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प्लास्टिक इस्तेमाल करने वाला भारत तीसरा बड़ा देश

राष्ट्रीय हरित अधिकरण में अधिवक्ता और पर्यावरण संबंधी मामलों के जानकार गौरव बंसल बताते हैं कि अदालत द्वारा प्लास्टिक पर पूरी तरह से पाबंदी लगाए जाने के बावजूद देश में कहीं भी इसका इस्तेमाल कम नहीं हुआ है और न ही कहीं कोई प्रयास दिख रहे हैं।

Author April 23, 2018 05:07 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

गजेंद्र सिंह

विश्व के लिए मुसीबत बनते जा रहे प्लास्टिक पर लगाम लगाने के लिए इस बार अंतरराष्ट्रीयीय पटल पर विश्व पृथ्वी दिवस की थीम एंड ऑफ प्लास्टिक पॉल्यूशन यानी प्लास्टिक प्रदूषण रखी गई। भारत की बात करें तो विश्व में तीसरा सबसे बड़ा प्लास्टिक का उपयोग करने वाला देश है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वार्षिक रपट 2015-16 के अनुसार भारत में 15 लाख टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन प्रतिवर्ष होता है।अलग-अलग प्रदेशों में प्लास्टिक बनाने वाली कुल इकाइयां 2243 हैं और प्लास्टिक कंपोस्ट करने वाली केवल एक इकाई है जो उत्तर प्रदेश में है। आंध्र प्रदेश, असम, जम्मू और कश्मीर, झारखंड, मणिपुर, पंजाब, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में कुल मिलाकर 312 गैर पंजीकृत प्लास्टिक कारखाने चल रहे हैं। जिन पर कोई रोक नहीं है।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण में अधिवक्ता और पर्यावरण संबंधी मामलों के जानकार गौरव बंसल बताते हैं कि अदालत द्वारा प्लास्टिक पर पूरी तरह से पाबंदी लगाए जाने के बावजूद देश में कहीं भी इसका इस्तेमाल कम नहीं हुआ है और न ही कहीं कोई प्रयास दिख रहे हैं। प्रदेशों ने अपनी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को जो वार्षिक लेखा-जोखा भेजा है उसमें भी प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है, लेकिन ऐसा नहीं दिखता नहीं है। एसोचैम के प्राइस वाटर हाउस कूपर के साथ किए गए साझा शोध में यह तथ्य सामने आया है कि भारत में कचरा प्रबंधन की स्थिति को देखते हुए 2050 तक करीब 88 स्क्वायर किलोमीटर जमीन की जरूरत कूड़ा प्रबंधन के लिए पड़ेगी। यह क्षेत्र दिल्ली निगम परिषद के क्षेत्र में आने वाली जमीन के बराबर है। 2050 तक भारत की 50 फीसद आबादी शहरी क्षेत्र में रहने लगेगी जिससे पांच फीसद कूड़ा प्रति वर्ष बढ़ेगा। यह 2021, 2031 और 2050 में 101 लाख मीट्रिक टन, 164 और 436 लाख मिट्रिक टन के हिसाब से बढ़ेगा।

कैसे-कैसे प्लास्टिक

पॉलीथिलीन टेरेपैथलेट- कोल्ड ड्रिंक, जूस, पानी, डिटरजेंट के डिब्बों में प्रयोग किया जाता है। इससे अस्थमा और बच्चों में एलर्जी की बीमारियां होती हैं। यूरोप ने 1999 में इस प्लास्टिक का प्रयोग तीन साल तक के बच्चों के लिए बनने वाले खिलौने में करने से मना कर दिया था। हाई डेंसिटी पॉलीथिलीन, लो डेंसिटी पॉलीथिलीन, पॉलीप्रोपलीन जैसे प्लास्टिक कुछ हद तक सुरक्षित माने गए हैं। इनका प्रयोग दूध, पानी, जूस, शैंपू, दवाओं के बोतल, ब्रेड, फ्रोजन खाद्य वस्तु, स्ट्रॉ, अंडे के डिब्बे कंटेनर में प्रयोग किया जाता है।

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