पार्टी की तमाम रपट में तो फिसल चुके हैं जयराम

उत्तराखंड में बेशक चार महीने में ही आलाकमान ने मुख्यमंत्री बदल दिया हो लेकिन हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर फिलहाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बदौलत अपना पद बचाने में कामयाब रहे हैं।

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जयराम ठाकुर। फाइल फोटो।

ओमप्रकाश ठाकुर

उत्तराखंड में बेशक चार महीने में ही आलाकमान ने मुख्यमंत्री बदल दिया हो लेकिन हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर फिलहाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बदौलत अपना पद बचाने में कामयाब रहे हैं। हालांकि अटकलें उन्हें लेकर भी कम नहीं है। प्रदेश में हुए चार नगर निगम चुनावों में से जब से दो पर भाजपा की हार हुई है, तभी से अंदरखाने उनका तख्ता पलटने की मुहिम शुरू हो गई थी। आलाकमान को तब लगा कि हिमाचल खतरे में आ गया है।

इस हार के बाद आलाकमान ने हिमाचल प्रदेश पर ध्यान देना शुरू कर दिया और प्रदेश प्रभारी अविनाश राय खन्ना से तमाम तरह की रपट मंगवानी शुरू कर दीं। इस दौरान आरएसएस की प्रदेश इकाई और उतरी क्षेत्रीय इकाई से भी रपट मंगवाई गई। संघ ने चंडीगढ़ में भी बैठकें कीं। राजधानी शिमला में कार्यसमिति की बैठकें हुईं। शिमला में प्रदेश प्रभारी के साथ सौदान सिंह को भी भेजा गया।

इनकी रपट आलाकमान की ओर से देख लेने के बाद 15 दिनों के भीतर धर्मशाला में हुई बैठकों में प्रदेश प्रभारी अविनाश राय खन्ना और सौदान सिंह के अलावा भाजपा के राष्ट्रीय संगठन मंत्री बीएल संतोष तक को जायजा लेने भेजा गया। धर्मशाला में भी तीन दिन तक मंथन करने के बाद जो रपट आलाकमान को गई हंै उन्हें पूरी तरह से गुप्त रखा गया है। लेकिन बाहर जिस तरह की जानकारियां मिल रही हैं उससे साफ है कि ये रपट बहुत ज्यादा उत्साहजनक नहीं हैं।

अब तमाम लोगों की ओर से आलाकमान को अपनी रपट दे चुकने के बाद आलाकमान के निर्देशों का इंतजार किया जा रहा है। इन तमाम नेताओं ने इन रपट में प्रदेश की तमाम जमीनी स्थिति का खाका आलाकमान के पास रख छोड़ा है। लेकिन आलाकमान ने इन तमाम रपट को अपनी बगल में दबाकर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा को जमीनी स्थिति का खुद पता लगाने के लिए प्रदेश भेजा। नड्डा अपने दो दिवसीय दौरे पर हिमाचल आए और तमाम स्थितियों से रूबरू भी हुए और अपने अंदाज में वे नेताओं और कार्यकर्ताओं से भी मिले। सूत्रों के मुताबिक नड्डा के प्रदेश दौरे से पहले राजधानी से नेताओं की एक जोड़ी दिल्ली का गुप्त दौरा कर आई है।

गौर रहे कि हिमाचल प्रदेश नड्डा का गृह प्रदेश है और वह यहां की राजनीति से पूरी तरह से वाकिफ ही नहीं यहां की राजनीति का हिस्सा भी हैं। यह दीगर है कि जब 15 जून से 30 जून तक शिमला से लेकर धर्मशाला तक चले भाजपा के मंथन शिविरों से उन्होंने खुद को अलग रखा। मुख्यमंत्री जयराम ने स्थितियों को भांपते हुए अपना पूरा कुनबा नड्डा की आवभगत में झोंक दिया है। नड्डा के हेलीकाप्टर से उतरने से लेकर तमाम समय तक सरकार व संगठन उनकी आवभगत में लगा रहा। जाहिर है जयराम अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हंै। वे जानते हंै कि उतराखंड में क्या हुआ है और नड्डा ने कैसे चार महीने में वहां के दो मुख्यमंत्रियों से इस्तीफा मांग लिया है।

चूंकि प्रदेश में तीन उपचुनाव होने हंै, ऐसे में आलाकमान हिमाचल को लेकर काफी सक्रिय है। बड़ा सवाल यही है कि क्या जयराम जीत का सिलसिला जारी रख पाएंगे। बहरहाल, भीतरी सूत्रों के मुताबिक आरएसएस में राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न जगहों पर हिमाचल से दर्जनों पदाधिकारी तैनात हैं जिनकी जयराम के अलावा अन्य किसी नेता पर मुख्यमंत्री को लेकर सहमति नहीं बन रही है। इसलिए संघ के ये पदाधिकारी प्रदेश में किसी तरह के बदलाव के पक्ष में नहीं है। लेकिन जब तक आलाकमान की ओर से नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों पर खुल कर विराम नहीं दे दिया जाता तब तक जयराम की कुर्सी को लेकर अटकलें जारी रहेंगी जो प्रदेश भाजपा के लिए ज्यादा नुकसानदेह होने वाली है।

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