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यूपी: अल्पसंख्यकों की सियासत में पहले जैसा रुतबा पाने की हसरत

2014 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश से एक भी मुसलिम सांसद नहीं चुना गया था और 2017 के यूपी विधानसभा के चुनाव में ऐतिहासिक रूप से सबसे कम 23 मुसलिम विधायक ही चुने जा सके थे।

वर्तमान चांसलर मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी ने कहा कि न तो दारुल उलूम कोई फतवा जारी करेगा और न ही राजनैतिक दलों के नेताओं को समर्थन या आशीर्वाद देगा।

सुरेंद्र सिंघल

17वीं लोकसभा के लिए चुनाव में मुसलिमों की हसरत उत्तर प्रदेश और देश की सियासत में अपनी पुरानी हिस्सेदारी और रुतबा बढ़ाने की दिख रही है। देश और दुनिया के मुसलमानों के प्रेरणा के सबसे बड़े केंद्र देवबंदी विचारधारा की इस्लामिक शिक्षण संस्था दारुल उलूम देवबंद पर सभी धर्मनिरपेक्ष दलों की निगाहें लगी हैं। 150 साल पुरानी इस संस्था के उलेमाओं ने देश की आजादी के लिए संघर्ष किया था और 1947 में भारत बंटवारे का विरोध किया था। देवबंद के राष्ट्रवादी सोच के बड़े आलिम और महात्मा गांधी के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में कंधे से कंधा मिलाकर साथ देने वाले मौलाना हुसैन मदनी ने मुसलिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना का ताकत के साथ विरोध किया था।

दारुल उलूम वक्फ के 78 साल के मौलाना अब्दुल्ला जावेद बताते हैं कि तब चांसलर कारी तैयब ने मुसलमानों से कांग्रेस को वोट देने की अपील की थी। उन्होंने बताया कि कारी तैयब जी ने कांग्रेस को वोट देने की लिखित अपील का पम्पलेट जारी किया था। जावेद कहते हैं कि स्योहारा बिजनौर निवासी मौलाना हिफ्जुर्रहमान दारुल उलूम की प्रबंध समिति के सदस्य के साथ-साथ जमीयत उलमाए हिंद के राष्ट्रीय महासचिव भी थे। दारुल उलूम के सदर मुदर्रिस (शिक्षा विभाग के अध्यक्ष) शेखुल हदीस मौलाना हुसैन अहमद मदनी जमीयत उलमाए हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। कारी तैयब जी ने इन दोनों शख्सियतों के परामर्श से कांग्रेस के समर्थन में चुनावी अपील जारी की थी।

2014 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश से एक भी मुसलिम सांसद नहीं चुना गया था और 2017 के यूपी विधानसभा के चुनाव में ऐतिहासिक रूप से सबसे कम 23 मुसलिम विधायक ही चुने जा सके थे। भाजपा के प्रदेश और देश में जबरदस्त सियासी ताकत बन जाने से मुसलिमों के सियासी अस्तित्व पर भी सवाल खड़ा हो गया है। पिछले चुनावों में यह देखने में आया कि सपा, बसपा और कांग्रेस जैसे दलों ने मुसलिमों को प्रतिनिधित्व देने के नाम पर कई सीटों पर मुसलिम उम्मीदवार उतार दिए। जिनके बीच मुसलिम वोटों का बंटवारा होने का लाभ भाजपा को मिला। इस आम चुनाव में सपा-बसपा और रालोद ने मुसलिम उम्मीदवारों के सामने मुसलिम उम्मीदवार नही खड़े करने का प्रयास किया। वेस्ट यूपी में सहारनपुर और मुरादाबाद लोकसभा ऐसी सीटें हैं, जहां गठबंधन और कांग्रेस के उम्मीदवार मुसलिम हैं। यहां सपा, रालोद के समर्थन से बसपा उम्मीदवार फजलुर्रहमान और कांग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद के बीच मतों का विभाजन होता दिख रहा है। इसी तरह मुरादाबाद लोकसभा सीट पर मुसलिम आबादी 45.55 फीसद है। इस सीट पर गठबंधन की ओर से सपा के नासिर कुरैशी हैं और कांग्रेस से इमरान प्रतापगढ़ी हैं। यहां भी मुस्लिम मतों में बिखराव हो सकता है।

हुसैन अहमद मदनी ने गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था, लेकिन राजनीति में न सक्रिय रहे ,न कोई पद लिया। उनके बेटे मौलाना असद मदनी तीन बार राज्यसभा के सदस्य रहे। असद मदनी के बेटे एवं जमीयत उलमाए हिंद के मौजूदा राष्ट्रीय महासचिव मौलाना महमूद मदनी भी एक बार सपा, रालोद से राज्य सभा सदस्य रह चुके हैं। – मौलान महमूद मदनी

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