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पैरासिटामॉल या जिम की दवाओं से हेपेटाइटिस का खतरा

विश्व हेपेटाइटिस दिवस के मौके पर शुक्रवार को एम्स के निदेशक डॉ आर गुलेरिया ने बताया कि तपेदिक के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाएं, पैरासिटामॉल की अधिकता व बॉडी बिल्डिंग के लिए जिम में इस्तेमाल होने वाली दवाएं लिवर को नुकसान पहुंचाती हैं।

Author नई दिल्ली | July 29, 2017 12:56 AM
Taking medicine

विश्व हेपेटाइटिस दिवस के मौके पर शुक्रवार को एम्स के निदेशक डॉ आर गुलेरिया ने बताया कि तपेदिक के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाएं, पैरासिटामॉल की अधिकता व बॉडी बिल्डिंग के लिए जिम में इस्तेमाल होने वाली दवाएं लिवर को नुकसान पहुंचाती हैं। यही नुकसान आगे चल कर हेपेटाइटिस का रूप ले लेता है। उन्होंने कहा कि इसके अलावा कुछ हर्बल दवाएं भी लिवर के लिए फायदेमंद नहीं हैं। इसलिए खुद से दवाएं लेने के बजाय डॉक्टर की सलाह जरूर लें। इस मौके पर गैस्ट्रोलॉजी विभाग के मुखिया डॉ अनूप सराया ने बताया कि लिवर की कुल बीमारियों में से 20 से 25 फीसद मामले जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से संबंधित हैं। इसकी चपेट में ज्यादा से ज्यादा युवा आबादी आ रही है।

डॉ गुलेरिया ने कहा कि एक दिन में 15-16 ग्राम तक पैरासिटामॉल लेने से लिवर में घाव हो जाता है। इसके अलावा जिम में इस्तेमाल होने वाली हाई प्रोटीन दवाओं में एनाबॉलिक स्टेरॉयड मिला दिए जाते हैं, जो लिवर की गंभीर बीमारी पैदा कर रहे हैं, इनसे कभी-कभी कैंसर तक हो जाता है। डॉ अनूप सराया ने कहा कि वायरस, अनियंत्रित दवाओं का इस्तेमाल, शराब, शरीर में जमा जहर और फैट विभिन्न तरह के हेपेटाइटिस के मामले बढ़ा रहा है। उन्होंने बताया कि लिवर खराब होने का सबसे बड़ा कारण शराब का सेवन है। 40 से 50 फीसद हेपेटाइटिस के मामले शराब के लंबे समय तक सेवन से होते हैं। 40 ग्राम से ज्यादा शराब 10 साल या उससे अधिक समय तक लेने वाले को लिवर सिरोसिस का खतरा रहता है, जो पूरी तरह ठीक नहीं हो पाता और कैंसर में तब्दील हो जाता है। डॉ सराया ने मरीजों के लिए हुई परिचर्चा में बताया कि आजकल महानगरों में बढेÞ मोटापे, मधुमेह, डिब्बाबंद खाने व शारीरिक श्रम के अभाव में युवा आबादी में लिवर की समस्या बढ़ रही है। इसे नियमित व्यायाम व ताजे स्वास्थ्यवर्धक भोजन से कम किया जा सकता है। इसके अलावा रोजाना की कैलोरी घटा कर 300 से 400 तक कर देनी चाहिए।

डॉ सौरभ केडिया ने कहा कि यूं तो हेपेटाइटिस 98 फीसद मामलों में ठीक हो जाता है, लेकिन अगर गर्भवती महिला को इसका संक्रमण हो जाए तो इसके 15 से 20 फीसद मामलों में लिवर फेल होने का खतरा रहता है। इस तरह के मामले में मृत्युदर भी अधिक है। इसका इलाज नहीं है, बल्कि शरीर खुद ही इसके खिलाफ एंटीबॉडी बना लेता है। इसी तरह हेपेटाइटिस के मामले भी आराम करने व हाइजीन से खुद ठीक हो जाते है। हेपेटाइटिस बी व सी की दवाओं पर काम हो रहा है। हेपेटाइटिस सी के इलाज में नई दवाओं का अच्छा प्रभाव देखा जा रहा है, जबकि बी का इलाज अभी भी एक चुनौती है, जिसमें कैंसर तक का खतरा रहता है।

डॉ दीपक गुंजन ने बताया कि टीके लगाकर हेपेटाइटिस से बचा जा सकता है। यह टीका सभी को मिले तो जन स्वास्थ्य पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ कम किया जा सकता है और बहुत से मरीजों को कैंसर के कारण मौत के मुंह में जाने से रोका जा सकता है। डॉ शालीमार ने कहा कि स्वास्थ्य सेवा से जुडेÞ, सर्जरी करा चुके, बार-बार खून चढ़वाने वाले या डायलिसिस कराने वाले को हेपेटाइटिस की जांच जरूर करानी चाहिए क्योंकि इनको खतरा ज्यादा होता है और इसके लक्षण भी नहीं दिखाई देते। अचानक किसी दूसरी बीमारी के जांच से इसका पता लग जाता है। इसलिए एहतियात रख कर इससे बचा जा सकता है।

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