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बंगालः बढ़ती कीमतों से गड़बड़ाया रसोई घर का बजट

कहावत है- सौ काम छोड़ कर नहाए और हजार काम छोड़ कर खाए लेकिन साग-सब्जियों, दूध-मखन, चिकन-मटन, पावरोटी-बिस्कुट, रसोई गैस और केरोसिन तेल की बढ़ती कीमतों से इनदिनों निम्न व मध्यमवर्गीय परिवार के लोग के लिए उक्त कहावत करीब-करीब गलत साबित हो रही है।
Author कोलकाता | December 21, 2017 01:25 am

शंकर जालान
कहावत है- सौ काम छोड़ कर नहाए और हजार काम छोड़ कर खाए लेकिन साग-सब्जियों, दूध-मखन, चिकन-मटन, पावरोटी-बिस्कुट, रसोई गैस और केरोसिन तेल की बढ़ती कीमतों से इनदिनों निम्न व मध्यमवर्गीय परिवार के लोग के लिए उक्त कहावत करीब-करीब गलत साबित हो रही है। बीते साल की तुलना में लगभग सभी प्रकार की खाद्य सामग्रियों में 10 से 100 फीसद तक का इजाफा हुआ है, जिससे रसोई घर का बजट तो गड़बड़ा ही गया है, खाने का जायका भी बिगड़ गया है। आम तौर पर ठंड के दिनों में सब्जियों के भाव अन्य मौसम की तुलना में कम होते हैं, लेकिन इस बार सर्दी के दिनों में सब्जियों का बाजार खासा गर्म है। कभी अधिक बारिश तो कभी सूखा, कभी आपूर्ति कम तो कभी जमाखोरी और कालाबाजारी के कारण कोलकाता की ज्यादातर महिलाएं कहने लगी हैं कि ‘महंगाई डायन खाए जात है’।

महानगर के नूतन बाजार के सब्जी कारोबारियों का कहना है पैदावार कम होने से सब्जियों के भाव आसमान छू रहे हैं। सब्जी विक्रेता अजय सोनकर ने ‘जनसत्ता’ को बताया कि टमाटर, बैगन, मटर, गाजर समेत लगभग सभी सब्जियों के दामों में हुई भारी वृद्धि से उनकी बिक्री प्रभावित हुई है। लोग अब सब्जी कम खरीद रहे हैं। एक अन्य सब्जी विक्रेता पप्पू साव ने बताया कि लोग ठंड के दिनों में सब्जियों का स्वाद ज्यादा चखते थे, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। सब्जियों की कीमत आम लोगों की खरीद से बाहर हो गई है। महंगाई के कारण सामान्य तबके की थाली तक सब्जियां नहीं पहुंच पा रही हैं।

जानकारों के अनुसार कोलकाता शहर में सब्जियों की आवक कम होने के कारण ये महंगी हो गई हैं। मंडियों में सब्जियों की स्थानीय आवक नहीं होने से सब्जियां बाहर से मंगवाई जा रही हैं। सब्जियों की मंहगाई की बात करे तो इसमें सबसे ज्यादा टमाटर लाल हुआ है और प्याज काटने में नहीं खरीद में आंसू आ रहे हैं। महंगाई के बारे में महिलाओं का कहना है कि साग-सब्जी से लेकर दूध-मखन, चिकन-मटन और गैस व केरोसिन तेल के दाम में बीते साल की तुलना में इस साल खासा इजाफा हुआ है, लिहाजा अब वे पसंद नहीं, बल्कि पैसे यानी पैकेट के हिसाब से खाना बनाती और घरवालों को खिलाती हैं।

गृहिणी सरिता पांड्या ने कहा कि बीते साल नया आलू 12 रुपए किलो मिल रहा जो इस बार 20 रुपए के भाव से बिक रहा है। इसी प्रकार प्याज 30 की जगह 60, टमाटर 35 के बदले 70, हरी मिर्च 50 की तुलना में 90 रुपए किलो खरीदनी पड़ रही है। वहीं, रानी अग्रवाल का कहना है कि किराना दुकान की सामग्री जैसे चावल, आटा, चीनी, नमक, गुड़ इत्यादि खाद्य सामग्रियों में भी बीते साल की तुलना में कीमतें बढ़ी हैं, लेकिन राहत दाल को लेकर है। पिछले साल जो दाल डेढ़ सौ रुपए किलो में मिल रही थी, वह इस साल 90 रुपए में मिल रही है।
संगीता केजरीवाल का कहना था कि रसोई गैस के दाम में काफी इजाफा हुआ है। बिस्कुट व पावरोटी की कीमतों में भी बीते साल की तुलना में 15 से 20 फीसद की बढ़ोतरी हुई है।
राज्य सरकार ने खाद्य सामग्री की कीमतों पर नियंत्रण के लिए एक कमिटी गठित की है। इसके अलावा सरकारी स्तर पर समय-समय पर किफायती कीमत में आलू, प्याज और अंडा बेचकर लोगों को राहत देने की कोशिश जरूर की जाती है, लेकिन इसका लाभ कम लोग ही उठा पाते हैं। महंगाई को लेकर राज्य की तृणमूल कांग्रेस की सरकार जहां भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार पर दोष थोपती है, वहीं भाजपा के स्थानीय नेता तृणमूल कांग्रेस की तरफ इशारा करते हैं।

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