पीपल, वट, नीम की त्रिवेणी ही है सत्यवान के जीवन का लक्ष्य

हरियाणा में त्रिवेणी अभियान अब एक जन आंदोलन बन चुका है। त्रिवेणी यानी वट, पीपल और नीम के पेड़ लगाने के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करना।

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सत्‍यवान।(त्रिवेणी बाबा) फाइल फोटो।

हरियाणा में त्रिवेणी अभियान अब एक जन आंदोलन बन चुका है। त्रिवेणी यानी वट, पीपल और नीम के पेड़ लगाने के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करना। इस अभियान को अपने जीवन का मिशन बनाया है भिवानी जिले में लोहारू के पास एक छोटे गांव बिसलवास में जन्मे सत्यवान ने। धर्म, संस्कृति, परोपकार और पर्यावरण में ऐसे रमे कि अविवाहित रहते हुए एक तरह से वैरागी जीवन अपना लिया। 55 साल के सत्यवान को अब हरियाणा के लोग त्रिवेणी बाबा के नाम से ही जानते हैं।

25-26 वर्षों के दौरान वे पचास हजार से ज्यादा त्रिवेणी (एक ही परिसर में नीम, पीपल व वट का पौधारोपण) लगा चुके हैं। पौधारोपण के सरकारी अभियान तो वर्षों से चलाए जा रहे हैं। पर करोड़ों पौधे लगाने के सरकारी दावे धरातल पर फलते-फूलते और लहलहाते पेड़ों के रूप में कम ही दिखते हैं। तभी तो आक्सीजन का संकट भी लगातार बढ़ रहा है। वायु प्रदूषण में भी कमी नहीं दिखती और तेजी से गिरते भूजल स्तर को भी हम नहीं रोक पा रहे। इसके उलट सत्यवान का दावा है कि उनके लगाए वट, पीपल और नीम के पेड़ों में से औसतन 90 फीसद फल फूल रहे हैं।

त्रिवेणी बाबा ने महापुरुषों, शहीदों, स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति को स्थायी रूप देने के लिए तो जगह-जगह त्रिवेणी लगाई ही, लोगों को अपने माता-पिता और दूसरे प्रियजनों की स्मृति में भी वट, पीपल और नीम का एक-एक पेड़ लगाने के लिए वे लगातार पे्ररित कर रहे हैं। सैंकड़ों जगहों पर तो पेड़ों की यह त्रिवेणी और उसके आस पास के चबूतरे अब प्राकृतिक धर्मशाला का रूप ले चुके हैं। इन तीन पेड़ों के अलावा भी वे दूसरे पेड़ लगाने के लिए लोगों को प्रेरित करते हैं। उनका अनुमान है कि अब तक उनके प्रयास से हरियाणा में 40 लाख से ज्यादा वृक्ष लग चुके होंगे। ढाई दशक में ऐसा शायद ही कोई दिन रहा हो जब उन्होंने पौधारोपण न किया हो। भिवानी के एक गांव के शमशान घाट पर 1994 में उन्होंने पहली बार वट, पीपल और नीम का एक-एक पेड़ लगाया था। अब तो ज्यादातर शिक्षा संस्थाओं, सरकारी भवनों और अस्पतालों व जेल हर जगह ये तीन पेड़ जरूर नजर आते हैं।

अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, सत्यवान को इस कहावत की वास्तविकता का अहसास शुरू से था। लिहाजा इसे जन आंदोलन बनाना शुरू से उनका मिशन रहा। इसके लिए त्रिवेणी के वृक्षापरोपण अभियान को उन्होंने संस्कारों, धार्मिक रस्म-रिवाज और परंपराओं से जोड़ दिया। नतीजा यह है कि अब लोग त्रिवेणी के पौधों को शादी-विवाह की रस्म में आत्मसात करने लगे हैं। पूर्वजों की मृत्यु पर ब्रह्मभोज के अलावा मेहमानों और सगे संबंधियों को फलदार पौधे भेंट करने की अनूठी परंपरा से वृक्षारोपण ने रफ्तार पकड़ी है। महिलाओं को बच्चों के जन्मदिन पर वृक्षारोपण के लिए प्रेरित करने के परिणाम भी सुखद रहे हैं।

पर्यावरण संरक्षण को धर्म से जोड़ने का भी लाभ हुआ है। मेवात के गांवों में त्रिवेणी बाबा ने मुल्ला मौलवियों से पौधारोपण कराया तो गुरु नानक के प्रकाश पर्व को भी पौधारोपण से जोड़ दिया। आखिर धर्म का सार भी तो प्रकृति का संरक्षण करना ही है। बकौल त्रिवेणी बाबा नीम, वट और पीपल के पेड़ वायु मंडल में दूसरे पेड़ों की तुलना में आॅक्सीजन तो ज्यादा छोड़ते ही हैं, इनकी आयु भी लंबी होती है। इनसे छाया भी मिलती है और भूस्खलन रोकने में भी ये दूसरे पेड़ों से ज्यादा कारगर होते हैं। इनकी लंबे समय तक देखभाल की भी जरूरत नहीं पड़ती। इन पेड़ों का इंसान के साथ-साथ पक्षियों को भी बड़ा फायदा होता है। वे इन पर घोंसले आसानी से बना लेते हैं। त्रिवेणी बाबा संगोष्ठियां करके जगह-जगह लोगों को त्रिवेणी की महत्ता के बारे में जागरूक भी करते हैं।

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