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हिमाचल चुनाव में ‘पंजाबी तड़का’, अब चुनावी दौर में दौड़ने लगा शानन का करंट

बिजली उत्पादन संयंत्र हिमाचल प्रदेश के जिला जोगिंदरनगर में स्थापित है पर इसका स्वामित्व पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (पीएसपीसीएल) के नियंत्रण में है।

Author जोगिंदरनगर | November 6, 2017 5:21 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ प्रेम कुमार धूमल। धूमल सुजानपुर से चुनाव हार गए हैं। (File Photo/Facebook)

भारत के पहले पनबिजली ऊर्जा संयंत्र ‘शानन पावर हाउस’ की कुल बिजली उत्पादन क्षमता 110 मेगावॉट है। भले ही यह बिजली उत्पादन संयंत्र हिमाचल प्रदेश के जिला जोगिंदरनगर में स्थापित है पर इसका स्वामित्व पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (पीएसपीसीएल) के नियंत्रण में है। अब एक बार फिर से यह परियोजना यहां विवाद से ज्यादा सुर्खियों में है क्योंकि अब शानन का करंट हिमाचल प्रदेश विधानसभा की चुनावी बयार में भी दौड़ता नजर आ रहा है। यहां चुनाव मैदान में उतरे तमाम राजनीतिक दलों के प्रत्याशी इसे हिमाचल के नियंत्रण में ला दिए जाने की ताल ठोंकते फिर रहे हैं ताकि इससे अर्जित पूरा राजस्व प्रदेश के ही खजाने में आए।

इससे पहले वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भी इसका करंट तगड़ा लगा था और तत्कालीन भाजपा प्रत्याशी राम सरूप शर्मा ने तो इसी मांग के समर्थन में अपने समर्थकों को साथ लेकर वहां पावर हाउस परिसर के बाहर धरना तक लगाया था।
जोगिंदरनगर से ही छह मर्तबा विधायक चुने गए गुलाब सिंह ठाकुर को एक बार फिर से भाजपा ने यहीं से अपना प्रत्याशी बनाया है और उनका कहना है, ‘विधानसभा में भी मैंने यह मसला वर्ष 1988 में केंद्र सरकार के साथ उठाने की मंशा से वहां पारित कराया था और हाल ही में मैंने प्रधानमंत्री को भी इस बाबत लिखा है। एक बार हमारी पार्टी सत्ता में आ जाए तो इसे जोरशोर से उठाएंगे। अभी तो इससे अर्जित पूरा राजस्व ही पंजाब सरकार के खजाने में जा रहा है।’

कांग्रेस प्रत्याशी जीवन ठाकुर का कहना है, ‘बरोट की ऊंची चोटी तक निर्माण सामग्री ले जाने के लिए परियोजना के शुरू से ही वहां रेल ट्रैक पर एक ट्रॉली चलाई जाती रही है क्योंकि वहां सड़कों का अभाव था। पर अब यह ट्रॉली आधा सफर ही वहां तय कर पाती है क्योंकि उसके बाद रेल ट्रैक में खराबी आ गई। इसी से इस धरोहर ट्रॉली के रखरखाव में पंजाब सरकार की दिलचस्पी का अंदाजा लगाया जा सकता है।’

1932 में चालू हुई थी शानन बिजली परियोजना

शानन बिजली परियोजना को डिजाइन पंजाब के तत्कालीन अंग्रेज इंजीनियर कर्नल बीसी बैटी और उनके दल ने मंडी के तत्कालीन शासक राजा जोगिंदर सेन के सहयोग से किया था। यह बिजलीघर सन 1924 में अस्तित्व में आया था पर इसे चालू 1932 में कराया गया था। शुरुआत में यह 48 मेगावॉट क्षमता वाली पन-बिजली परियोजना थी पर वर्ष 1982 में पंजाब सरकार ने इसकी क्षमता बढ़ाकर 60 मेगावॉट कर दी थी। बाद में वहां 50 मेगावॉट स्टेज-2 परियोजना जोड़ दी गई और इस तरह से उसकी कुल उत्पादन क्षमता बढ़कर 110 मेगावॉट हो गई। पीएसपीसीएल के मुताबिक, इसे चालू कराए जाने के समय इस पर आई लागत करीब 2.5 करोड़ रुपए थी पर उनके मुताबिक इसकी मौजूदा कीमत 1600 करोड़ रुपए से कम नहीं है। शानन पावर प्रोजेक्ट में कार्यरत वरिष्ठ अधीक्षण अभियंता गुरजंट सिंह ने बताया, ‘यह बिजली उत्पादन का सबसे किफायती तरीका है और प्रति यूनिट हमारी लागत 0.26 पैसे आती है। ताप से बिजली उत्पादन पर लागत 3 रुपए प्रति यूनिट है। हमारा संयंत्र 50 करोड़ यूनिट प्रतिवर्ष की दर से बिजली पैदा करता है, जो कांगड़ा के मार्फत पंजाब में भेज दी जाती है।’ इस बिजलीघ्र से करीब 250 करोड़ रुपए मूल्य की बिजली पैदा होती है और इसी वजह से यह पीएसपीसीएल की किफायती बिजली परियोजनाओं में से एक है।

वैसे पीएसपीसीएल इसी परियोजना संबंधी ब्योरे में साफ लिख रखा है कि वर्ष 1966 में जब वृहत पंजाब का विभाजन हुआ था और पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश नामक तीन नए प्रांत अस्तित्व में आए थे तो यह परियोजना तत्कालीन केंद्र सरकार के सिंचाई एवं बिजली मंत्रालय ने पंजाब के नाम लिख दी थी जो अब वापस नहीं ली जा सकती। इस अहम पहलू की पुष्टि करते हुए खुद शानन के अधीक्षण अभियंता गुरजंट सिंह ने यह जानकारी पीएसपीसीएल की वेबसाइट पर अपलोड रहने की बाबत बताया। आला परियोजना अधिकारियों की यह भी दलील है कि प्रत्याशियों द्वारा उछाला जा रहा 99 साल के पट्टे का मसला तब का है जब देश गुलाम था और हिमाचल वैसे भी वृहद् पंजाब का ही हिस्सा था। बाद में पंजाब के पुनर्गठन के बाद शानन परियोजना पंजाब को सौंप दी गई तो 99 साल के पट्टे का क्या तुक? गुरजंट सिंह ने यह भी बताया कि पीएसपीसीएल में इस परियोजना के सालाना रखरखाव के लिए इस साल 30-35 करोड़ रुपए का बजट रखा है और हर साल वहां रखरखाव पर 20 करोड़ रुपए से ज्यादा रकम खर्च होती है।

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