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‘भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए शरणस्थली बने संस्थान’

20 फरवरी को आईआईटी-बॉम्बे के शिक्षकों के एक अन्य समूह ने विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में सरकार के ‘अत्यधिक दखल’ और असहमति एवं मतभेदों को दबाने के लिए उसकी निंदा की थी।

Author नई दिल्ली | February 29, 2016 2:17 AM
आईआईटी बॉम्बे के शिक्षक बोले- भारत-विरोधी गतिविधियों की शरणस्थली बन गए हैं कई संस्थान।

आइआइटी बॉम्बे के शिक्षकों के एक समूह ने कहा है कि उच्च शिक्षा के कुछ संस्थान ऐसी गतिविधियों की ‘शरणस्थली’ बन गए हैं, जो राष्ट्रहित में नहीं हैं। शिक्षकों के इस समूह ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से अपील की है कि वे छात्रों को परिसरों में ‘विचारधाराओं के युद्ध का पीड़ित’ न बनने का संदेश दें। 60 सदस्यों की यह याचिका दरअसल आइआइटी-बॉम्बे के ही शिक्षकों के एक अन्य समूह की ओर से बीते दिनों एक बयान जारी करने के बाद आई है। उस समूह ने जेएनयू के आंदोलनरत छात्रों के प्रति समर्थन जताया था और कहा था कि सरकार को ‘राष्ट्रवाद’ का अर्थ थोपना नहीं चाहिए।

राष्ट्रपति को लिखे पत्र में संस्थान के 60 सदस्यों ने दावा किया है कि जेएनयू प्रकरण राष्ट्र हित को ‘कमजोर’ करता है और यह इस बात के पर्याप्त संकेत देता है कि कुछ समूह प्रमुख संस्थानों के युवा मस्तिष्कों का ‘इस्तेमाल’ ‘शांति एवं सदभाव’ के स्थान पर ‘गाली-गलौच और उग्रता’ वाला माहौल बनाने के लिए करने की कोशिश कर रहे हैं।

पत्र में कहा गया कि जेएनयू के अलावा, कई अन्य उच्च शिक्षा संस्थान ऐसी गतिविधियों के लिए शरणस्थली माने जाते हैं, जो कि राष्ट्रहित में नहीं हैं। कुछ बेहद कुशाग्र युवा मस्तिष्क, खुद को शैक्षणिक संस्थानों के लिए स्वस्थ माहौल उपलब्ध करवाने वाली गतिविधियों में लगाने के बजाय, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ऐसी गतिविधियों में शामिल कर लेते हैं जो अकादमिक माहौल बिगाड़ देती हैं।

शिक्षकों ने पत्र में लिखा, ‘हम आपसे विनम्र अनुरोध करते हैं कि आप हमारे देश के युवा कुशाग्र मस्तिष्कों से अपील करें और कहें कि वे विचारधाराओं की लड़ाई में न तो शामिल हों और न ही उनके पीड़ित बनें। वे अपना समय, ऊर्जा और राष्ट्रीय संसाधन बर्बाद न करें, बल्कि गंभीर विद्वता को बढ़ावा देने का काम करें, जो देश को आगे लेकर जाए।’

20 फरवरी को आईआईटी-बॉम्बे के शिक्षकों के एक अन्य समूह ने विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में सरकार के ‘अत्यधिक दखल’ और असहमति एवं मतभेदों को दबाने के लिए उसकी निंदा की थी। शिक्षकों ने एक साझा बयान में कहा था, ‘भारतीय होने के कई अर्थों पर सरकार तानाशाही नहीं चला सकती और वह राष्ट्रवाद के अर्थ पर जनादेश नहीं दे सकती। इसके बजाय, सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी के अपने देश के साथ संबंध के बारे में सोचने के विभिन्न तरीकों को फलने-फूलने दिया जाए, खासतौर पर तब, जबकि ये सोचने के प्रभावी तरीकों से विरोधाभासी हों।’

हालांकि आइआइटी मद्रास के शिक्षकों का एक समूह हाल ही में जेएनयू समारोह के दौरान की गई ‘राष्ट्रविरोधी’ नारेबाजी के बारे में अपने विचार लेकर सामने आया था। इस समूह ने इस संदर्भ में राष्ट्रपति को पत्र भी लिखा था। उन्होंने कहा, ‘जेएनयू में हुई नारेबाजी निश्चित तौर पर प्रशासन या भारत सरकार के साथ मतभेदों को जाहिर करने तक सीमित नहीं थी। ये आवाजें साफ तौर पर जम्मू-कश्मीर को अलग करने की मांग कर रही थी और इसके कारण अकादमिक क्षेत्र में भारी तनाव पैदा हो गया।’

उन्होंने कहा, ‘अफजल गुरु (संसद हमले के दोषी) को मिली मौत की सजा को ‘न्यायिक हत्या’ कह कर विभिन्न समूहों की ओर से लगाए गए नारे हमारी न्यायपालिका, हमारी सरकार और भारत के राष्ट्रपति के कार्यालय का अपमान करके राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के समर्थन के गुप्त उद्देश्योंं को उजागर करते हैं। हम साफ शब्दों में इस अभिव्यक्ति की निंदा करते हैं। हम दृढ़ता के साथ कहते हैं कि भारत की संप्रभुता और अखंडता का सम्मान और रक्षा हर भारतीय का पहला कर्तव्य है।’

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