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अंधेरे में आस जगाने की पहल: परेई के किसानों ने अन्ना गौपालन का उठाया बीड़ा, वर्षों की समस्या मिनटों में हल

जल ग्राम जखनी की प्रेरणा और ऋषि कुल आश्रम समिति के प्रयासों से गांव और आसपास के सैकड़ों लोग जुटे और गौपूजन में साझीदार बने। स्थानीय अफसरों ने कहा हम आपके साथ हैं। आवश्यकता होने पर हमें जरूर याद करें।

Anna cow service, bundelkhandबुंदेलखंड के परेई गांव में सामुदायिक अन्ना गौपालन कार्यक्रम में बोलते नीति आयोग के सलाहकार अविनाश मिश्र (ऊपर), अतिथियों का स्वागत करते डॉ. शिवपूजन अवस्थी (बीच) और अन्ना गाय की पूजा (नीचे)।

बुंदेलखंड क्षेत्र के कई जागरूक किसानों ने एक नई और अनोखी पहल की है। इस पहल से न केवल उनका सामाजिक स्तर बेहतर हो रहा है, बल्कि तथा सामुदायिक भावना और सर्वोदय विचार के मंत्र के साथ आपसी लगाव भी बढ़ा है। ऐसा नहीं है कि इन किसानों की अपनी समस्या नहीं है। किसानों की रातें फसल पाने के लिए खेतों पर कटती हैं, हजारों किसान खेतों पर झोपड़ी बनाकर फसल की रखवाली के लिए पड़े रहते हैं। उनके साथ हादसे भी होते हैं, दुख भी झेलते हैं, अपना परिवार पालना है, बच्चों को पालना है, राष्ट्र को भोजन देना है, बावजूद इसके वे अपने काम को धर्म समझकर डटे रहते हैं। यूपी-एमपी के बुंदेलखंड क्षेत्र के 22 जिलों में लगभग 15 हजार से अधिक गांव हैं, जहां अन्ना गाय मुख्य समस्या है। अन्ना गाय का अर्थ है ऐसे गाय जो बेकार हैं, दूध नहीं देती हैं और जिनका कोई मालिक नहीं है, आवारा सड़कों पर घूमती रहती हैं। ऐसे गायों की रखवाली कौन करे। सरकारी कागज में इसके लिए सैकड़ों उपाय बताए गए हैं, परन्तु कारगर कितने हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं है।

मध्य प्रदेश की सीमा पर यूपी के बांदा जिले से 25 किलोमीटर दूर ग्राम परेई के किसानों ने जब कहीं से कोई रास्ता नहीं निकला तो इनसे निपटने के लिए खुद उपाय खोजा। यह एक ऐसा उपाय था, जिसमें निष्पक्षता थी, सद्भावना थी, और वत्सलता का भी भाव था। गांव के प्रत्येक किसान ने एक-एक गाए अपने घर में पाली है। कुछ किसानों ने बूढ़े बैलों को, बछड़ों को, बूढ़ी गाय को भी पाला। किसी-किसी ने दो-दो गाय पाली हैं, गांव के बच्चे गाय के छोटे-छोटे बच्चों से खेलते हैं। गांव वाले कुएं से पानी पीते हैं, कुओं में नहाते हैं, बगैर दूध देने वाली 108 अन्ना गाय बगैर सरकारी अनुदान के 85 किसानों ने अपने घरों में पाला है।

पिछले वर्ष पूरे गांव की लगभग फसल चौपट हो गई थी। गांव के जागरूक किसान रामसनेही सिंह, जितेंद्र अवस्थी, भोला तिवारी, जगदेव विश्वकर्मा, देशा पाल, विशाल पाल, रामभरोसे अनुरागी, छेदी प्रजापति, पप्पू रैकवार, राजू केवट, श्री विशाल पाल जैसे साथियों ने पहल की, परिणाम सामने है। यह प्रयोग परंपरागत है। ग्राम स्वराज्य पर गांव के किसानों ने सामुदायिक सहभागिता से पहल की है। सफलता प्राप्त की है। अंधेरों को कोसने की बजाय एक दीपक जलाया है। ऐसे उदाहरणों को अधिक से अधिक समाज के बीच ले जाया जाए। अन्ना प्रथा से निपटने में यही कारगर उपाय है।

इन गोपालकों को प्रोत्साहित करने के लिए ऋषि कुल आश्रम समिति की ओर से अष्टमी के दिन आयोजित गौपूजन में नीति आयोग भारत सरकार के जल पंचायती राज सलाहकार अविनाश मिश्र ने स्वयं सम्मानित किया। उन्होंने कहा कि ऐसे उदाहरण अन्य स्थानों पर भी प्रस्तुत किए जा सकते हैं। 108 गोवंशों को किसानों ने जिस भावना से पाला है वह देश के लिए एक संदेश है। ऋषि कुल आश्रम समिति ने इन किसानों को सम्मानस्वरूप उपहार भी दिए। जल ग्राम जखनी की प्रेरणा और ऋषि कुल आश्रम समिति के प्रयासों से गांव और आसपास के सैकड़ों लोग जुटे और गौपूजन में साझीदार बने। स्थानीय अफसरों ने कहा हम आपके साथ हैं। आवश्यकता होने पर हमें जरूर याद करें।

