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दिल के मर्ज का कैसे होगा इलाज?

दिल के मरीजों को ओपन हार्ट सर्जरी से बचाने के लिए इस्तेमाल होने वाले स्टेंट (हृदय की नसों में लगने वाले छल्ले) की कीमत तय करने के लिए दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने वाली संस्था एनपीपीए एक कदम और आगे बढ़ गई है। इसके मुताबिक, स्टेंट की अधिकतम कीमत 67 हजार रुपए होगी।

Author नई दिल्ली | January 22, 2017 1:49 AM

दिल के मरीजों को ओपन हार्ट सर्जरी से बचाने के लिए इस्तेमाल होने वाले स्टेंट (हृदय की नसों में लगने वाले छल्ले) की कीमत तय करने के लिए दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने वाली संस्था एनपीपीए एक कदम और आगे बढ़ गई है। इसके मुताबिक, स्टेंट की अधिकतम कीमत 67 हजार रुपए होगी। हृदय रोग विशेषज्ञ भारत के हिसाब से इस कीमत को जहां बहुत ज्यादा बता रहे हैं वहीं स्टेंट बनाने वाली विदेशी कंपनियां इस कीमत को भी अपने लिए घाटे का सौदा बता रही हैं। यह मामला अब अदालत के कठघरे में भी है।
एक सरकारी अस्पताल के एक वरिष्ठ कार्डियोलाजिस्ट ने अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि किसी तरह से भी स्टेंट बाहर से मंगाने पर भी (इंपोर्ट प्राइज) कीमत 18 हजार रुपए प्रति स्टेंट से अधिक नहीं है। ऐसे में इनकी कीमतें 67 हजार से लेकर लाख दो या तीन लाख करने का कोई कारण नहीं बनता। बेहतरीन स्टेंट की कीमत भी 60 हजार करने के प्रस्ताव का कोई औचित्य नहीं है।
उन्होंने बताया कि बाहर से स्टेंट मंगाने पर 40 हजार अधिक कीमत वसूलना गरीब मरीजों के साथ अन्याय होगा। क्योंकि अच्छे से अच्छा स्टेंट देने वाली कंपनी (जिसे आम तौर से अच्छा कहा जाता है) भी यह दावा नहीं कर सकती कि उसका स्टेंट क्यों व किस तरह, दूसरों से बेहतर है। तमाम शोध बताते हैं कि किसी खास स्टेंट की कोई खासियत साबित नहीं हुई है, बल्कि देखा गया है कि बढ़िया माने जाने वाले बायो एब्जार्वर (खुद घुल जाने वाले) स्टेंट लगने के बावजूद हृदयाघात व दूसरी दिक्कतें हो ही जाती हैं।
विशेषज्ञ के मुताबिक, इसके अलावा और भी किसी भी तरह से कीमत साबित करना आज के समय में संभव नहीं है। लेकिन यह जरूर है कि भारत में कम कीमत में बन रहे स्टेंट का प्रयोग कम हो रहा है। सारा मसला मुनाफे का है। इसी के चक्कर में कीमतें इतनी अधिक रखी जाती हैं। सरकार को चाहिए कि मुनाफा अधिकतम 30 फीसद तय कर दें जो कि अभी 300 से 400 फीसद तक लिया जाता है। उच्च स्तरीय सूत्रों की मानें तो जो अस्पतालों में खरीद होती है वह भी थोक में होती है। तो भी अस्पताल कीमत के नाम पर कंपनियां स्टेंट की कीमत में कमी नहीं करतीं बल्कि दस स्टेंट के साथ चार बैलून मुफ्त में दे देती हैं या कुछ उपकरण जोड़ देती हैं।
एबॉट, मेडट्रानिक और बोस्टन साइंटिफिक सहित मल्टीनेशनल मेडिकल डिवाइस बनाने वाली कं पनियो के समूह मेडिकल टेक्नोलॉजी एसोसिएशन आॅफ इंडिया के मुताबिक, ताजा प्रस्ताव के आधार पर अगर कीमत तय हुई तो शोधपरक तकनीक पर भारत में काम नहीं होगा। करीब तीन बिलियन डॉलर का मेडिकल क्षेत्र चौपट हो जाएगा। लोग बेहतर स्टेंट की तलाश में दूसरे देशों का रुख करेंगे।
इस मामले में मेडिकल टेक्नोलॉजी एसोसिएशन आॅफ इंडिया के संस्थापक निदेशक प्रोबीर दास का कहना है कि हर स्टेंट को एक सा समझ कर कीमतें तय कर रहे हैं। हमारी अपील है कि वह न किया जाए। इन्हें बांटा जाए। एक तरफ साधारण स्टेंटट का औसत दाम किया जाए व दूसरी ओर तरफ खासियत वाले स्टेंट का औसत दाम हो और तीसरी कीमत उनकी हो जो शोधपरक उत्पाद हैं और फिलहाल बाजार में नही हंै।
मेदांता अस्पताल के अध्यक्ष डॉक्टर नरेश त्रेहन ने कहा कि जिन स्टेंट पर शोध हो रहा हो उसे खास तरजीह दी जाए। डॉक्टर त्रेहन का कहना है कि पुराने स्टेंट की कीमत पर ही चलते जाएंगे तो लोग भारत में नए अनुसंधान व तकनीक लाएंगे ही नहीं। जिस कंपनी ने करोड़ों रुपए खर्च किए हैं किसी डिवाइस को बनाने में वह तो वसूलेगी ही। इस पूरे मामले को हाई कोर्ट तक लाने वाले वीरेंद्र सांगवान की नजर में ये कीमतें हद से अधिक हंै। इसे गरीब आदमी कैसे खरीद पाएगा? हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक मार्च 2017 तक स्टेंट की अधिकतम कीमत तय करने का निर्देश दे रखा है। इसीलिए एनपीपीए ने प्रस्ताव जारी कर दस दिन के भीतर सभी पक्षों से सुझाव मांगा है। इसके बाद एनपीपीए कीमतें तय करेगा।

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