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स्पिक मैकेः सैकड़ों विद्यार्थियों ने पाया विरल अनुभव

युवाओं विशेषकर स्कूल कॉलेजों में पढ़ने वाले विद्यार्थिर्यों के मन में अपनी कला और संस्कृति के प्रति जिज्ञासाएं, जानकारी और अभिमान जगाने के उद्देश्य से शुरू किए गए गंभीर आंदोलन का जिस स्थान पर आज से 40 वर्ष पूर्व सूत्रपात हुआ था...

मंजरी सिन्हा
युवाओं विशेषकर स्कूल कॉलेजों में पढ़ने वाले विद्यार्थिर्यों के मन में अपनी कला और संस्कृति के प्रति जिज्ञासाएं, जानकारी और अभिमान जगाने के उद्देश्य से शुरू किए गए गंभीर आंदोलन का जिस स्थान पर आज से 40 वर्ष पूर्व सूत्रपात हुआ था, राजधानी के उसी आइआइटी परिसर में इस बार स्पीक मैके (सोसाइटी फॉर प्रमोशन आॅफ इंडियन क्लासिकल म्यूजिक एंड कल्चर अमंगस्ट यूथ) का पांचवां अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन संपन्न हुआ। गत पांच से ग्यारह जून तक चले इस सप्ताहव्यापी महाकुंभ में देश के सुदूर अंचलों एवं विदेश से उमड़े सैकड़ों विद्याथिर्यों ने विरल अनुभव पाया।

इस दौरान उनकी व्यस्त दिनचर्या ब्रह्ममुहूर्त में सुबह चार बजे योगाभ्यास से शुरू होती जहां नाद-योग से हठयोग तक अनेक विकल्प थे। इसके बाद श्रमदान एवं तदनंतर विविध कला एवं शिल्प की गहन कार्यशाला सुविख्यात गुरुओं की निगरानी में होती जहां वे शास्त्रीय कर्नाटक और हिंदुस्तानी संगीत में ध्रुपद ख्याल, ठुमरी, वृंदगान, शबद गुरबानी और नृत्य की कथक, भरतनाट्यम, ओडिशी, कुचिपुड़ी, मणिपुरी और सत्त्रिय विधाओं से लेकर नाटक, पुतुल-कला, हस्तशिल्प और लोक कलाओं तक का क्रियात्मक अनुभव पा सकते थे। दोपहर फिल्म प्रदर्शन और हर क्षेत्र के विद्वानों के साथ बातचीत में और शाम शीर्षस्थ कलाकारों के संगीत, नृत्य प्रदर्शन के आनंदलाभ में बीतती। अंतिम शाम का सम्पूर्ण रात्रि उत्सव तो अगली सुबह तक चला।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उत्साहवर्धक उद्बोधन, विदुषी गिरिजा देवी के जोशीले ख्याल पूरिया कल्याण, ठुमरी, दादरा और चैती तथा विद्वान टीएन कृष्णन के नलिन कांति, आभेरी, बिहांग और तिल्लाना इत्यादि के प्रभावी वायलिन वादन ने उन दोनों की उम्र को झुठलाते हुए उद्घाटन संध्या को यादगार बना दिया। अगली शाम बेगम परवीन सुल्ताना ने अपने सुमधुर गायन से पहले वह जमाना याद किया जब सभी वरिष्ठ संगीतज्ञ इस संस्था के संस्थापक किरण सेठ के साथ मिल बैठ कर मशविरा किया करते थे कि युवावर्ग को अपने शास्त्रीय संगीत और संस्कृति से कैसे जोड़ा जाए। इतनी बड़ी संख्या में उन्हें सुनने आए युवा श्रोताओं को देख कर उत्साहित बेगम परवीन सुल्ताना ने जोगकौन्स में ख्याल, हंसध्वनि तराना, मीरा भजन से लेकर अंतिम भैरवी हलभवानी दयानी तक बेहद मन से गाया।

अपनी छरहरी काया से षोडशी होने का भ्रम देतीं वरिष्ठ नृत्यांगना अलरमेल वल्ली के मनमोहक भरतनाट्यम और विदुषी सुधा रघुनाथन के कर्नाटक शैली में गायन के अलावा विदुषी अश्विनी भिड़े देशपांडे एवं पंडित वेंकटेश कुमार के प्रभावी गायन एवं विद्वान उमायलपुरम के शिवरामन के एकल मृदंग वादन स्तरीय कार्यक्रम थे। पंडित विश्वमोहन भट्ट के मोहन वीणा वादन तथा भजन सोपोरी के संतूर वादन ने खूब तालियां बटोरीं। पंडवानी शैली में तीजन बाई का प्रभावशाली कर्ण वध और विदुषी उमा शर्मा के भावाभिनय के अलावा युवा छात्र-छात्राओं ने गहन कार्यशाला में सीखी नृत्य संगीत की प्रभावी प्रस्तुतियों से प्रभावित किया।

अंतिम सन्ध्या सम्पूर्ण रात्रि उत्सव का शुभारम्भ टीएम कृष्णन के कर्नाटक शैली में समाधिस्थ गायन से हुआ। तोड़ी में पूरी संजीदगी से आलाप शुरू करने के बाद उन्होंने युवा श्रोताओं से कहा आप राग नाम का चक्कर छोड़कर संगीत का आनंद लीजिए और यही उन्होंने स्वयं भी किया। कृष्णन ने जो भी गाया डूब कर गाया, वराली से लेकर मुरुगन की कविता और अंतिम हलवैष्णव जन तो…तक जिसकी धुन उन्होंने स्वयं रची थी।

पंडित उल्हास काशलकर का जोग और विदुषी श्रुति सदोलिकर के सावनी नट और काफी कान्हड़ा जैसे ठेठ जयपुर अतरौली घराने के विशिष्ट जोड़ राग और रूपक ताल में निबद्ध तिलक कामोद की मशहूर बंदिश हलसुर संगत राग विद्या…, जिसे गाने से पहले उन्होंने सुन्दर व्याख्या करके समझाया भी। कपिला वेणु के कूड़ियाट्टम शैली में प्रभावी प्रदर्शन के बाद उस्ताद वासिफुद्दीन डागर ने भोर की वेला में अगली सुबह की अगवानी राग अहीर भैरव में विधिवत आलापचारी और ध्रुपद से की। सूर्यास्त से सूर्योदय तक चले इस सम्पूर्ण रात्रि उत्सव के साथ ही स्पिक मैके की 40 वीं वर्षगांठ पर आयोजित यह वार्षिक अधिवेशन संपन्न हुआ।

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