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हरियाणा- दस साल में 26 फुट गिरा भूजल

पंजाब और हरियाणा में पानी के लिए चल रही जबरदस्त जंग बेशक राजनीतिक रंग ले चुकी है और फिलहाल इससे निपटने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा।

Author चंडीगढ़ | May 25, 2017 3:47 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

 संजीव शर्मा
पंजाब और हरियाणा में पानी के लिए चल रही जबरदस्त जंग बेशक राजनीतिक रंग ले चुकी है और फिलहाल इससे निपटने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा। पर असलियत यह है कि पानी के घटते स्रोतों और भूमिगत जलस्तर लगातार गिरने से दोनों प्रदेशों की जनता के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। पंजाब में सेम की समस्या ने भी किसानों की माथे पर चिंता की लकीरें बढ़ा दी हैं। हरियाणा में भूमिगत जल की स्थिति खतरनाक बनी हुई है। जल प्रबंधन विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भूमिगत जल की निकासी इसी प्रकार जारी रही तो खेतों की प्यास बुझना तो दूर यहां के निवासी भी पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस जाएंगे। हरियाणा के प्रसिद्ध प्रबुद्ध जल वैज्ञानिक एसपी गुप्ता तो पानी की राशनिंग तक की बात करते हैं। हरियाणा में पानी के अंधाधुंध दोहन से भूजल स्तर गत 10 सालों में 26 फीट नीचे चला गया है।

आठ साल पहले किया था आगाह
विशेषज्ञों की मानें तो 2008 से वैज्ञानिक हरियाणा में गंभीर संकट पैदा होने की चेतावनी दे रहे हैं, इसके बावजूद ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। हरियाणा में इस संकट के मूल में वैज्ञानिक खेती के खराब व्यवहार और एनसीआर से सटे जिले में बेतरतीब विकास में पानी का अंधाधुंध दोहन है।
जिला भूजल वैज्ञानिक एमएस लांबा बताते हैं भूजल स्तर के लगातार नीचे जाने के कारण तलाशे गए तो पता चला कि बारिश में भूमिगत जल में जितना सुधार होता है, उससे कहीं ज्यादा दोहन कर लिया जाता है। गुड़गांव में बंदिश के बाद गिरावट की गति धीमी हुई है। अब अवैध ट्यूबवेल पर भी कार्रवाई की जा रही है। राज्य में पानी की गुणवत्ता भी खतरे में पड़ गई है।

गहरा पानी, खराब गुणवत्ता
ऐसे क्षेत्र जहां पानी गहराई पर है, वहां सिर्फ 36 प्रतिशत क्षेत्र में ही पानी की गुणवत्ता ठीक है जबकि शेष 64 प्रतिशत क्षेत्र में पानी की गुणवत्ता सामान्य या खारा है। पानी में खारापन राज्य के पूर्वी हिस्से में अधिक हैं जिसमें पंचकूला, यमुनानगर, अंबाला, कुरुक्षेत्र और करनाल जिले आते हैं। खारापन राज्य के केंद्रीय और पश्चिमी भाग में भी बढ़ा है। जींद, रोहतक, सिरसा, हिसार, भिवानी, सोनीपत का पानी भी खारा हो रहा है।

नौ हजार से ज्यादा नलकूप बंद
पानी की भरमार वाले कुरुक्षेत्र जिले के लाडवा, शाहबाद और थानेश्वर के 1024 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले 273 गांवों के 19797 नलकूपों में से 9877 नलकूपों ने काम करना बंद कर दिया है। यानी यहां आधे से अधिक नलकूप नाकारा हो गए हैं। भूमिगत जल स्तर की स्थिति करनाल में खतरनाक बनी है। यहां के घरौंडा और नीलोखेड़ी ब्लॉक के 940 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले 124 गांवों में 1291 नलकूपों ने काम करना बिल्कुल बंद कर दिया है।
बेहद गंभीर बात यह है कि हरियाणा में पानी का संकट बढ़ा तो इससे राज्य की खेती का पूरी तरह से कबाड़ा हो जाएगा। समाजशास्त्री तो यहां तक कहते हैं कि अगर हरियाणा में पानी की कमी हुई तो लोग नहर काटना शुरू कर देंगे और दिल्ली जैसे प्रांतों को पीने के पानी के लिए तरसना होगा।

कोट

हरियाणा की धरती धान की खेती के लिए कतई अनुकूल नहीं है और किसानों को यह देर-सवेर समझ लेना चाहिए कि यह उनके लिए ही घातक है। सरकार को मई-जून के महीने में नलकूपों के पानी पर निर्भर रहकर धान लगान पूरी तरह प्रतिबंधित कर देना चाहिए।
प्रो. रोहतास, कुरुक्षेत्र विश्विविद्यालय प्राणीशास्त्र विभाग

करनाल जैसे जिले में जो पानी की दृष्टि से काफी सुरक्षित माने जाते हैं, पानी का टोटा पड़ गया है और किसानों ने यदि समय रहते साठ जैसे फसलों को प्रतिबंधित नहीं किया तथा पानी की प्रबंधन और रीचार्ज के बारे में नहीं सोचा तो हरियाणा भर में यह समस्या गहराएगी।
आरएस दून, आईएएस

 

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