्रह रुपए प्रति पीस की दर से खुदरा बाजार में बिक रहा है उसे अपनी कड़ी मेहनत से उगाने वाले किसान को सिर्फ 80 पैसे से एक रुपए प्रति नग ही मिल पा रहे हैं। ये वह हकीकत है जिससे न ही सरकारें मुंह मोड़ सकती हैं और न ही महंगाई रोकने के लिए बने विभाग। प्रदेश सरकार ने किसानों के लिए गांवों में मंडियों का निर्माण कराया है लेकिन वे मंडियां भी बिचौलियों के इशारे पर ही नाचती है। उत्तर प्रदेश में बीते एक सालों में महंगाई किस कदर बढ़ी है, इस बाबत हजरतगंज निवासी शबीना कहती हैं कि दाल और चावल के दाम में तो कोई खास इजाफा नहीं हुआ है। उनके दाम कमोवेश एक साल पहले सरीखे ही हैं। हां, सब्जियों के दामों में जरूर अंतर आया है। आलू, मटर, टमाटर समेत सभी तरह की सब्जियों के दाम में पिछले साल की तुलना में पांच से दस रुपए प्रति किलो का अंतर आया है।

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