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शोध-अनुसंधानः भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजा तपेदिक का मूल कारण

कोलकाता स्थित सीएसआइआर-इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ केमिकल बायोलॉजी, बोस इंस्टीट्यूट और जादवपुर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की एक टीम ने पता लगाया है कि मैक्रोफेज नाम की श्वेत रक्त कोशिकाओं द्वारा निर्मित थैलीनुमा ढांचे से टीबी का बैक्टीरिया कैसे बाहर निकलता है। यह एक ऐसा शोध है जिसपर दुनिया भर के शोधकर्ता अध्ययन कर रहे हैं।

Author Updated: August 13, 2019 2:10 PM
शोधकर्ताओं की टीम

भारतीय वैज्ञानिकों ने तपेदिक या टीबी (ट्यूबरकुलोसिस) को जड़ से खत्म करने का इलाज ढूंढ निकाला है। कोलकाता स्थित तीन केंद्रीय शोध संस्थानों के वैज्ञानिकों ने उन कारकों की पहचान की है, जिससे तपेदिक बैक्टीरिया का संक्रमण फैसला है। दुनिया के कई देशों में इस विषय को लेकर शोध चल रहे हैं। भारतीय वैज्ञानिक अब अपने शोध के नतीजों के चिकित्सकीय प्रयोग की तैयारी कर रहे हैं। टीबी फैलाने वाला बैक्टीरिया लंबे समय तक मानव शरीर में निष्क्रिय रह सकता है, यहां तक कि संक्रामक होने से पहले कई दशकों तक निष्क्रिय रह सकता है। दरअसल, शुरुआती दौर में मैक्रोफेज नामक सफेद रक्त कोशिकाएं अन्य संक्रमणों की तरह ही, तपेदिक के बैक्टीरिया से भी लड़ती हैं। लेकिन इस मामले में मैक्रोफेज कोशिकाएं बैक्टीरिया को मारने के बजाय, इसके चारों ओर एक थैली के आकार में ढांचा बना देती हैं, जिसे ग्रेन्युलोमा कहा जाता है। इसकी मौजूदगी से बैक्टीरिया काफी समय तक निष्क्रिय बना रह सकता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने की स्थिति में ग्रेन्युलोमा थैली फटती है और तपेदिक बैक्टीरिया का संक्रमण शुरू हो जाता है।

कोलकाता स्थित सीएसआईआर-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल बायोलॉजी, बोस इंस्टीट्यूट और जादवपुर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की एक टीम ने पता लगाया है कि मैक्रोफेज नाम की श्वेत रक्त कोशिकाओं द्वारा निर्मित थैलीनुमा ढांचे से टीबी का बैक्टीरिया कैसे बाहर निकलता है। यह एक ऐसा शोध है जिसपर दुनिया भर के शोधकर्ता अध्ययन कर रहे हैं। कोलकाता के शोधकर्ताओं के मुताबिक बैक्टीरिया एमपीटी 63 नामक प्रोटीन को शरीर से निकाल देता है। कभी-कभी इन प्रोटीन संरचनाओं में परिवर्तन भी हो जाता है। वह अचानक मेजबान कोशिकाओं यानी मैक्रोफेज के लिए जहरीला बन जाता है। यह कोशिकाओं को नष्ट कर शरीर में बैक्टीरिया फैला देता है।

आइआइसीबी में स्ट्रक्चरल बायोलॉजी एंड बायोइनफॉरमैटिक्स डिवीजन के प्रमुख और टीम लीडर डॉ. कृष्णानंद चट्टोपाध्याय के मुताबिक उनकी टीम अब ट्यूबरकुलोसिस बेसिलस में इन निष्कर्षों का प्रयोग करने की कोशिश करेगी और देखेगी कि क्या इसका उपयोग नए चिकित्सीय उपायों के लिए किया जा सकता है या नहीं। शोधकर्ताओं की टीम में अचिंत्य सन्निग्रही, इंद्राणी नंदी, सायंतनी चैलेंज, जुनैद जिब्रान जावेद, अनिमेष हलदर, सुब्रत मजुमदार और सनत करमाकर शामिल थे। जॉ. चट्टोपाध्याय के मुताबिक, जल्द ही शोध नतीजों को एसीएस केमिकल बायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित कराए जाएंगे।

इस खोज के माध्यम से शोधकर्ता अब एमपीटी 63 के प्रभाव को कम करने के तरीकों को देखना शुरू कर सकते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, हो सकता है कि इस प्रोटीन की वजह से ही वह थैलीनुमा ढांचा फट जाता हो। शोध में पाया गया कि कृत्रिम रूप से उत्पादित एमपीटी63 प्रोटीन अणु अम्लता के विभिन्न स्तरों से प्रभावित होता था। जब अम्लता अधिक होती तो इसकी संरचना नाटकीय रूप से बदल जाती। इस बदले रूप को बीटा-शीट कहा जाता है और यह अम्लीय स्थिति में एक पेचदार रूप में बदल जाता है, जहरीला होकर कोशिका झिल्ली में प्रवेश कर जाता है, परिणामस्वरूप श्वेत रक्त कोशिकाओं की मौत हो जाती है और बैक्टीरिया बाहर निकल जाता है। टीबी एक संक्रामक बीमारी है, जो ट्यूबरकुलोसिस बैक्टीरिया के कारण होती है। इसे तपेदिक और क्षय रोग भी कहा जाता है। टीबी को आज किसी भी अन्य संक्रामक बीमारी से अधिक लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार माना जाता है। 2017 में इस बीमारी ने दुनियाभर में 10 मिलियन लोगों को बीमार किया वहीं 1.6 मिलियन लोगों की जान ले ली। भारत में हर दिन 11,00 से ज्यादा लोगों की मौत टीबी की वजह से होती है।

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