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हिमाचलः अभी तो भितरघातियों से सहमे हैं दोनों प्रमुख दल

हिमाचल प्रदेश में इस बार के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी ही नहीं, भाजपा को भी भितरघातियों का डर सता रहा है। चुनाव प्रचार चल रहा है और शुरुआत में ही बगावत की उठती आवाजों ने दोनों दलों को परेशान कर दिया है।

Author शिमला | Updated: April 18, 2019 3:00 AM
वीरभद्र सिंह और आनंद शर्मा

ओमप्रकाश ठाकुर

हिमाचल प्रदेश में इस बार के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी ही नहीं, भाजपा को भी भितरघातियों का डर सता रहा है। चुनाव प्रचार चल रहा है और शुरुआत में ही बगावत की उठती आवाजों ने दोनों दलों को परेशान कर दिया है। विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने बहुत सी सीटों पर अपनों की बगावत और भितरघात की वजह से हार झेली। शिमला शहरी सीट पर पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा अपने करीबी हरभजन सिंह भज्जी को टिकट दिलवाने में कामयाब रहे। इस पर वीरभद्र सिंह के करीबी हरीश जनार्था जो प्रदेश पर्यटन विकास निगम के उपाध्यक्ष भी थे, निर्दलीय खड़े हो गए और भज्जी बुरी तरह से हार गए। जनार्था भी नहीं जीते। भाजपा प्रत्याशी को फायदा मिला और वह जीत गए। इसी तरह ठियोग विधानसभा हलके से राहुल गांधी के करीबी दीपक राठौर टिकट झटक कर ले आए। आश्चर्यजनक तौर पर वहां पर वामपंथी नेता राकेश सिंघा जीत कर आ गए। यहां पर कांग्रेस की बड़ी नेता विद्या स्टोक्स के अलावा वीरभद्र सिंह की भूमिका भी सवालों में रही थी। मंडी के द्रंग में तो पूर्व मंत्री कौल सिंह ठाकुर ही चुनाव हार गए।

वहां पर भी कांग्रेस के बागी और वीरभद्र सिंह के करीबी पूर्ण चंद ठाकुर निर्दलीय खड़े हो गए थे। नालागढ़ में वीरभद्र सिंह के करीबी बाबा हरदीप सिंह बागी बन कर विधानसभा चुनावों में उतर गए। वे हार गए व कांग्रेस का अधिकृत उम्मीदवार भी हार गया। जिला बिलासपुर से राहुल गांधी के करीबी राजेश धर्माणी भी भितरघात के शिकार हुए और चुनाव हार गए। इसके अलावा भी ऐसी बहुत सी सीटें थीं जिन पर भितरघात हुआ और कांग्रेस 21 विधायकों पर सिमट कर रह गई। दीपक राठौर,भज्जी और कौल सिंह ने प्रदेश प्रभारी रजनी ठाकुर को हार की वजह और किन नेताओं की शह पर क्या हुआ, संबंधी सब कुछ बताया, लेकिन बड़े नेताओं के खिलाफ हुआ कुछ नहीं। बागियों को पार्टी के बड़े नेताओं की शह मिलती रही। खासकर वीरभद्र सिंह का नाम तो हारे उम्मीदवार पार्टी की बैठकों में सरेआम लेते रहे।

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शिमला में भी पहरे की जरूरत
अगर भाजपा ने बागवत की राह पर चल रहे अपने कुछेक नेताओं को काबू में नहीं किया तो शिमला संसदीय सीट पर भी भितरघात होने की आशंका है। यह दीगर है कि भाजपा में भितरघातियों पर निगाह रखने के लिए आरएसएस जैसा संगठन है, इसके अलावा सांगठनिक तौर पर भी पार्टी मजबूत है लेकिन कांग्रेस में न तो निगाह रखने वाला कोई तंत्र विकसित है और न ही कोई पूछने वाला है।

कांगड़ा में टिकट को लेकर रंज
कांगड़ा सीट पर वीरभद्र सिंह पूर्व मंत्री सुधीर शर्मा को टिकट दिलाना चाहते थे। उन्होंने उनका नाम सार्वजनिक सभाओं में भी घोषित कर दिया था। लेकिन आलाकमान ने टिकट पवन काजल को दिया। इसके अलावा पूर्व सांसद चंद्र कुमार भी टिकट की दौड़ में थे । वे भी वीरभद्र सिंह के वफादारों में हैं। टिकट न मिलने से नाराज ये तमाम नेता क्या करते है, यह महत्त्वपूर्ण होगा।

हमीरपुर में दोनों प्रमुख दलों में विभीषण!

हमीरपुर संसदीय हलके में भाजपा के वजनदार प्रत्याशी अनुराग ठाकुर के सामने जिला बिलासपुर से नैनादेवी विधानसभा हलके से कांग्रेस विधायक रामलाल ठाकुर है। यहां वीरभद्र सिंह अनुराग ठाकुर के पिता व पूर्व मुख्यमंत्री प्रत्याशी प्रेम कुमार धूमल को हराने वाले सुजानपुर से कांग्रेस विधायक राजेंद्र राणा के पुत्र अभिषेक राणा को टिक ट दिलाना चाहते थे जबकि आलाकमान पूर्व सांसद और भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुरेश चंदेल को मैदान में उतराना चाहता था। लेकिन राज्य के नेताओं के विरोध पर रामलाल ठाकुर को टिकट थमा दिया गया। जबकि रामलाल यह चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे। राजेंद्र राणा इन चुनावों में क्या करेंगे, इसे लेकर अभी तस्वीर साफ होनी है।

रामलाल ठाकुर कभी वीरभद्र सिंह के करीबियों में शुमार थे। लेकिन एक अरसे से उन्होंने बिलासपुर सदर से पूर्व कांग्रेस विधायक बंबर ठाकुर को पीठ थपथपाने का काम शुरू कर रखा है। हमीरपुर सीट से भाजपा को भी भितरघात का डर सता रहा है। धूमल परिवार जयराम की मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए चुनौती है। महेंद्र सिंह ठाकुर तो जयराम की तरह मंडी सीट पर रामस्वरूप शर्मा को जिताने के काम में लग गए हैं। हमीरपुर संसदीय हलके में तो वे ज्यादा कुछ कर भी नहीं रहे हैं। वैसे भी धूमल से उनकी अब ज्यादा करीबियां नहीं रही हैं। विधानसभा चुनावों में भाजपा ने धूमल के आधा दर्जन करीबियों को इतने व्यवस्थित तरीके से हराया कि किसी को कुछ भी करने का मौका नहीं मिला।

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