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बनारस की रंगभरी एकादशीः निकलेगी 354 साल पुरानी पालिका यात्रा, भोलेनाथ के साथ श्रद्धालु खेलेंगे होली

Holi Festival 2019: काशी में रंगभरी एकादशी से के बाद होली खेलने की परंपरा है। यहां 354 वर्षों से लगातार रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ की पालिका यात्रा निकलती है। मान्यता है कि इस दिन बाबा विश्वनाथ स्वयं भक्तों के साथ होली खेलते हैं।

Holi 2019: काशी की रंगभरी एकादशी फोटो सोर्स- स्थानीय

Holi 2019: देश भर में होली के त्यौहार को लेकर उत्साह चरम पर है। इस दौरान बाजार रंगों से सज चुके है। काशी में भी होली को लेकर लोगों में काफी उत्साह है। लेकिन यहां होली से पहले रंगभरी एकादशी की धूम है। काशी के विश्वनाथ मंदिर के महंत आवास पर 354 वर्षों से लगातार रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ, माता पार्वती और गणेश की प्रतिमाओं का दर्शन होता है। काशी के लोगों मानते है कि इस दिन बाबा विश्वनाथ स्वयं भक्तों के साथ होली खेलते हैं।

रंगभरी एकादशी से होली खेलने की परंपरा: बता दें कि काशी में लगातार 354 वर्षो से रंगभरी एकादशी के दिन निकलने वाली बाबा विश्वनाथ की प्रतिमा और पालकी यात्रा के बाद होली खेलने की परंपरा है। यह होली 17 मार्च को खेली जाएगी, जिसमें हजारों की संख्या में भक्त गुलाल उड़ाते हुए पालकी यात्रा में शामिल होंगे।

 

ऐसे मनेगा रंगभरी एकादशी उत्सव: बता दें कि आगामी 17 मार्च को रंगभरी एकादशी को बाबा विश्वनाथ माता पार्वती का गौना कराएंगे। वधू पक्ष से गौने की रस्म विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत कुलपति तिवारी के आवास पर अदा की जाती हैं। पूर्व महंत ने इस संदर्भ में बातचीत के दौरान बताया कि गौने की तैयारियां अंतिम चरण में है। बाबा के रजत पालकी एवं सिंहासन का साफ-सफाई एवं रंग-रोगन का का कार्य भी पूरा हो गया है।

काठ के पालकी से शुरू हुई थी परम्परा: मंदिर के पूर्व महंत ने बताया कि लगभग 354 वर्ष पुरानी यह परम्परा हमारे पूर्वजों ने शुरू की थी। कुलपति तिवारी के मुताबिक सन 1842 में हमारे पूर्वज स्व. विशेश्वर दयाल तिवारी ने लकड़ी के काठ से पालकी यात्रा निकालना शुरू किया था।

नेहरू और बाबा के खादी का इतिहास: पूर्व महंत ड़ॉ. कुलपति तिवारी बताते है कि सन 1934 में देश में स्वतंत्रता आंदोलन के साथ ही खादी का अभियान भी चरम पर था। उस समय रंगभरी एकादशी पर पं. जवाहरलाल नेहरू की माता स्वरूप रानी, बाबा काशी विश्वनाथ का दर्शन करने आई थीं बाबा दरबार में उन्होंने देवाधिदेव महादेव की रजत प्रतिमा को खादी पहनाने की इच्छा महंत परिवार के सामने रखी थी। आगंतुक पंजिका का तब प्रचलन नहीं हुआ करता था, ऐसे में उन्होंने जाते-जाते एक पत्र तत्कालीन महंत पं. महाबीर प्रसाद तिवारी को दिया था। तब से बाबा को एकादशी पर खादी का वस्त्र धारणा कराया जाता है।

गुजरात से बने खादी वस्त्र व राजस्थानी पगड़ी पहनेंगे बाबा विश्वनाथ: इस वर्ष रंगभरी एकादशी पर बाबा राजस्थानी पगड़ी व गुजरात से आई खादी के कपड़ों से बने परिधान पहनेंगे जबकि माता पार्वती को केशरिया रंग की बनारसी साड़ी से सजाएगा। खास बात यह है कि हर साल इस्तेमाल होने वाले गुलाल की जगह इस बार मथुरा से मंगाई गयी बाबा को फूलों और विभिन्‍न पत्तियों से बनी 500 किलो हर्बल अबीर अर्पित की जाएगी।

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