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गिरफ्तारी के डर से हाजिर हुए भाजपा नेता, भड़के जज ने कहा- प्रदेश अध्‍यक्ष हैं तो क्‍या हाईकोर्ट खरीद लेंगे

अशोक परनामी पर आरोप है कि पिछले साल 17 नवंबर को उन्होंने स्थानीय लोगों से कहा कि हाईकोर्ट से स्टे होने के कारण सरकार पार्क में पार्किंग का निर्माण नहीं सकती, लेकिन स्थानीय लोग ऐसा करते हैं तो हम आंखें बंद कर लेंगे।

राजस्थान भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी। (Source Youtube)

राजस्थान हाईकोर्ट ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी को कड़ी फटकार लगाई है। हाईकोर्ट में गुरुवार को परनामी के खिलाफ अवैध निर्माण को बढ़ावा देने संबंधी मामले की सुनवाई चल रही थी। परनामी पर आरोप है कि उन्होंने पिछले साल नवंबर में जवाहर नगर सेक्टर 4 में पार्क की जमीन पर पार्किंग विकसित करने के लिए अपनी मंजूरी दी थी, जो कोर्ट के आदेश के खिलाफ है। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा- वे (अशोक परनामी) प्रदेश अध्यक्ष हैं तो क्या कोर्ट की अवमानना करेंगे? क्या वे हाईकोर्ट को खरीद लेंगे? न्यायाधीश केएस झवेरी और न्यायाधीश वीके व्यास की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि सत्ता का मद सर चढ़कर बोलता है।

दरअसल, गुरुवार को मामले की सुनवाई के दौरान दोपहर 12 बजे तक अशोक परनामी हाईकोर्ट में हाजिर नहीं हुए थे। इस पर कोर्ट ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए आदेश दिया कि अगर परनामी दोपहर 2 बजे तक कोर्ट में हाजिर नहीं हुए तो उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया जाएगा। कोर्ट ने साथ ही यह भी कहा कि यदि वे (परनामी) अदालत की इतनी इज्जत करते हैं तो हमें भी उनकी खातिरदारी करनी होगी। कोर्ट के इस सख्त रुख को देखते हुए परनामी कुछ घंटे के भीतर ही अदालत में हाजिर हो गए।

अशोक परनामी के खिलाफ दायर याचिका में कहा गया है कि हाईकोर्ट कई बार पार्क और ग्रीन बेल्ट की जमीन को बचाने का आदेश दे चुकी है। मास्टर प्लान के संबंध में भी मुख्य पीठ ने पिछले साल पार्कों की जमीन को बचाने का निर्देश दिया है। लेकिन आर्दश नगर विधायक अशोक परनामी ने जवाहर नगर सेक्टर 4 में पार्क की जमीन पर पार्किंग बनाने के लिए अपनी मंजूरी दे दी।

अशोक परनामी पर आरोप है कि पिछले साल 17 नवंबर को उन्होंने स्थानीय लोगों से कहा कि हाईकोर्ट से स्टे होने के कारण सरकार पार्क में पार्किंग का निर्माण नहीं सकती, लेकिन स्थानीय लोग ऐसा करते हैं तो हम आंखें बंद कर लेंगे। याचिका में कहा गया है कि परनामी के इस बयान से न्यायपालिका की साख गिरी है। इसके साथ ही आम लोगों में भी न्यायपालिका की प्रतिष्ठा धूमिल हुई है। याचिका के मुताबिक, परमानी के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू करने के लिए महाधिवक्ता से अनुमति मांगी गई थी, लेकिन उन्होंने इसकी अनुमति नहीं दी।

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