सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले ने पश्चिम बंगाल के कई परिवारों की चिंता बढ़ा दी है। मतदाता सूची से नाम कटने के बाद अब उन्हें नागरिकता जांच की आशंका सता रही है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में ऐसी ही दो महिलाओं हलीमा खातून और गुड़िया राजक की कहानी सामने आई है। दोनों के मामले ट्रिब्यूनलों में लंबित हैं। दोनों को भरोसा है कि वे भारतीय नागरिक हैं। लेकिन उन्हें डर है कि लंबी प्रक्रिया के दौरान कहीं सरकारी योजनाओं का लाभ और दूसरी सुविधाएं प्रभावित न हो जाएं।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाएंगे, उनके मामलों को चार सप्ताह के भीतर नागरिकता अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकारी को भेजा जाएगा। संबंधित व्यक्ति को नोटिस और सुनवाई का अवसर देने के बाद ही फैसला लिया जाएगा।

पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना के कमरहाटी में रहने वाली 32 वर्षीय हलीमा खातून घरेलू सहायिका हैं। उनका, उनके पति और सास का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, हलीमा ने हाल ही में अपने बैंक खाते से पूरी बचत निकाल ली क्योंकि उन्हें आशंका थी कि कहीं नागरिकता संबंधी विवाद के कारण बैंक खाता प्रभावित न हो जाए।

2002 की मतदाता सूची में पिता का नाम दर्ज था

हलीमा का दावा है कि उनके परिवार की जड़ें पश्चिम बंगाल में हैं। उनके पिता का नाम 2002 की मतदाता सूची में दर्ज था, जो एसआईआर प्रक्रिया में महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है। उन्होंने आधार कार्ड, पैन कार्ड, एलआईसी के दस्तावेज, अपने पिता की पहचान संबंधी कागजात और पुराना मतदाता पहचान पत्र सहित कई दस्तावेज जमा किए थे। वह बताती हैं कि उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान भी किया था।

इसके बावजूद उनका नाम प्रारंभिक मसौदा सूची से हटा दिया गया। हलीमा का कहना है कि उन्हें न तो कोई नोटिस मिला और न ही किसी अधिकारी ने संपर्क किया। बाद में बूथ लेवल अधिकारी की सलाह पर उन्होंने दो बार फॉर्म-6 भरकर आवेदन किया, लेकिन दोनों बार आवेदन खारिज हो गया।

हलीमा का कहना है कि ट्रिब्यूनल की ओर से भी अब तक कोई औपचारिक नोटिस नहीं मिला है। उन्होंने सुनवाई की जानकारी लेने की कोशिश की, लेकिन बताया गया कि नोटिस के बिना ट्रिब्यूनल परिसर में प्रवेश नहीं मिल सकता। ऐसे में उनका परिवार महीनों से इंतजार कर रहा है।

उन्हें यह भी डर है कि मतदाता सूची से नाम हटने का असर सरकारी योजनाओं पर पड़ सकता है। उनके पति एक दुकान में सहायक के रूप में काम करते हैं और दोनों बच्चों की पढ़ाई सरकारी स्कूल में चल रही है। हलीमा के अनुसार, उनकी मामूली बचत ही पूरे परिवार की आर्थिक सुरक्षा है।

दक्षिण 24 परगना के बिष्णुपुर में रहने वाली 35 वर्षीय गुड़िया राजक का मामला भी इसी तरह का है। मूल रूप से बिहार की रहने वाली गुड़िया शादी के बाद पश्चिम बंगाल आई थीं। उनका, उनके पति राजू राजक और ससुर दीपक राजक का नाम भी एसआईआर के बाद मतदाता सूची में शामिल नहीं है।

गुड़िया ने आधार कार्ड, पैन कार्ड, बैंक खाते का विवरण और निवास प्रमाण समेत सभी आवश्यक दस्तावेज जमा किए हैं। उनका मामला भी ट्रिब्यूनल के पास लंबित है। उन्होंने ट्रिब्यूनल कार्यालय जाकर जानकारी लेने की कोशिश की, लेकिन उन्हें नोटिस आने तक इंतजार करने को कहा गया।

हालांकि गुड़िया अपनी नागरिकता को लेकर आश्वस्त हैं। उनका कहना है कि उनका जन्म बिहार में हुआ है और वे कानूनी रूप से पश्चिम बंगाल में रह रही हैं। फिर भी उन्हें चिंता है कि यदि उनका नाम जल्द बहाल नहीं हुआ तो सरकारी योजनाओं का लाभ प्रभावित हो सकता है।

इस बीच, राज्य के खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री और भाजपा विधायक अशोक कीर्तनिया ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि जिन मामलों पर ट्रिब्यूनलों या अन्य सक्षम प्राधिकारियों के समक्ष सुनवाई चल रही है, वे सरकारी योजनाओं का लाभ लेते रहेंगे। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि एसआईआर प्रक्रिया में हटाए गए और अवैध घुसपैठिया माने जाने वाले लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब हलीमा और गुड़िया जैसे अनेक परिवार ट्रिब्यूनलों के निर्णय का इंतजार कर रहे हैं। उनके लिए यह मामला केवल मतदाता सूची में नाम बहाल होने का नहीं, बल्कि नागरिकता, सरकारी योजनाओं तक पहुंच और भविष्य की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।

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लोकतंत्र में किसी भी चुनाव की शुचिता इस बात पर निर्भर करती है कि जनप्रतिनिधि के चयन की प्रक्रिया कितनी संवैधानिक, निष्पक्ष और पारदर्शी है। यह तभी सुनिश्चित हो पाता है, जब मतदाता चुनाव में मतदान की वास्तविक पात्रता रखते हों और तमाम चुनावी कार्य स्वतंत्र तरीके से संपन्न कराए जाएं। इसकी जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग पर होती है और वह समय-समय पर मतदाता सूची में संशोधन करता रहता है, ताकि जो व्यक्ति मतदान के लिए पात्र नहीं है या जिनका निधन हो चुका है, उनके नाम सूची से हटा दिए जाएं। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है, मगर इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि कुछ राज्यों में पिछले दिनों इसे लेकर कई तरह के विवाद खड़े हो गए। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक।