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‘सरस्वती अवतरण’ के सहारे मनोहर सरकार

हरियाणा सरकार ने प्रदेश के लोगों को धार्मिक रूप से साधने के लिए गाय और गीता के बाद अब सरस्वती का दामन थाम लिया है।

Author चंडीगढ़ | January 18, 2018 01:50 am
हरियाणा सीएम मनोहर लाल खट्टर। (File Photo)

संजीव शर्मा
हरियाणा सरकार ने प्रदेश के लोगों को धार्मिक रूप से साधने के लिए गाय और गीता के बाद अब सरस्वती का दामन थाम लिया है। सरस्वती नदी की खोज का विचार कई सालों में लगातार चर्चा में आता रहा है लेकिन करीब ढाई साल पहले से इस नदी ने सुर्खियां बटोरनी शुरू की हैं। हरियाणा सरकार द्वारा 18 जनवरी से प्रदेश में अंतरराष्ट्रीय सरस्वती उत्सव का आयोजन किया जा रहा है। हाल ही में गीता जयंती उत्सव में फजीहत के बाद भाजपा सरकार ने अब लोगों को धार्मिक रूप से साधने के लिए सरस्वती का दामन थाम लिया है। लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी के उदगम स्थल होने का दावा यमुनानगर जिले के ऐतिहासिक तीर्थ स्थल कपाल मोचन के निकट आदि बद्री में करीब दो साल पहले किया गया। तभी से प्रदेश सरकार ने यमुनानगर जिले के गांव काठगढ़ व आसपास करोड़ों रुपए बजट की कई परियोजनाएं शुरू कर चुकी है।

हरियाणा सरकार यमुनानगर जिले के कस्बे मुस्तफाबाद का नाम बदलकर सरस्वती नगर कर चुकी है। सरकारी दावे में हरियाणा में सरस्वती का 153 किलोमीटर लंबा प्रवाह क्षेत्र माना गया। इसे बहाने का मतलब है कि यह जमीन लोगों को खाली करनी पड़ेगी। सरस्वती को पुनर्जीवित करने के रास्ते में यह भी एक बड़ी चुनौती है। हालांकि इससे बड़ी चुनौती यह साबित करना भी होगा कि बरसाती पानी और यहां-वहां से पानी जुटाकर जो नदी तैयार की जाएगी उसे किस तरह ऋग्वेद वाली हिमालय से निकलने वाली सरस्वती नदी कहा जाए। 7 मई, 2015 को यमुनानगर जिले के मुगलांवाली गांव में सरस्वती के संभावित प्रवाह क्षेत्र में खुदाई का काम चल रहा था। तभी एक जगह छह फुट की गहराई पर मजदूरों को नमी वाली मिट्टी मिलनी शुरू हुई। फिर एक फुट और खोदने पर यहां पानी निकल आया। दिलचस्प बात यह है कि मुगलांवाली, काठगढ़ व आदि बद्री के आसपास रहने वाले हजारों ग्रामीणों को आज भी इस बात का यकीन नहीं है कि उनका गांव सरस्वती नदी का उद्गम स्थल हो सकता है।

आस्था में व्यापार न हो : ग्रामीण
सोम नदी के किनारे पर बसे करीब दो हजार की आबादी वाले गांव काठगढ़ (आदि बद्री) का दौरा करने पर यहां के 75 वर्षीय राम प्रकाश ने बताया कि इस पूरे क्षेत्र में भूमिगत जलस्तर काफी ऊंचा है। इसके कारण कहीं भी खुदाई करने पर पानी निकल आता है। इसी गांव के सरपंच रामसरण बताते हैं कि गांव की करीब 400 एकड़ पंचायती जमीन सैकड़ों वर्षों से मंदिर के नाम है। अब प्रदेश सरकार द्वारा इसी जमीन पर परियोजनाएं शुरू की जा रही हैं। उन्होंने बताया कि यहां वन विभाग के विश्राम गृह को पर्यटन विभाग के नाम हस्तांतरित करके विकसित किया जा रहा है।

क्या है सरकार की योजना
हरियाणा सरकार ने यमुनानगर जिले के गांव काठगढ़ स्थित आदि बद्री को सरस्वती नदी का उद्गम स्थल माना है। इस कारण यमुनानगर, कुरुक्षेत्र, जींद, कैथल से होते हुए सिरसा जिले के ओटू हेड तक प्रवाह मार्ग का सीमांकन करने के भी निर्देश दिए। सरस्वती धरोहर बोर्ड के डिप्टी चेयरमैन प्रशांत भारद्वाज ग्रामीणों के दावे को पुख्ता करते हुए मानते हैं कि आदि बद्री के पास सोम्ब नदी पर बांध बनाकर एक बड़ी झील बनाई जाएगी, जिससे सरस्वती यानी (सरस का समागम) चरितार्थ हो जाएगा। इसके बनने से भूजल स्तर बढ़ेगा। सिंचाई के लिए भी सरस्वती नदी का पानी उपयोग में लिया जा सकेगा। दूसरी झील पिहोवा के निकट स्योंसर के वन क्षेत्र में बनाई जाएगी।

संघ के एजंडे और वाजपेयी के सपने को साकार कर रहे खट्टर

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरस्वती नदी की खोज को लेकर हमेशा से उत्साहित रहा है। हरियाणा में 1999 के दौरान सरस्वती शोध संस्थान नाम से एक गैरसरकारी संस्था का गठन हुआ था और इसके अध्यक्ष दर्शन लाल जैन, राज्य में संघ के प्रमुख रह चुके हैं। इस संस्थान के अस्तित्व में आने के बाद से गैर-सरकारी स्तर पर सरस्वती पुनर्जीवन अभियान में काफी सक्रियता आ गई। अटल बिहारी बाजपेयी जब दूसरी बार प्रधानमंत्री बने तो 2002 में उनके कार्यकाल के दौरान संस्कृति मंत्री जगमोहन ने पहली बार केंद्र सरकार के स्तर पर सरस्वती खोज अभियान को हरी झंडी दिखाई थी। अटल सरकार की योजना में संस्कृति मंत्री इस पैनल के प्रमुख थे और इसे 36 महीनों में सरस्वती खोज का काम पूरा करना था। दो साल बाद ही राजग सत्ता से बाहर हो गया और कांग्रेस सहित वामपंथी पार्टियां, जो इस परियोजना को पहले ही भगवा एजेंडा घोषित कर चुकी थीं, की यूपीए सरकार ने परियोजना रद्द कर दी। उसके बाद वर्ष 2014 में जब हरियाणा में भाजपा की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री ने आरएसएस लॉबी के निर्देशों पर फिर से सरस्वती नदी परियोजना को शुरू कर दिया। वास्तव में यह परियोजना अटल बिहारी वाजपेयी सरकार का ड्रीम प्रोजैक्ट रह चुकी है। जिस पर कांग्रेस और वामपंथियों ने ब्रेक लगाया था। अब इसे अमली रूप देकर मुख्यमंत्री अपने संघर्ष के उन साथियों को भी तोहफा देने जा रहे हैं जिन्होंने तीन दशक पहले सरस्वती के लिए यात्रा की थी।

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