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कैराना में ध्रुवीकरण के सहारे है भाजपा

कैराना को बचाने के लिए भाजपा ही नहीं आरएसएस के कार्यकर्ता भी पुरजोर ताकत लगा रहे हैं। लेकिन इस सीट का कार्यकाल अब एक साल से भी कम रह जाने के कारण मतदाताओं में ज्यादा उत्साह नहीं है। ऊपर से भीषण गर्मी का प्रकोप अलग है। ऐसे में 28 मई को होने वाले मतदान के आंकड़े भी हार-जीत को प्रभावित करेंगे।

Author May 26, 2018 5:12 AM
उत्तर प्रदेश के शामली 24 मई को में कैराना उपचुनाव के दौरान एक रैली में बीजेपी का एक कार्यकर्ता पीएम मोदी के वेश में (PTI Photo)

उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट का उपचुनाव जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने पूरी ताकत झोंक दी है। गोरखपुर और फूलपुर की हार के बाद भाजपा ने सफाई दी थी कि वह अति आत्मविश्वास के कारण हार गई। कैराना में भाजपाई अपनी तरफ से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे। मुकाबला साझा विपक्ष की उम्मीदवार तबस्सुम बेगम और दिवंगत भाजपा सांसद हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह के बीच है। भाजपा को जीत की उम्मीद सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे है। सोलह लाख से ज्यादा मतदाताओं वाले इस संसदीय क्षेत्र में दो तिहाई हिंदू हैं और एक तिहाई मुसलमान। कैराना संसदीय सीट कभी भाजपा का गढ़ नहीं रही। खुद हुकुम सिंह भी मोदी लहर के बावजूद 2014 में कैराना से हिंदुओं के पलायन को मुद्दा बना कर ध्रुवीकरण के सहारे ही जीत पाए थे। हालांकि ध्रुवीकरण के बावजूद लगभग 67 फीसद हिंदुओं वाले इस इलाके में उन्हें 50 फीसद वोट ही हासिल हुए थे। इससे पहले 2009 में तबस्सुम बेगम ने ही बसपा उम्मीदवार की हैसियत से भाजपाई हुकुम सिंह को यहां मात दी थी। हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह भी पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में कैराना सीट से तबस्सुम बेगम के बेटे से चुनाव हार गई थीं।

कैराना को बचाने के लिए भाजपा ही नहीं आरएसएस के कार्यकर्ता भी पुरजोर ताकत लगा रहे हैं। लेकिन इस सीट का कार्यकाल अब एक साल से भी कम रह जाने के कारण मतदाताओं में ज्यादा उत्साह नहीं है। ऊपर से भीषण गर्मी का प्रकोप अलग है। ऐसे में 28 मई को होने वाले मतदान के आंकड़े भी हार-जीत को प्रभावित करेंगे। रमजान के कारण भाजपाई आस लगा रहे हैं कि मुसलमानों का औसत मतदान कम रहेगा। पर जीत का दारोमदार दलित, जाट और अति पिछड़े मतदाताओं के रुख पर टिका है। मुजफ्फरनगर में 2013 में हुए सांप्रदायिक दंगों के कारण 2014 के लोकसभा चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण साफ दिखा था। कैराना के उपचुनाव को विपक्ष ने ध्रुवीकरण से बचाने के लिए सूझबूझ से रणनीति बनाई है। बसपा अपनी घोषित नीति के तहत कोई उपचुनाव नहीं लड़ती। लिहाजा यहां दावेदारी सपा की थी। पर अखिलेश यादव ने विपक्षी एकता का संदेश देने और ध्रुवीकरण रोकने के लिए सीट अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल को दे दी। अजित सिंह और उनके पुत्र जयंत चौधरी ने जाट मतदाताओं को अपनी तरफ लुभाने के लिए चौधरी चरण सिंह की विरासत का हवाला देने से लेकर गन्ना किसानों की समस्याओं पर ताकत लगाई है। वे इस उपचुनाव के जरिए जाट और मुसलमान के पुराने सद्भावपूर्ण रिश्तों को बहाल करने पर जोर दे रहे हैं।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर भाजपा के तमाम विधायक, सांसद, मंत्री और पदाधिकारी चुनाव प्रचार में हिंदुओं का स्वाभिमान जगाने में जुटे रहे तो कई जगह उन्हें मतदाताओं के तीखे सवालों का भी सामना करना पड़ा। मुजफ्फनगर के भाजपाई सांसद संजीव बालियान जाट हैं। पर उनकी अपनी ही पार्टी के उत्तर प्रदेश के गन्ना मंत्री सुरेश राणा से नहीं पटती। राणा भी इसी इलाके से विधायक हैं। बालियान से जब जाट किसानों ने गन्ने का भुगतान नहीं होने का दुखड़ा रोया तो वे कन्नी काटते नजर आए और टका सा जवाब दे दिया कि गन्ना मंत्री से सवाल करो। भाजपाई यहां जिन्ना-जिन्ना करते रहे तो रालोद के नेताओं ने गन्ने के सवाल को अहम बता कर मतदाताओं को जागरूक करने की कोशिश की।

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