ताज़ा खबर
 

संघ का सवाल- जब पटेल की प्रतिमा बन सकती है तो राम मंदिर के लिए कानून क्‍यों नहीं?

नर्मदा नदी के तट पर सरदार पटेल की प्रतिमा बन सकती है तो भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए कोई कानून पारित क्यों नहीं हो सकता?’’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ नेता दत्तात्रेय होसबाले

भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए आरएसएस ने रविवार को सवाल उठाया कि जब गुजरात में सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा बन सकती है तो अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए कानून पारित क्यों नहीं हो सकता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ नेता दत्तात्रेय होसबाले ने यहां एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि उच्चतम न्यायालय ने एक अलग पीठ का गठन किया है जो अयोध्या भूमि मालिकाना हक मामले की सुनवाई कर रही है, लेकिन इस लंबित मुद्दे पर अब तक कोई फैसला नहीं किया गया है।

संघ के सह – सरकार्यवाह होसबाले ने सवाल किया, ‘‘अगर (गुजरात में) नर्मदा नदी के तट पर सरदार पटेल की प्रतिमा बन सकती है तो भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए कोई कानून पारित क्यों नहीं हो सकता?’’ उन्होंने विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) और कुछ क्षेत्रीय धार्मिक संगठनों द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित एक सभा को यहां संबोधित किया, जिसका आयोजन राम मंदिर के यथाशीघ्र निर्माण के लिए केन्द्र पर दबाव बनाने के उद्देश्य से किया गया था।

राममंदिर सिर्फ संघ की नहीं, भारत की जरूरत : आरएसएस प्रचारक

हिंदूवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ प्रचारक नंदकुमार ने यहां शनिवार को कहा कि अयोध्या में राम मंदिर सिर्फ संघ की नहीं, भारत की आवश्यकता है, करोड़ों लोगों की आस्था इससे जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि भारत की राष्ट्रीय धरोहर और संस्कृति को बचाना प्रत्येक भारतीय का धर्म है। राम मंदिर अयोध्या में बनेगा, चाहे आरएसएस रहे या न रहे।

एक संवादी कार्यक्रम के के दौरान नंदकुमार ने कहा कि संघ समय की आवश्यकता थी, संघ की सही स्थित को जानने के लिए उसके इतिहास को जानना जरूरी है। 1925 में संघ के स्थापन सिर्फ 16 लोगों ने की थी और उस समय भारतीय समाज को संगठित करना बहुत जरूरी था, क्योंकि राष्ट्र निर्माण के लिए व्यक्ति निर्माण बहुत जरूरी है।

उन्होंने कहा कि देश की आजादी की लिए आरएसएस के संस्थापक डॉ. हेडगेवार स्वयं लड़े और जेल भी गए। संघ के लोगों ने देश की आजादी में भाग लिया था, मगर उन स्वयंसेवकों ने अपनी कोई पहचान दिखाने के लिए किसी टोपी आदि का सहारा नहीं लिया था, जैसे कांग्रेस के लोगों ने किया था।

डॉ. मोहन भागवत के समय में गणवेश सहित बहुत सारे बदलाव क्यों आ आए के जवाब में नंदकुमार ने कहा, “पहले संगठन को मजबूत करने की जरूरत थी। आज बहुत ज्यादा लोग जानते हैं। 1925 में अगर जागरण संवादी होता तो आप हमको नहीं बुलाते, क्योंकि हम कहीं नहीं थे। मगर आज संघ बहुत बढ़ गया। इसलिए डॉ. भागवत आक्रामक बदलाव कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “डॉ. भागवत व डॉ. हेडगेवार के भाषण में खास फर्क नहीं है। हम आज ज्यादा प्रचार नहीं करते। हम 12 बार गणवेश बदल चुके हैं। बहुत परिवर्तन हुए हैं।”

Next Stories
1 बच्‍चों को मिल सके अच्‍छी शिक्षा, NRI ने दान में दे दी सारी दौलत
2 रिटायर होते ही गांव लौट गए थे जस्टिस चेलामेश्‍वर, जानिए क्‍या है जस्टिस कुरियन जोसेफ का प्‍लान
3 आम आदमी पार्टी की दो-टूक, कांग्रेस से नहीं होगा कोई गठबंधन
ये पढ़ा क्या?
X