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सर्पीली पहाड़ी सड़कों पर दौड़ते मौत के वाहन

निजी आपरेटरों के लालच व उनके राजनीतिक रसूख के आगे कानून बौना हो जाता है। इससे साफ है कि हर हादसे के बाद मजिस्ट्रेट जांच का आदेश होता है और रिपोर्ट आने के बाद इसे फाइलों में दफन कर दिया जाता है।

हिमाचल प्रदेश में मौतों की दर 47.8 फीसद है।

ओम प्रकाश ठाकुर

खस्ताहाल सड़कें, कानून लागू करने वाली एजंसियों की कमजोर पकड़ और बढ़ते राजनीतिक दखल ने हिमाचल प्रदेश की सर्पीली सड़कों को मौत की सड़कें बना दिया है। सड़क हादसों की वजह से प्रदेश में सालाना औसतन 12 सौ मौतें हो रही हैं। सरकार चाहे कांग्रेस की हो या फिर भाजपा की,कानून राजनीतिक रसूख के हिसाब से ही काम करता है। यही कारण है कि तेज गति पर कोई काबू नहीं है। निजी आपरेटरों के लालच व उनके राजनीतिक रसूख के आगे कानून बौना हो जाता है। इससे साफ है कि हर हादसे के बाद मजिस्ट्रेट जांच का आदेश होता है और रिपोर्ट आने के बाद इसे फाइलों में दफन कर दिया जाता है।

वर्ष 2015 की राष्टÑीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रपट के मुताबिक सड़क हादसों में प्रदेश में मौतों की दर राष्टÑीय औसत से कहीं ज्यादा है। सड़क हादसों में मौतों की दर में छत्तीसगढ़ 75.1 फीसद के साथ शीर्ष पर है तो हिमाचल प्रदेश में मौतों की दर 47.8 फीसद है व प्रदेश सातवें स्थान पर है। इस रिपोर्ट के मुताबिक जम्मू कश्मीर व उतराखंड जैसे पहाड़ी प्रदेश मौतों की दर में हिमाचल से बेहतर स्थिति में है। प्रदेश में सबसे ज्यादा सड़क हादसे जिला स्तरीय सड़कों व ग्रामीण सड़कों में होते है।

72 लाख की आबादी वाले इस छोटे से प्रदेश में 31 मार्च 2019 तक 16 लाख 9 हजार 654 वाहन पंजीकृत हो चुके है। इनमें से 21 हजार 277 बसें है जबकि 8 लाख 37हजार 46 स्कूटर व मोटरसाइकिल है। इसके अलावा 4 लाख 74 हजार 891 कारें है। इसके अलावा पर्यटन स्थल होने के लाखों वाहन बाहर से आते हैं। सड़कों हादसों के लिए मानवीय चूक सबसे बड़ी वजह है। इसमें तेज गति, शराब पीकर वाहन चलाना जैसी वजहें शीर्ष पर है। परिवहन निगम के संयुक्त सचिव हेमिस नेगी ने कहा कि 90 से 95 फीसद हादसे मानवीय चूक का नतीजा है। सड़कोंं की खस्ता हालात भी खूब जिम्मेदार है। आलम यह है कि प्रदेश में रोड सेफ्टी आडिट आज तक हुआ ही नहीं।

एनएचएआइ के रोड सेफ्टी अधिकारी अशोक कुमार रौलानिया ने कहा कि फोरलेन में डीपीआर में ही घाटी की ओर क्रैश बैरियर लगाने का प्रावधान है। चारों राष्टÑीय राजमार्गों पर जहां क्रैश बेरियर नहीं है वहां पर पैरापिट लगे हुए है व कई जगहों पर काम चल रहा है। कानून लागू करने वाली एजेंसियों पुलिस व परिवहन विभाग के अधिकारियों की जिम्मेदारी कहीं तय नहीं हो रही है। पिछले दो सालों में स्कूली बसों के हादसाग्रस्त होने की वजह से स्कूली बच्चों की मौतें हुई हैं।

अप्रैल 2018 में जिला कांगड़ा के नूरपूर में एक निजी स्कूल की बस हादसाग्रस्त हो गई व इसमें तीस के करीब बच्चों की मौत हो गई। इसके बाद सरकार ने कई दिशा निर्देश जारी किए। लेकिन सब कुछ होने के बाद जनवरी 2019 में सिरमौर के ददाहू में स्कूली बच्चों का वाहन हादसाग्रस्त हो गया व दर्जन भर बच्चों की मौत हो गई। अभी हाल ही में बंजार में निजी बस गिरने से 46 यात्रियों की मौत हो गई तो मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने एक बार फिर उच्च स्तरीय बैठकों का दौर शुरू कर दिया। लेकिन हादसे रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं।

हाइटैक होगी ड्राइविंग लाइसेंस की प्रक्रिया
परिवहन मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर ने कहा कि मानवीय चूक व राजनीतिक दखल दूर करने के लिए सरकार ड्राइविंग लाइसेंस की प्रक्रिया से लेकर प्रशिक्षण तक को हाइटेक करने पर काम कर रही है। ड्राइविंग लाइसेंस की प्रक्रिया को कठिन करने का फैसला किया गया है। प्रशिक्षण संस्थानों में बायोमीट्रिक लगाई जाएंगी व प्रशिक्षण के दौरान चालक ने कितने किलोमीटर वाहन चलाया, इसका हाइटेक लेखाजोखा रखा जाएगा।

हादसों का आंकड़ा

पुलिस विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 2016 में प्रदेश में 3168 सड़क हादसे हुए और इनमें 1271 यात्रियों की मौतें हो गई। जबकि 2017 में 3114 हादसों में 1203 मौतें हो गई। 2018 में 3110 सड़क हादसे हुए व इनमें 1208 यात्रियों की जानें चली गई। इस साल जनवरी से लेकर 15 जून तक प्रदेश की सड़कों पर 1385 सड़क हादसे हो चुके हैं और इनमें 569 यात्रियों की मौतें हो चुकी है।

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