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मां के ‘जिगर’ से बची डेढ़ साल की फातिमा

इराक से अपनी डेढ़ साल की बेटी का इलाज कराने भारत आई हाना ने अपनी बेटी फातिमा के लिए अपने जिगर को दान कर दिया। नोएडा के एक अस्पताल में 18 जनवरी को इनकी सफल सर्जरी कर लीवर प्रत्यारोपण किया गया।

मां ने बेटी फातिमा के लिए अपने जिगर को दान कर दिया।

मां अपने बच्चों को जिगर का टुकड़ा यूं ही नहीं कहती हैं। इराक से अपनी डेढ़ साल की बेटी का इलाज कराने भारत आई हाना ने अपनी बेटी फातिमा के लिए अपने जिगर को दान कर दिया। नोएडा के एक अस्पताल में 18 जनवरी को इनकी सफल सर्जरी कर लीवर प्रत्यारोपण किया गया। डेढ़ साल की फातिमा लीवर की दुर्लभ, जन्मजात और अनुवांशिक बीमारी कांजेनाइटल हेपेटिक फ्राइब्रोसिस से पीड़ित थी। स्वस्थ्य मां और बेटी एक- दो दिनों में इराक लौटने की तैयारी में हैं। मंगलवार को जेपी अस्पताल में गौतम बुद्ध नगर के मुख्य चिकित्साधिकारी डॉक्टर अनुराग भार्गव और नोट्टो (नेशनल ऑर्गन एंड टिशू ट्रांसप्लांट आर्गनाइजेशन) के निदेशक डॉ. विमल भंडारी ने अंग दान करने वाली महिलाओं को सम्मानित किया। अस्पताल ने 400 लीवर और किडनी के सफल प्रत्यारोपण का दावा किया है। इनमें से कुल 212 महिलाओं ने अपने परिजनों को लीवर और किडनी देकर जीवन दान दिया है।

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इस मौके पर अस्पताल के लीवर प्रत्यारोपण विभाग के वरिष्ठ परामर्शदाता डॉक्टर अभिदीप चौधरी ने बताया कि फातिमा को पैदा होने के तुरंत बाद पीलिया हो गया था, जो समय के साथ बढ़ता गया। जन्म के डेढ़ महीने बाद पता चला कि वह एक आनुवांशिक बीमारी एलेगिले सिंड्रोम से पीड़ित है। फातिमा का एक साल की उम्र तक वजन महज 6 किलो रहा। वह केवल तरल आहार ले पाती थी। इसका असर लीवर, हृदय और शरीर के अन्य अंगों पर पड़ता है। केवल तरल खाने और वजन कम होने की वजह से फातिमा के दिल से फेफड़ों को खून ले जाने वाली एक धमनी (आर्टरी) उसमें विकसित नहीं हुई थी। जिस वजह से शल्य चिकित्सा के बाद तुरंत वेंटिलेटर हटाना बेहद मुश्किल होता है। सफल प्रत्यारोपण की वजह से शल्य चिकित्सा के बाद वेंटिलेटर को बगैर किसी मुश्किल के हटा लिया गया। उन्होंने बताया कि फातिमा की हाइपर रिड्यूस्ड लेफ्ट लेटरल लीवर ग्राफ्ट सर्जरी हुई थी। इसमें फातिमा की उम्र और वजन के चलते उसकी मां का लीवर साथ नहीं दे रहा था। इस वजह से जरूरत के अनुसार फातिमा की मां के लीवर को छोटा करना पड़ा। शल्य चिकित्सा के दौरान लीवर को काटा और मोटाई कम करने के बाद प्रत्यारोपित किया। अब फातिमा और उसकी मांग को कुछ जरूरी दवाएं दी जा रही हैं। पूरी तरह से स्वस्थ्य दोनों अपने देश लौटने को तैयार हैं। बताया गया कि भारत के अलावा मंगोलिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश, इराक, नाइजीरिया, किर्गिस्तान, अफगानिस्तान, अफ्रीकी एवं मध्य पूर्वी देशों से आए मरीजों का इलाज किया गया है। कुल 212 महिलाओं ने अपने परिवारजनों को लीवर और किडनी दान में देकर उन्हें नई जिंदगी दी है।

भारत में हैं दुनिया में सबसे कम अंग दान दाता : डॉ विमल भंडारी
समारोह में मौजूद नोट्टो के निदेशक डॉक्टर विमल भंडारी ने देश में अंगदान के महत्व पर जोर दिया। आंकड़ों के मुताबिक देश में 5 हजार मरीजों को हृदय प्रत्यारोपण की जरूरत है, जिनके के लिए केवल 70 दानदाता मौजूद हैं। इसी तरह 2 लाख मरीजों में से केवल 7 हजार मरीजों को ही किडनी दान में मिल पाती है। गंभीर अवस्था वाले 90 फीसद मरीज दानदाता के नहीं मिलने पर असमय मौत का शिकार हो जाते हैं। अंग और ऊतक (टिश्यू) दान में देना एक मानवतावादी काम है। अगर स्वस्थ्य हंै तो हर उम्र का व्यक्ति अंगदान कर सकता है। अंगदान को लेकर गलतफहमियों को दूर करना जरूरी है। आम तौर पर किडनी, दिल (हृदय), लीवर, फेफड़े और अग्नाशय अंगों का प्रत्यारोपण किया जाता है। प्रत्यारोपित होने वाले में ऊतक में आंखों का कॉर्निया, हड्डी, त्वचा और हृदय वॉल्व शामिल है। एक अंग दानदाता कई लोगों को नई जिंदगी दे सकता है।

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