ताज़ा खबर
 

सात दशक पहले बापू ने पकड़ी बांह तो वहीं थम गए पांव

सात दशक पहले बापू को जुबान देकर इस गांव में ही बसने वाले लोगों को आज भी अपने फैसले पर मलाल नहीं है। वे लोग उस समय खुशी-खुशी रुके थे। उन्हें मलाल बस इस बात का है कि आजादी के 72 साल छह महीने के बाद गांधी के नाम से जाना जाने वाला यह गांव अत्यंत पिछड़ा हुआ है।

Author Updated: February 26, 2020 2:29 AM
सात दशक पहले बापू को जुबान देकर इस गांव में ही बसने वाले लोगों को आज भी अपने फैसले पर मलाल नहीं है।

तमन्ना अख्तर

घासेड़ा (मेवात)। ‘तुम देश छोड़ के मत जाओ…यह तुम्हारा भी देश है…इसे छोड़के कहां जाओगे…बस मेरे कहने पर रुक जाओ…’ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बांह पकड़ कर यह इसरार करने पर यहां से पाकिस्तान जा रहे काफिलों ने अपने वतन, अपनी मिट्टी, अपनी जमीन को छोड़कर न जाने का फैसला किया था। बापू के इसरार और अपनी मिट्टी की महक ने उन्हें रोका तो वे आज तक यहीं रुकेहैं। हरियाणा के मेवात जिले के घासेड़ा गांव को तबसे ही गांधीग्राम के नाम की न केवल पहचान मिली है।

सात दशक पहले बापू को जुबान देकर इस गांव में ही बसने वाले लोगों को आज भी अपने फैसले पर मलाल नहीं है। वे लोग उस समय खुशी-खुशी रुके थे। उन्हें मलाल बस इस बात का है कि आजादी के 72 साल छह महीने के बाद गांधी के नाम से जाना जाने वाला यह गांव अत्यंत पिछड़ा हुआ है।

घासेड़ा के हाजी आजिम इशा बताते हैं कि विभाजन के समय वह 16 साल के थे। इसलिए वह उस पल के साक्षात गवाह हैं। उन्होंने कहा-यह बात दरअसल 19 दिसंबर, 1947 की है। सांप्रदायिक दंगों के कारण मेवाती मुसलमानों ने भी भारत से पाकिस्तान का रुख करने का फैसला कर लिया था।

अलवर से भी मुसलमानों का गुट यहां इकट्ठा हो काफिलों में पाकिस्तान जाने की तैयारी कर चुका था। उस समय पंजाब विधानसभा के सदस्य एवं मेवात निवासी चौधरी यासीन खान इन लोगों के इस फैसले के खिलाफ थे। उन्होंने गांधी से इस बाबत मदद की गुहार लगाई। इस पर गांधी घासेड़ा आए, उन्होंने वाशिंदों से यहां से न जाने की अपील की। तबतक पठान जत्थे की देखरेख में तीन काफिले पाकिस्तान रवाना हो चुके थे। लेकिन बाकी काफिलों में बैठे लोगों ने गांधी पर भरोसा कर यहां से न जाने का निर्णय लिया।
इशा कहते हैं, ‘अरे काएका गांधीग्राम…भाई यह जगह सिर्फ गांधी के नाम से जानी जाती है हकीकत में कोई हमें पूछता तक नहीं।’ गांव में पानी की समस्या पर इशा बोले, ‘पानी है कहां?… यहां तो जंगलों में भी पानी न हैं।’

‘राजधानी दिल्ली से 50 किलोमीटर दूर यह गांव करीबन 16000 लोगों को समेटे हुए है। हरियाणा के सबसे बड़े गांवों में शामिल घासेड़ा की हालत इतनी खस्ता है कि यहां जो एक आध सरकारी स्कूल है वहां बच्चों के मुकाबले पर्याप्त अध्यापक नहीं है। हर कक्षा में कम से कम 150-200 बच्चें है और उन्हें संभालने के लिए एक-एक अध्यापक!’, ग्रामीण अकबर का कहना है कि यहां गांव में शिक्षा भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है।

सेल्फी विद डॉटर के संस्थापक सुनील जागलान के दो स्वयंसेवक नदीम खान और इंजमाम गांधीग्राम के दो पड़ोसी गांवों में संस्था की ओर से पाठशालाओं में शाम को स्कूल छोड़े हुए या पढ़ाई में कमजोर बच्चों को पढ़ाते हंै। शिक्षकों का अभाव होने के कारण बच्चों को शिक्षा का अभाव न हो यह सुनिश्चित करने के लिए ग्रामीण यहां गांधीग्राम में भी ऐसी सुविधा दिलाने की अपील कर रहे हैं।

दीन-दुनिया की सीख के लिए मदरसे
गांव में ही स्थित ‘मदरसा उबाइ बिन क्वाब’ में बच्चे कुरान पढ़ने जाते हैं। मदरसे के मौलाना शेर मोहम्मद अमिनी ने जनसत्ता को बताया, ‘बच्चों को ‘दीन और दुनिया’ दोनों की सीख देना जरूरी है। मदरसों में विज्ञान, गणित जैसे विषयों को शामिल करने के सरकार के फैसले का हम इस्तकबाल करते हैं। बहरहाल हम यहां बच्चों को अरबी, ऊर्दू के अलावा अन्य भाषाओं का भी ज्ञान देते है।’

इस सत्र (2020-2021) में शिक्षकों के आभाव की समस्या खत्म हो जाएगी। मार्च के बाद से रिक्त पड़े शिक्षकों के पदों को भर दिया जाएगा। रही बात गांधी के नाम से जुड़े होने के कारण पर्यटन के लिहाज से इसे विकसित करने की तो हमने ऐसे ऐतिहासिक महत्व वाले इलाकों की एक सूची बनाकर केंद्र सरकार को भेजी हुई है। इनमें गांधीग्राम भी शामिल है। -कंवर पाल गुज्जर, शिक्षा व पर्यटन मंत्री, हरियाणा

प्रदेश के पिछड़े इलाकों में शामिल होने के कारण जो भी अध्यापक मेवात का चयन करता था उसे बोनस मिलता था। लेकिन चूंकि केंद्र सरकार ने पिछड़े इलाकों की योजना खत्म कर दी है बावजूद इसके हरियाणा सरकार निजी स्तर पर घासेड़ा को मदद पहुंचाने की कोशिश कर रही है।
-दुष्यंत चौटाला, उपमुख्यमंत्री , हरियाणा

Next Stories
1 उत्तराखंड: वर्चस्व की जंग अब सड़क पर आई
2 खुशहाली की कक्षा में मेलानिया की परी-कथा
ये पढ़ा क्या?
X