नहीं भर रही हरियाणा कांग्रेस पार्टी की दरारें

हरियाणा कांग्रेस की गुटबाजी, रस्साकसी और अंदरूनी खींचातानी को लेकर पार्टी में कई बार चिंतन-मंथन का दौर चला, लेकिन कोई बीच का रास्ता अभी तक नहीं निकल पाया है।

(ऊपर) भूपेंद्र सिंह हुड्डा, कुमारी सैलजा। फाइल फोटो।

सुमन भटनागर

हरियाणा कांग्रेस की गुटबाजी, रस्साकसी और अंदरूनी खींचातानी को लेकर पार्टी में कई बार चिंतन-मंथन का दौर चला, लेकिन कोई बीच का रास्ता अभी तक नहीं निकल पाया है। कमलनाथ और गुलाम नबी आजाद जैसे दिग्गज नेताओं को हरियाणा कांग्रेस के प्रभारी का जिम्मा दिया गया लेकिन वे भी यहां पार्टी को एकजुट करने का कोई फार्मूला नहीं तलाश पाए। पार्टी ने एक साल पहले संगठन के काम में माहिर माने जाने वाले वाले विवेक बंसल को प्रभारी बना कर भेजा लेकिन वे भी कोई ऐसी घुट्टी नहीं बना पाए जो हरियाणा कांग्रेस के सभी दिग्गजों को एक छाते के नीचे ला सके।

दरअसल, हरियाणा कांग्रेस की अंतर्कलह एक पुरानी बीमारी की तरह काफी हद तक लाइलाज हो गई है जिसके कारण सात साल से प्रदेश कांग्रेस का संगठन अधर में लटका है। 2014 में अशोक तंवर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने और 2019 तक उनका पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के साथ पार्टी के अन्दर व बाहर सियासी जंग चलती रही। आखिरकार तंवर को जाना पड़ा और पार्टी ने कई बार सांसद रहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री सैलजा को संगठन के मुखिया की कमान सौंपी लेकिन रस्साकसी जारी रही।

वर्ष 2019 का लोकसभा व हरियाणा विधानसभा चुनाव पार्टी को बिना संगठन के लड़ना पड़ा।विवेक बंसल कई महीनों से प्रदेश कार्यकारिणी, ब्लाक व जिला अध्यक्षों की जल्द घोषणा करने के बात कर रहे हैं। माना जा रहा है कि जब तक भूपेन्द्र सिंह हुड्डा व सैलजा इन नियुक्तियों को लेकर एक राय नहीं होते तब तक सर्वमान्य फैसला होता नजर नहीं आता। हुड्डा व सैलजा दोनों खेमों में अपने अपने ब्लाक व जिला अध्यक्षों लेकर तकरीबन फैसला हो चुका है लेकिन अभी इस बात को लेकर पेच फंसा हुआ है कि किस जिले का अध्यक्ष हुड्डा का समर्थक होगा और किस जिले की बागडोर सैलजा समर्थक के हाथों में रहेगी।

कांग्रेस के एक नेता के मुताबिक अनुसार हुड्डा का रोहतक, सोनीपत, झज्जर, जींद, पानीपत और नूंह में व्यापक असर है। दो साल पहले हुए विधानसभा चुनावों में इन जिलों में हुड्डा समर्थकों को ज्यादा सीटें मिली थीं। इसी तरह सैलजा का अंबाला, पंचकूला, यमुनानगर व सिरसा में अच्छा प्रभाव माना जाता है। वह अंबाला व सिरसा से दो-दो बार सांसद भी रह चुकी हैं।

हिसार व फतेहाबाद में कुलदीप बिश्नोई का जनाधार माना जाता है। किरण चौधरी भिवानी, चरखीदादरी व महेंद्रगढ़ जिला पर अपने समर्थकों के लिए दावा ठोंक सकती हैं। कैप्टन अजय सिंह यादव रेवाड़ी व गुरुग्राम में अपने जिला अध्यक्ष की मांग कर सकते हैं। रणदीप सिंह सुरजेवाला भले ही पार्टी की केन्द्रीय राजनीति में सक्रिय हों लेकिन कैथल व कुरुक्षेत्र में उनकी भी अपनी मजबूत टीम है।

गांधी परिवार के नजदीक होने के साथ ही सैलजा राज्य में कांग्रेस का सबसे बड़ा दलित चेहरा हैं, तो हुड्डा के पास कांग्रेस विधायकों का दो तिहाई बहुमत है और वे कांग्रेस का सबसे बड़ा जाट चेहरा भी हैं। असली दिक्कत तो यह है दोनों नेता एक दूसरे का वर्चस्व मानने को तैयार नहीं हैं। एक पुराने कंग्रेस नेता का कहना है कि यदि दोनों नेताओं में इस मुद्दे पर एक राय नहीं बन पाती तो पार्टी आलाकमान को अपने पर्यवेक्षकों के जरिए जमीनी फीडबैक जुटा कर खुद ही इस पर अंतिम फैसले का ऐलान कर देना चाहिए।

पढें हरियाणा समाचार (Haryana News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।

अपडेट