भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है। 15 अगस्त देश की आजादी की याद दिलाता है, लेकिन पंजाब के शाही इमाम मौलाना उस्मान लुधियानवी के लिए अगस्त का महीना 1947 के बंटवारे की दर्दनाक यादें भी साथ लेकर आता है। विभाजन के दौरान उनके परदादा मौलाना हबीब-उर-रहमान ने पाकिस्तान जाने के बजाय भारत में रहने का फैसला किया था।
मौलाना उस्मान लुधियानवी के मुताबिक, अगस्त की बारिश जहां कई लोगों के लिए राहत लेकर आती है, वहीं पंजाब के कई परिवारों के लिए यह विभाजन के दौरान हुए खून-खराबे और विस्थापन की याद भी ताजा करती है। उन्होंने कहा कि पंजाबियों ने आजादी हासिल करने के लिए बड़ा बलिदान दिया और विभाजन का दर्द भी झेला।
लुधियाना में रहते थे कई मुस्लिम परिवार
1947 से पहले लुधियाना के ब्राउन रोड इलाके में कई मुस्लिम परिवार रहते थे। विभाजन के बाद भड़की सांप्रदायिक हिंसा के बीच इनमें से ज्यादातर परिवार पाकिस्तान चले गए। हालांकि, मौलाना हबीब-उर-रहमान ने भारत में ही रहने का फैसला किया।
लुधियानवी के अनुसार, उनके परदादा ने लोगों से भारत में रहने की अपील की थी। उनका मानना था कि विभाजन की पीड़ा आने वाली पीढ़ियों की यादों का हिस्सा बन जाएगी। लेकिन जब लुधियाना में हिंसा भड़की तो उनका परिवार इलाके में लगभग अकेला मुस्लिम परिवार रह गया।
सांप्रदायिक सौहार्द ने बचाया परिवार
हिंसा के उस दौर में परिवार को अपने आसपास के लोगों का साथ मिला। मौलाना उस्मान लुधियानवी ने बताया कि उनके परदादा के मित्र बचित्तर सिंह ने परिवार की सुरक्षा के लिए उनके घर की निगरानी की और हिंसा से बचाने में अहम भूमिका निभाई।
वहीं स्वतंत्रता सेनानी और स्थानीय निवासी प्रभा देवी ने मौलाना हबीब-उर-रहमान से जुड़े स्वतंत्रता आंदोलन के ऐतिहासिक साहित्य और दस्तावेजों को सुरक्षित रखा। हालात सामान्य होने तक परिवार को दिल्ली चले जाने की सलाह दी गई।
1950 में फिर लुधियाना लौटा परिवार
परिवार 1950 में वापस लुधियाना लौट आया। इस दौरान उनके ब्राउन रोड स्थित पुश्तैनी मकान पर एक शरणार्थी का कब्जा था। बाद में उस शरणार्थी को दूसरा मकान आवंटित होने के बाद परिवार दोबारा अपने घर लौट सका। यह मकान आज भी परिवार के पास है। हालांकि, मौलाना हबीब-उर-रहमान का निधन 1956 में दिल्ली स्थित मकान में हुआ।
मौलाना उस्मान लुधियानवी कहते हैं कि उनके परिवार को बचाने में सांप्रदायिक सौहार्द की बड़ी भूमिका रही। वह आज भी बचित्तर सिंह और प्रभा देवी के योगदान को याद करते हैं। उनके मुताबिक, यही वजह है कि वह आज लुधियाना में रहने वाली अपने परिवार की चौथी पीढ़ी के सदस्य हैं और खुद को गर्वित भारतीय मानते हैं।
परिवार की यादों से लिखी किताब
मौलाना उस्मान लुधियानवी के पिता मौलाना हबीब-उर-रहमान सानी लुधियानवी भी पंजाब के शाही इमाम रहे। उनका जन्म आजादी के एक साल बाद हुआ था और 2021 में उनका निधन हुआ। लुधियानवी बताते हैं कि उनके दादा मौलाना मोहम्मद अहमद आजादी के समय किशोर थे। वह परिवार को विभाजन से पहले के भारत और उस दौर की घटनाओं के बारे में बताते थे।
उनके पिता ने भी इन पारिवारिक यादों को आगे बढ़ाया। इन्हीं यादों और अनुभवों के आधार पर उन्होंने हाल में ‘दास्तान-ए-लुधियाना’ नाम से एक किताब लिखी है। इसमें विभाजन की यादों के साथ स्वतंत्रता आंदोलन और आजादी के बाद के लुधियाना का भी जिक्र किया गया है।
स्वतंत्रता संग्राम से भी जुड़ा था परिवार
मौलाना हबीब-उर-रहमान ब्रिटिश शासन के दौरान स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे थे और मजलिस-ए-अहरार इस्लाम हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। मौलाना उस्मान लुधियानवी के अनुसार, उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू समेत कई नेताओं से मुलाकात की थी।
उनके परिवार के लिए 1947 में भारत में रहने का फैसला सिर्फ एक जगह पर बने रहने का निर्णय नहीं था, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने का फैसला भी था। लुधियानवी कहते हैं कि आज पीछे मुड़कर देखने पर परिवार अपने परदादा के उस निर्णय के लिए उनका आभार जताता है।
विभाजन की सीख- नफरत नहीं, सौहार्द
मौलाना उस्मान लुधियानवी के मुताबिक, विभाजन की कहानी केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि किसने भारत चुना और किसने पाकिस्तान। यह उन लोगों को याद करने की कहानी भी है, जिन्होंने हिंसा और नफरत के बीच अपने पड़ोसियों की रक्षा की और इंसानियत को जिंदा रखा।
उन्होंने कहा कि विभाजन से यह सीख मिलती है कि दोनों देशों के बीच कड़वाहट खत्म होनी चाहिए और आगे बढ़ने की जरूरत है। भारत-पाकिस्तान के बीच आज भी तनावपूर्ण संबंधों के बावजूद उनका मानना है कि इतिहास से सबक लेकर शांति और सौहार्द की दिशा में आगे बढ़ना जरूरी है।
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भारत हर साल 15 अगस्त को इंडिपेंडेंस डे यानी स्वतंत्रता दिवस मनाता है, जबकि पड़ोसी देश पाकिस्तान अपना स्वतंत्रता दिवस 14 अगस्त को मनाता है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों देश एक ही ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य से अलग होकर अस्तित्व में आए और दोनों के गठन का आधार एक ही ‘इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट, 1947’ था। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें।
