himachal election candidate's nature will decide won and loss - Jansatta
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हिमाचल चुनाव: उम्मीदवारों का बर्ताव ही तय करता रहा है काफी हद तक नतीजे

पार्टी टिकट के मोर्चे पर ठाकुर रणवीर निक्का को छकाने के बाद अब भितरघात के अंदेशे से दूर पठानिया की अजय के साथ यह दूसरी चुनावी मुलाकात भाजपा में अस्तित्व बचाव की जंग को लेकर है।

Author धमर्शाला | November 6, 2017 5:31 AM
हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उतरे कुल 338 उम्मीदवारों में से 61 उम्मीदवारों (18 प्रतिशत) ने अपने ऊपर आपराधिक मामले घोषित किए हैं।

सुभाष मेहरा 

कांगड़ा जिले के नूरपुर हलके में बहती भाजपाई बयार के बावजूद कांग्रेस के अजय महाजन और राकेश पठानिया के बीच चल रहा सीधा मुकाबला ‘गुण-दोष के आधार पर छूटेगा। पिछली दफा की निर्दलीय टक्कर में अजय से शिकस्त खाए पठानिया इस बार भाजपा की ओर से मैदान में हैं। पार्टी टिकट के मोर्चे पर ठाकुर रणवीर निक्का को छकाने के बाद अब भितरघात के अंदेशे से दूर पठानिया की अजय के साथ यह दूसरी चुनावी मुलाकात भाजपा में अस्तित्व बचाव की जंग को लेकर है। दरअसल व्यवहार कुशल कांग्रेस के सत महाजन के कब्जे में रहे राजपूत बाहुल इस हलके के चुनाव में लोगों के सिर चढ़कर बोलता रहा प्रत्याशियों का बर्ताव ही भाजपा और कांग्रेस की किस्मत का फैसला करता रहा है।

जनता दल की ओर से 1990 में सत महाजन का वर्चस्व तोड़ने वाले केवल पठानिया की उस जीत के आठ बरस बाद राकेश ने 1998 में कांग्रेसी रणजीत बख्शी को परास्त कर भाजपा के लिए इतिहास रचित किया। कहना न होगा 1996 में लोकसभा सदस्य बनने के बाद 2003 में दोबारा विधानसभा मुकाबले में उतरे कांग्रेस के कद्दावर महाजन सत महाजन ने अपनी आखिरी जंग में भाजपा और राकेश को यहां डूबो दिया था। कहना न होगा पानी सिर के उपर लांघने के बावजूद जीभ नरमी की बदौलत अल्पसंख्यक महाजन बिरादरी की अगुआई कर कर रहे सत के बाद पुत्र अजय ने भी राकेश के होश ठिकाने लगा दिए थे। राष्ट्रीय मुद्दों से परे की इस लड़ाई में यकीनन जय-पराजय भी एक बड़ा मुद्दा होगा। देखना होगा कि अजय बनाम राकेश के बीच कांटे की टक्कर में नूरपुर किसके भाग्य का निर्णय करता है।

इधर शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी रैली के बाद कांगड़ा हलके में पवन काजल-राजेश शर्मा के साथ त्रिकोणीय संघर्ष में कमजोर साबित हो रहे भाजपा उम्मीदवार संजय चौधरी की जान में जान आ गई है। 2012 में टिकट बंंटवारे के अंत होने से पहले कभी भाजपा के सहोदर रहे काजल और संजय दूसरी बार आमने सामने आ गए हैं। विधानसभा के हर चुनाव में हर बार नया गुल खिलाने वाले कांगड़ा के मतदाताओं ने पिछली बार भाजपा से बागी हुए काजल को विधायक चुना था तो उससे पहले 2007 में बहुजन समाज पार्टी से जीत कर बाद में भाजपा में शामिल हुए संजय के लिए काजल के साथ यह निर्णायक मुकाबला है।

कांग्रेस ने अपने पूर्व विधायक सुरेद्र काकू के अलावा राजेश के पत्ते साफ करके कांग्रेस ने इस बार मैदान भाजपाई पैदावार काजल के हवाले किया है जाहिर है, टिकटके काकू में फूटे गुस्से की बगावत अब कांग्रेस के दूसरे बागी राजेश के लिए फिलहाल बनी राहत ने लड़ाई को त्रिकोण में बदला हुआ है। इधर, भाजपा में टिकट की आखिरी लड़ाई हार बैठे पिछड़ों के नेता उत्तम चौधरी की मनुहार के बाद भी संजय के रास्ते आसान होते नजर नहीं आ रहे थे। मगर शनिवार की प्रधानमंत्री रैली के बाद ोदी की लय को बरकारार रखने की चुनौती भाजपा के सामने अभी रहेगी।बहरहाल काजल बनाम संजय के मध्य इस मुकाबले की चुनावी किस्मत शायद इस बार भी चुनाव लड़ने के आदी और निर्दलीयों के सदाबहार चेहरे राजेश से रूठी हुई सी लगती है। राजनीतिक किस्मत काजल या संजय में किसी एक की ही बदलेगी।

 

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