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हिमाचल प्रदेश: कीटनाशक नहीं, मित्र कीटों की तरफ बढ़े सूबे के किसान

ओमप्रकाश ठाकुर अपनी फसलों को जहरीले कीटनाशकों के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए हिमाचल प्रदेश के किसान-बागवानों ने एक नया तरीका खोज निकाला है। प्रदेश के किसानों व बागवानों में रासायनिक कीटनाशकों के विकल्प के तौर पर फसल मित्र कीटों के इस्तेमाल का नया रूझान सामने आया है। सेब उत्पादक ही नहीं, पॉलीहाउस, सब्जी उत्पादक […]

Author शिमला। | September 19, 2018 6:16 AM
रासायनिक कीटनाशकों के छिड़काव से प्रदेश के किसानों की फसलें तो जहरीली हो ही रही हैं, जमीन भी बंजर होती जा रही है।

ओमप्रकाश ठाकुर

अपनी फसलों को जहरीले कीटनाशकों के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए हिमाचल प्रदेश के किसान-बागवानों ने एक नया तरीका खोज निकाला है। प्रदेश के किसानों व बागवानों में रासायनिक कीटनाशकों के विकल्प के तौर पर फसल मित्र कीटों के इस्तेमाल का नया रूझान सामने आया है। सेब उत्पादक ही नहीं, पॉलीहाउस, सब्जी उत्पादक और धान की खेती करने वाले किसान भी फसल मित्र कीटों की तरफ मुड़ गए हैं। रासायनिक कीटनाशकों के छिड़काव से प्रदेश के किसानों की फसलें तो जहरीली हो ही रही हैं, जमीन भी बंजर होती जा रही है।

प्रदेश के बागवानों और किसानों को जहरीली खेती से निजात दिलाने के लिए बागवानी व कृषि विभाग की जैव नियंत्रण प्रयोगशालाएं फसल मित्र कीटों की पैदावार कर किसानों व बागवानों को घातक व जहरीले कीटनाशक दवाओं के इस्तेमाल से बाहर निकालने की मुहिम में जुट रही हैं। विभागीय आंकड़ों के मुताबिक अकेले उद्यान विभाग ही हर साल करीब 18 करोड़ रुपए के 315 मीट्रिक टन कीटनाशक खरीदता है और बागवानों को आगे सबसिडी पर मुहैया कराता है। सबसे ज्यादा कीटनाशक सेब उत्पादक खरीदते हैं। इसके अलावा आम, लीची,नींबू व गलगल उत्पादक भी इस कड़ी में शामिल है। कृषि विभाग भी सालाना 180 मीट्रिक टन कीटनाशकों की खरीद कर किसानो का रियायतों दरों पर मुहैया कराता है जबकि एक लाख बीस हजार मीट्रिक टन खाद खरीदी जाती है। यह आंकड़ा सरकारी विभागों का है। निजी तौर पर किसान व बागवान इससे कई गुना ज्यादा कीटनाशक व खाद खरीदते हैं। बागवान व किसान इन रासायनिक कीटनाशकों व खाद से निजात पाना चाहते है।

कोटगढ़ के सेब उत्पादक रमन सिंघा कहते है कि कीटनाशकों के छिड़काव से अपराध बोध सा होता है। उन्होंने परीक्षण के तौर पर इस बार फसल मित्र कीटों को अपने बगीचे के एक ब्लाक में डाला है। इसी तरह बाकी बागवान भी इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। जैविक खेती कर रहे रोहड़ू के चिड़गांव के जीतू चौहान ने कहा कि फल और जड़ को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को नियंत्रित करने के लिए वे अगले साल मार्च में फसल मित्र कीटों को अपने बगीचों में डाल देंगे। इस बार वे देरी कर गए थे। वह रिडुबिड बग और निमाटोड जैसे कीटों को ले जा चुके है। ट्रायकोग्रामा की मांग भी बहुत है। यह फसल दुश्मन कीटों जैसे भृंग व पंतगों को खत्म कर देता है। रझणा प्रयोगशाला में इसकी चार प्रजातियां तैयार की जा जाती हैं। किसानों व बागवानों का कहना है कि इन कीटों के इस्तेमाल के लिए कि सानों व बागवानों को जागरूक भी किया जाना चाहिए।

जुब्बड़हट्टी के पास गांव पटिना के रामगोपाल ने कहा कि उनके पॉलीहाउस में पिछले साल सूंडियों ने हमला कर दिया था। वे अप्रैल में यहां से फसल मित्र कीटों को ले गए व पॉली हाउस में डाल दिए। फसल दुश्मन कीटों की समस्या नियंत्रित हो गई। इसके बाद उनके यहां दो दर्जन के करीब सब्जी उत्पादकों ने इन कीटों का इस्तेमाल कर अपनी फसल बचाई है। ऐसे में कीटनाशकों पर खर्च की जाने वाली बड़ी रकम बच गई। वे अब कीटनाशकों को अपने खेतों मे नहीं डालते हैं।

कीटों की मांग ज्यादा

प्रदेश में रझाणा और पालमपुर में केवल दो ऐसी प्रयोगशाला हैं जहां पर इन फसल मित्र कीटों की पैदावार की जा रही है। रझाणा प्रयोगशाला के प्रमुख कीर्ति राणा कहते है कि उनके लिए साल में सौ हैक्टेयर जमीन को इन कीटों के जरिए कीटनाशक मुक्त कराने का लक्ष्य दिया गया है। अभी तक वे 65 हैक्टेयर फसली जमीन को फसल मित्र कीटों के जरिए कीटनाशक मुक्त करा चुके हैं। साल के आखिर तक वे डेढ सौ हैक्टेयर तक पहुंच जाएंगे। कीटों की पैदावार कम है, मांग ज्यादा है।

धान की खेती के लिए किसान ट्राइगोपैन जैसे मित्र फसल कीट ले जा रहे हैं, जबकि सेब उत्पादकों में निमोटोड व रिडुबिड बग की मांग ज्यादा है। लेकिन ये प्रयोगशालाएं मांग को पूरा नहीं कर पा रही हैं। ये कीट दो सौ से ज्यादा फसल दुश्मन कीटों का संहार करते है और उनके अंडों में खुद के अंडे डाल कर उनकी बढ़ोतरी रोक देते हैं। -अशोक कुमार, प्रभारी, जैव नियंत्रण प्रयोगशाला पालमपुर

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