एक साल पहले हुई मौत, अब भी ‘न्याय’ का इंतजार कर रहा शव, गांव वालों ने नहीं किया अंतिम संस्कार

बदरू आदिवासी, गोंड था। उसका दाह संस्कार होना चाहिए था। लेकिन गांव वालों ने उसका अंतिम संस्कार नहीं किया। कहते हैं जब तब उसको न्याय नहीं मिलेगा, उसको अग्नि नहीं देंगे। उन्होंने उसके शरीर को कुछ दवा आदि लगाकर जमीन के नीचे रख दिया है।

Author Edited By अंकित ओझा बीजापुर (छत्तीसगढ़) | May 5, 2021 11:09 AM
encounterएनकाउंटर में मारे गए शख्स की तस्वीर। साभार-द वायर

दिसंबर 2020 की बात है। जंगल महुआ के फूलों से महमहा रहा था। 22 साल का बदरू सवेरे-सवेरे इन्हीं फूलों के लिए अपने घर से निकल पड़ा। कुछ ही दूर गया था कि गोली चली और अगले पल बदरू मुर्दा पड़ा था। उसके साथी ने गांव आक हल्ला मचाया। गांव वाले भागे तो देखा कि खाकी वर्दीधारी बदरू के शरीर को घसीटते हुए लिए जा रहे हैं।

पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम कराया। परिजनों को लाश लेकिन नहीं दी। लाश के लिए गांव वालों को कई दिन शहर जाकर प्रदर्शन करना पड़ा। इसके बाद पुलिस ने बताया कि बदरू नक्सली ग्रुप जन मिलिशिया का कमांडर था। उसके पास एक कट्टा, एक टिफिन बम और कुछ अत्याधुनिक हथियार मिले। मगर, लड़का तो महुआ बीनने गया था—-गांव वाले कहते हैं।

बदरू आदिवासी, गोंड था। उसका दाह संस्कार होना चाहिए था। लेकिन गांव वालों ने उसका अंतिम संस्कार नहीं किया। कहते हैं जब तब उसको न्याय नहीं मिलेगा, उसको अग्नि नहीं देंगे। उन्होंने उसके शरीर को कुछ दवा आदि लगाकर जमीन के नीचे रख दिया है। शरीर में हड्डियों के सिवा कुछ नहीं बचा। पर गांव में हक की लड़ाई का जज्बा बाकी है। बीजापुर (छत्तीसगढ़) के गांव गामपुर का। बदरू इसी गांव के माडवी पाड़ा में रहता था। इसीलिए उसका पूरा नाम था बदरू माडवी।

गांव वाले कहते हैं कि वे बिलासपुर हाइकोर्ट जाकर मामले को उठाएंगे। अपने दुख-दर्द का हल मांगेंगे और बदरू को न्याय दिलाएंगे, उसके बाद ही जमीन में दबा कर रखे गए युवक को आग के सिपुर्द किया जाएगा। तो, अब तक गए क्यों नहीं? कोरोना। उसकी वजह से लगे लॉकडाउन के कारण ऐसा नहीं हो पाया। बिलासपुर उनके यहां से लगभग छह सौ किमी दूर है।

गांव वालों के लिए ये घटनाएं जिन्हें वे एनकाउंटर कहते हैं, नई बात नहीं। जनवरी 2017 को 22 साल के भीमा और उसकी 15 साल की बहन सुखमती को मार दिया गया था। भीमा छह दिन पहले ही बाप बना था। उसकी बीवी जोगी बताती है कि वह दरअसल बच्चे की छठी की खरीददारी के लिए ही निकला था कि मारा गया। पुलिस ने इन दोनों को भी नक्सली माना था और कहा था कि उनके पास हथियार मिले थे। बहरहाल, गांव वालों का कहना है कि उन्होंने सुखमती की चीखपुकार सुनी थी। घटना के बाद भीमा के भाई ने न्याया के लिए लड़ने का ऐलान किया था। कुछ दिन बाद उसको बागी बता कर जेल में डाल दिया गया था। वह छह महीने जेल में रहा था। वह अब भी जेल में मिले निशान दिखाता रहता है।

भाई-बहन की मौत का मामला गांव वाले अदालत तक पहुंचा चुके हैं। केस चल रहा है। फैसला आना बाकी है।

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