किसानों के पास हर समस्या का समाधान है। तबले पर पीएचडी करने वाले इस गांव के निवासी ऋषि कुल आश्रम समिति के सचिव डॉक्टर शिवपूजन अवस्थी ने कहा कि हमने कोई नया काम नहीं किया। समूह के साथ हमारे गांव ने पहल की है, एक प्रयोग किया है, यदि इन किसानों के अनुभव को अन्य गांव में प्रयोग के तौर पर सरकार और समाज साथ बैठकर अपनाए तो ऐसी तमाम संकटों से आसानी से निपटा जा सकता है। बस पहल करें, साहस करें और मन को बनाएं।

डॉ. शिवपूजन अवस्थी कहते हैं, हम कोशिश कर रहे हैं कि अगली बार आस-पास के गांव में भी ऐसा ही प्रयोग किसान अपने यहां करें। हमारे गांव के 11 लोगों की पहल पर पूरा गांव अन्ना प्रथा से निपटने के लिए साथ खड़ा हो गया। जिस किसी को देखना है गांव आकर देख सकता है। हमारा नहीं गांव वालों का प्रयास है।

80% लोग गांव में किसानी करते हैं। गांव का जीवन किसानी पर निर्भर है। पिछले वर्ष पूरी फसल अन्ना जानवरों ने बर्बाद कर दी थी। इस साल हमारे खेत लहरा रहे हैं। चना, गेहूं, अरहर, सरसों जैसी फसलें उम्मीद है कि हर साल से ज्यादा पैदावार देगी। युवा वर्ग का सहयोग सराहनीय है। मैं इस गांव के किसानों का आभार व्यक्त करता हूं।

गांव के किसान रामसनेही सिंह ने कहा कि किसान राजा सिंह, लल्लू शर्मा, भोला तिवारी, रमेश सिंह, कुशल सिंह, बसंता सिंह, संजय साहू, जगदेव विश्वकर्मा, रामअवतार, सिया राम केवट, दादी पाल, विशाल पाल, काली दिन पाल, देशा पाल, कर्चना पाल, भोला सिंह, धनु सिंह, वीरेंद्र अवस्थी, रमेश विश्वकर्मा, जुगल तिवारी, छोटे पाल, सीताराम अनुरागी, सुखदेव अहिरवार, रामगोपाल अहिरवार, बमोरी साहू, मूला पाल मान सिंह यादव, बुद्धू साहू, भरत सिंह, छेदी प्रजापति, गयादीन पाल, विजयपाल बुद्धू, हार्दिक पाल सिंह, जागे विश्वकर्मा, फूलचंद रैकवार, पप्पू रैकवार, मुल्लू पाल, बबलू तिवारी, कपिल देव तिवारी, महेंद्र तिवारी, स्वतंत्र सिंह, भजन विश्वकर्मा, रामबाबू खंगार, शंभू प्रजापति, नंदू विश्वकर्मा, पप्पू विश्वकर्मा, घनश्याम विश्वकर्मा, छोटा विश्वकर्मा, राजू केवट, छोटे केवट, सिपाही लाल पाल, रामाश्रय पाल, रामपाल, राजेंद्र पाल, सौखी लाल पाल, नन्हे यादव, श्रीपाल, विषम सिंह जैसे किसानों ने किसी ने एक और किसी ने दो गाय पाली है। बगल के गांव के किसानों ने भी 15 अन्ना गौ को पाला है।

इस मौके पर जल योद्धा उमा शंकर पांडे ने कहा कि मैंने गांव को देखा, गांव को समझा और मुझे लगता है कि यह जानकारी समाज के बीच साझा करनी चाहिए। कहा कि ऐसी योजना दूर तक जानी चाहिए। हर गांव में यह पहर होनी चाहिए। कहा कि गौपालकों को नमन करना चाहिए। इन्हें प्रणाम जिन्होंने रास्ता दिखाया। इसी गांव के युवा राहुल अवस्थी, जिन्होंने एमएससी एजी की उच्च शिक्षा ली। वे अब सरकारी नौकरी छोड़कर जैविक खेती कर रहे हैं। गौ आधारित सराहनीय पहल की है। कहा कि हम सबको गांव, गाय और गंगा को बचाने की सामुदायिक पहल करनी होगी।

जल ग्राम जखनी के किसानों ने बगैर सरकार की सहायता के खुद अस्थायी गौशाला, गौ अल्प विश्राम गृह बनाकर सरकार के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। जिसमें 130 गाय की सेवा 4 माह जखनी गांव के सभी किसान करते हैं। कई बरस से कभी कोई भी अनुदान नहीं लिया है, प्रयास छोटा है , लेकिन हौसला बड़ा है। परेई गांव में गौ पूजन के अवसर पर ब्लाक प्रमुख रामविशाल बाजपेयी, खंड विकास अधिकारी स्थानीय तहसीलदार, गांव के सरपंच, ग्राम विकास अधिकारी सहित बड़ी संख्या में आसपास के किसान मौजूद रहे।

क्या है अन्ना प्रथा: बुंदेलखंड इलाके में यह प्रथा थी कि जब चैत्र मास में फसल कट जाती थी, और खेत खाली हो जाते थे, उस समय जानवरों को खुला छोड़ दिया जाता था। इसके पीछे किसानों का एक कृषि ज्ञान काम करता था। खुले खेतों में इन जानवरों के विचरण करने और चरने से उन्हें अपने खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में मदद मिलती थी। लेकिन दूसरी समस्या यह है कि इन गायों को पालने वाला कोई नहीं मिलता है।

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