बाड़मेर के केरकोरी गांव के एक कोने में हिशामुद्दीन सिंधी अपने सामने बिखरे मलबे का जायजा ले रहे हैं। कंक्रीट की पटिया, ईंटें और मलबा का ढेर लगा हुआ है। अब बस एक ऊंची और सफेद मीनार ही बची है। मस्जिद के मौलवी हिशामुद्दीन कहते हैं कि हमने इसे बड़ी मुश्किलों से बनाया था, लेकिन अब यह सब खत्म हो गया है। 10 किलोमीटर के दायरे में यही एक मस्जिद थी। अब हम कहां जाएंगे?

वहीं के निवासी हरला राम मेघवाल को अभी भी समझ नहीं आ रहा है कि आखिर हो क्या रहा है। वह कहते हैं कि विध्वंस के विरोध में मुसलमानों ने खाना बनाना बंद कर दिया था, जिसके बाद हमने उन्हें खाना खिलाया। मुझे समझ नहीं आ रहा कि सरकार को इससे क्या फायदा हो रहा है। ये हमारे भाई हैं।

यह मस्जिद उन 12 मस्जिदों में से एक है जिन्हें राजस्थान हाई कोर्ट में दायर एक रिट याचिका के अनुसार, 18 से 20 जून के बीच बाड़मेर के आठ सीमावर्ती गांवों और बीकानेर के चार गांवों में ध्वस्त कर दिया गया था। ये सभी विध्वंस अंतरराष्ट्रीय सीमा के 15 किलोमीटर के दायरे में हो रहे हैं और इनके कारण व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए हैं।

पिछले एक सप्ताह में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के सैकड़ों निवासियों ने ‘सर्व धर्म शांति सभा’ ​​के तहत एकजुट होकर मार्च निकाले हैं और प्रशासन को ज्ञापन सौंपे हैं।

आधिकारिक तौर पर नोटिस में भूमि उपयोग उल्लंघन का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि मस्जिदें गोचर या चरागाह भूमि पर बनी थीं। 27 मई को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अधिकारियों को अंतरराष्ट्रीय सीमा के 15 किलोमीटर के दायरे में अवैध ढांचों के खिलाफ सख्त जीरो टॉलरेंस पॉलिसी लागू करने और उन्हें ध्वस्त करने का निर्देश दिया था।

स्थानीय लोगों का दावा है कि नोटिस अचानक चस्पा किए गए और बिना पूरी कानूनी प्रक्रिया अपनाए ही ढांचों को तोड़ दिया गया। उनका यह भी आरोप है कि इलाके में किसी अन्य समुदाय के निर्माण पर कार्रवाई नहीं की गई।

सियाई गांव के निवासी अब्दुल सिंधी कहते हैं कि कम से कम हमें पहले चेतावनी तो देनी चाहिए थी। हम जुर्माना भी भर देते। वहीं, सफी जमील ने कहा कि वे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दरार पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह कोशिश नाकाम होती दिख रही है। कई हिंदू हमारे समर्थन में हैं और रैली में भी शामिल हुए।

सर्व धर्म शांति सभा की रैली में शामिल हुए पारड़िया के सरपंच सोरता राम मेघवाल का कहना है कि गोचर भूमि पर मंदिर समेत कई संरचनाएं हैं। उन्होंने कहा कि हम अतिक्रमणों का समर्थन नहीं कर रहे हैं, लेकिन अगर सरकार ने एक ढांचे को गिराने का फैसला किया है, तो उसे बाकी ढांचों के साथ भी ऐसा ही करना चाहिए। जब ​​आप अल्पसंख्यक होते हैं, तो आप अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठा सकते, लेकिन इससे इस देश की लोकतांत्रिक नींव हिल जाती है। बाड़मेर में हिंदू और मुसलमान इतने सालों से सद्भाव से रहते आए हैं, ऐसी घटनाएं लोगों के बीच कड़वाहट पैदा करती हैं। उन्हें राजधर्म का पालन करना चाहिए, राजनीति का नहीं। अन्यथा, हम सड़कों पर उतरेंगे और जेलें भर देंगे।

बाड़मेर कलेक्टर चिन्मय गोपाल, पुलिस अधीक्षक चूना राम जाट और राजस्थान के पुलिस महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) संजय कुमार अग्रवाल ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। वहीं, सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने भी इस संबंध में कोई जवाब नहीं दिया।

निवासियों के लिए, ये नोटिस एक झटके के रूप में आए, लेकिन साथ ही साथ एक एकजुटता की शक्ति भी बन गए हैं। हिशामुद्दीन कहते हैं कि जब प्रशासन चला गया, तो मेरे गांव का हर हिंदू मेरे घर आकर मस्जिद के विध्वंस पर शोक व्यक्त कर रहा था। मस्जिद के विध्वंस के बाद चार दिनों तक किसी मुसलमान ने खाना नहीं बनाया और हिंदू हमारे लिए खाना भेजा करते थे।

13 नवंबर, 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि उचित प्रक्रिया के बिना तोड़फोड़ करना कानून के शासन का उल्लंघन है और कहा कि प्रभावित पक्षों को पूर्व सूचना मिलनी चाहिए और उन्हें जवाब देने के लिए कम से कम 15 दिन का समय दिया जाना चाहिए। निवासियों का दावा है कि हालांकि राजस्थान भूमि राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 91 के तहत नोटिस उसी महीने की शुरुआत में जारी किए गए थे, लेकिन उन्हें तोड़फोड़ से ठीक एक दिन पहले ही प्राप्त हुए।

