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मकान बनाने वाले भी हैं बहुत परेशान

फ्लैट खरीदारों का बिल्डर कंपनियों के हाथों शोषण और मनमाना रकम वसूलने के आरोपों की कहानी भले ही मंत्री, नेताओं, अफसरों के अलावा न्यायालयों तक पहुंची हो लेकिन इसी कड़ी में उतनी ही दर्द भरी आवाज पूरी तरह से दब भी गई है।

Author नई दिल्ली | May 12, 2017 12:57 AM

फ्लैट खरीदारों का बिल्डर कंपनियों के हाथों शोषण और मनमाना रकम वसूलने के आरोपों की कहानी भले ही मंत्री, नेताओं, अफसरों के अलावा न्यायालयों तक पहुंची हो लेकिन इसी कड़ी में उतनी ही दर्द भरी आवाज पूरी तरह से दब भी गई है। यह आवाज निवेशकों या फ्लैट खरीदारों की नहीं बल्कि उन हजारों मजदूरों और छोटे ठेकेदारों की है। जिन्होंने अपने परिवार की रोजी-रोटी के लिए गगनचुंबी इमारतें खड़ी में अपना पसीना बहाया। या फिर निर्माण में सरिया बंधाई, सामग्री सप्लाई, पलस्तर आदि की छोटी मोटी ठेकेदारी का काम किया है। ये वो लोग हैं, जिनकी आवाज आज तक नहीं सुनी गई है। फ्लैट खरीदारों से इतर इन लोगों के बगैर कागजी दस्तावेजों की लिखा-पढ़ी के लाखों रुपए की परियोजना में लग गए हैं। रियल एस्टेट में मंदी और नोटबंदी के चलते बिल्डर कंपनियों पर ऐसे हजारों लोगों की रकम फंस गई है। भुगतान को लेकर बिल्डर कंपनियों के चक्कर काट कर थक चुके सैकड़ों मजूदर अपनी कई महीनों की तनख्वाह छोड़कर पलायन कर चुके हैं। वहीं, छोटी-मोटी ठेकेदारी करने वालों के लाखों रुपए बिल्डर कंपनियों ने रुपए नहीं होने के चलते पैसों के लिए इंतजार करने को कहा है। भुगतान के लिए कुछ दिनों के नाम से शुरु हुआ यह इंतजार महीनों से लेकर अब सालों में तब्दील हो चुका है।

उत्तर भारत में गगनचुंबी इमारतों के शहर के नाम पर प्रख्यात नोएडा और ग्रेटर नोएडा में तकरीबन 100 से ज्यादा बिल्डर परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। जबकि गाजियाबाद में भी कई दर्जन इमारतें बनाई जा रही हैं। सभी परियोजनाओं में बिल्डर कंपनी खुदाई से लेकर लेंटर डालने, सरिया बांधने, सामग्री आपूर्ति करने से लेकर चिनाई, पलस्तर और रंगाई पुताई का काम ठेके पर कराती है। अलग- अलग कामों का ठेका लेने वाले अपने गांव या जानकारों के यहां से लोगों को काम पर लगाते हैं। इस व्यवस्था में ठेकेदार अपने यहां काम करने वालों को सप्ताह में भुगतान करते हैं। जबकि बिल्डर कंपनी से 30- 45 दिनों में भुगतान मिलता था। वहीं, मजदूरों का भुगतान कर पाने में नाकाम काफी ठेकेदार रातों-रात अपना बोरिया बिस्तर समेट कर शहर तक छोड़ चुके हैं। आलम यह है कि तकरीबन सभी बिल्डर कंपनियां फिलहाल भुगतान की समस्या से ग्रस्त हैं। जिसके चलते ठेकेदारों और मजदूरों के सामने रोजी- रोटी तक का संकट पैदा हो गया है।

सूरजपुर की एक बिल्डर कंपनी में सरिया बांधने की ठेकेदारी करने वाले आशीष राम का 4,35000 हजार रुपए बकाया है। पिछले करीब 9 महीनों से कंपनी के अधिकारी भुगतान के लिए सब्र करने की सलाह दे रही है। अब उसके सब्र का बांध टूट चुका है। यह बानगी अकेले आशीष राम की नहीं बल्कि हजारों की संख्या में उन छोटे ठेकेदारों की है, जो कम पूंजी में अपने लोगों के जरिए बिल्डर परियोजनाओं का काम करा रहे थे। इस मामले पर अखिल भारतीय राष्ट्रीय भवन निर्माण मजदूर संघ के राष्ट्रीय महासचिव बलराम सिंह ने बताया कि इस काम को करने वाले ज्यादातर पूर्वांचल और बिहार के लोग हैं। इनसे से मजदूरी करने वाले सैकड़ों लोग बगैर भुगतान लिए ही पलायन कर चुके हैं। वहीं ठेकेदारों के लाखों रुपए फंसे होने के चलते मजबूरी में इंतजार करना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि कुछ दिनों पहले भुगतान को लेकर पीड़ितों ने खोड़ा कॉलोनी के स्थानीय हिंदु युवा वाहिनी के नेताओं से संपर्क किया था। जिन्होंने बिल्डर कंपनियों से बातचीत कराकर मामले का समाधान कराने का दावा किया है। बलराम सिंह ने कहा है कि भुगतान ना होने की स्थिति में सैंकड़ों की संख्या में पीड़ित ठेकेदार बिल्डर परियोजना और जिलाधिकारी आवाज पर प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे।

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