शादी के लिए दो बालिग राजी हैं तो नहीं है परिवार, समाज और सरकार की सहमति की जरूरत- बोला इलाहाबाद HC

याचिका में सभी याचिकाकर्ताओं ने अपने जीवन के लिए खतरे की आशंका जताई है। सरकारी वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता किसी भी राहत के हकदार नहीं हैं।

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शादी के लिए दो बालिग राजी तो नहीं है सरकार की सहमति की जरूरत – इलाहाबाद हाईकोर्ट (प्रतीकात्मक फोटो- @pixabay)

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शादी के मामले पर एक बार फिर बड़ी टिप्पणी की है। एक मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि जब शादी के लिए दो बालिग राजी हैं, तो परिवार, समाज और सरकार की सहमति की जरूरत नहीं है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में 17 अंतर्धार्मिक जोड़ों के विवाह के पंजीकरण का आदेश देते हुए ये बातें कही। कोर्ट ने कहा कि धर्मपरिवर्तन कर शादी किए जोड़े के पंजीकरण के लिए जिला प्राधिकारी के अनुमोदन जरूरी नहीं है। अदालत ने कहा कि यूपी का गैर-कानूनी धर्मांतरण अधिनियम अंतर्धार्मिक विवाहों पर रोक नहीं लगाता है।

याचिका में कहा गया कि वो लोग अपनी मर्जी से धर्म परिवर्तन करके अंतरधार्मिक विवाह किए हैं। सुनवाई के दौरान जस्टिस सुनीत कुमार ने कहा कि विवाह रजिस्ट्रार केवल एक पीड़ित व्यक्ति के आरोपों पर विवाह के पंजीकरण से इनकार नहीं कर सकता है।

याचिका में सभी याचिकाकर्ताओं ने अपने जीवन के लिए खतरे की आशंका जताई है। सरकारी वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता किसी भी राहत के हकदार नहीं हैं, उन्हें एक सक्षम जिला प्राधिकारी से संपर्क करना चाहिए। पहली बार में उन्हे धर्मपरिवर्तन के संबंध में अनुमोदन प्राप्त करना चाहिए।

याचिकाकर्ता के वकील ने यह तर्क देते हुए इसका खंडन किया कि विवाह के पंजीकरण के बाद जिला प्राधिकरण की पूर्व स्वीकृति धर्मांतरण और विवाह के लिए एक आवश्यक शर्त नहीं है। भले ही धर्मांतरण से पहले प्राधिकरण की मंजूरी नहीं ली गई थी, फिर भी याचिकाकर्ताओं को एक साथ रहने का अधिकार है।

अदालत ने जिला पुलिस अधिकारियों को “याचिकाकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने और मांग या जरूरत पड़ने पर उन्हें सुरक्षा प्रदान करने” का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि 17 जोड़ों द्वारा किया गया धर्मांतरण, धर्मांतरण विरोधी अधिनियम के दायरे में आता है, तो याचिकाकर्ता “दंड प्रावधानों के लिए उत्तरदायी होंगे”।

अदालत ने पाया कि राज्यों में धर्म और विश्वास की स्वतंत्रता एक बुनियादी मानवाधिकार है, और राज्य किसी व्यक्ति के धार्मिक या नैतिक विश्वास की जांच नहीं कर सकता है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का उल्लेख किया और कहा कि “न्यायालय की राय में ये कानून सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित हैं, क्योंकि जबरन धर्मांतरण के परिणामस्वरूप सार्वजनिक व्यवस्था में गड़बड़ी हो सकती है”।

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