केरकोरी में निवासियों का दावा है कि उन्हें 11 जून का नोटिस केवल 17 जून को मिला। 1956 के कानून की धारा 91 के तहत जारी किए गए इस नोटिस में गोचर की जमीन पर अतिक्रमण का आरोप लगाया गया था और मस्जिद के मौलवी, हिशामुद्दीन सिंधी को जमीन खाली करने या 18 जून को अदालत में पेश होने का निर्देश दिया गया था।

हिशामुद्दीन सिंधी कहते हैं कि पटवारी शाम करीब 7:30 बजे नोटिस लेकर आया। मैं तब भी मस्जिद में ही था। हम पिछले 30 सालों से इसी मस्जिद में नमाज अदा करते आ रहे हैं।

इसके बाद ग्रामीणों ने एक बैठक की और अगले दिन स्थानीय तहसील कार्यालय की ओर प्रस्थान किया। निवासियों का कहना है कि तब तक बुलडोजर वहां पहुंच चुके थे। गांव के निवासी रफीक सिंधी ने बताया कि गांव में सात बड़े ट्रक और 6-7 पुलिस जीपें आईं। तोड़फोड़ अभियान दो घंटे तक चला।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि दो साल पहले गांव वालों के चंदे से मस्जिद का पक्का पुनर्निर्माण किया गया था। एक अन्य निवासी सुलेमान सिंधी कहते हैं कि हमने चंदा इकट्ठा करने के लिए मस्जिद के अंदर एक ताला लगा रखा था। पांच साल तक थोड़ी-थोड़ी रकम दान करके हम एक साधारण पक्की मस्जिद बना पाए थे, जिसे अब ध्वस्त कर दिया गया है।

अंतर्राष्ट्रीय सीमा से 3 किलोमीटर दूर मलाना में विध्वंस को लेकर सन्नाटा छाया हुआ है। हालांकि मलबे का ढेर उस जगह को चिह्नित करता है जहां कभी गांव की मस्जिद हुआ करती थी। एक निवासी का कहना है कि 17 जून को नोटिस दिया गया था और अगले ही दिन इमारत को ध्वस्त कर दिया गया। 15 किलोमीटर दूर सियाई में स्थानीय निवासी फैजु खान मलबे के बीच से गुजर रहे हैं। उनके पीछे सोने के शिखर वाली फ़िरोज़ी रंग की मीनार खड़ी है। 20 जून को नोटिस मिलने के एक दिन बाद, 40 साल पुरानी सियाई मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया।

यह विध्वंस पीर मोहम्मद शाह जिलानी दरगाह समिति द्वारा राजस्थान हाई कोर्ट में दायर रिट याचिका का आधार हैं। अदालती दस्तावेजों से पता चलता है कि 3 जुलाई को हुई सुनवाई में याचिकाकर्ताओं ने कहा कि नोटिस “एक सुनियोजित और यांत्रिक तरीके से तामील किए गए थे, जो विशेष रूप से 1954 अधिनियम की धारा 22 के तहत पूर्वनिर्धारित दृष्टिकोण को दर्शाते हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से ऊपर नहीं हो सकती।

राज्य सरकार ने दावा किया कि यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। उसने यह भी कहा कि धार्मिक संरचनाओं के निर्माण के लिए कलेक्टर से अनुमति लेना अनिवार्य है और कुछ याचिकाकर्ताओं ने 50 किलोमीटर की सीमा पट्टी के भीतर परिसर का निर्माण करने से पहले ऐसी अनुमति प्राप्त नहीं की थी। अब इस मामले की सुनवाई 7 जुलाई को होगी।

इस मामले को लेकर विपक्ष ने सत्तारूढ़ भाजपा को घेरने की कोशिश की है और उस पर पंचायत चुनावों से पहले सांप्रदायिक माहौल भड़काने का आरोप लगाया है। बाड़मेर के बायतू लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस सांसद उम्मेदा राम बेनीवाल कहते हैं कि थारवासी (थार के लोग) एकजुट रहेंगे। वहीं शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी कहते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन सामाजिक सद्भाव की कीमत पर नहीं।

संपर्क करने पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौर ने कहा कि उन्हें राजस्थान में मस्जिद विध्वंस के किसी भी मामले की जानकारी नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि अगर ऐसा कुछ हुआ भी है, तो वह सरकारी जमीन पर अवैध अतिक्रमण के कारण ही हुआ होगा। हम किसी को भी धर्म या जाति के आधार पर परेशान नहीं करते।

बाड़मेर के रानासर गांव के सरपंच नंद किशोर कहते हैं कि इस इलाके में कभी सांप्रदायिक तनाव नहीं देखा गया। अगर सरकार चरागाह भूमि पर बने ढांचे हटाना चाहती है, तो उसे सभी समुदायों के लिए ऐसा करना चाहिए। किसी एक समुदाय को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। मुझे पता है कि भाजपा के कई कार्यकर्ता और उनके सदस्य इन घटनाओं से नाखुश हैं।

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