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टैगोर के जरिए बच्चों को अधिकार संपन्न बनाने की तैयारी

दक्षिण पूर्वी दिल्ली में एक वंचित इलाके के बच्चे गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर के जीवन पर आधारित फिल्मों, लघु कहानियों, पेंटिंग्स और कविताओं के माध्यम से खुद को जीवन की कसौटी पर कसने के लिए प्रयासरत हैं।

नई दिल्ली | May 30, 2016 1:19 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

दक्षिण पूर्वी दिल्ली में एक वंचित इलाके के बच्चे गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर के जीवन पर आधारित फिल्मों, लघु कहानियों, पेंटिंग्स और कविताओं के माध्यम से खुद को जीवन की कसौटी पर कसने के लिए प्रयासरत हैं। फरहाना सैफी, किरण राय, आरती यादव, अदीबा सैफी, अब्दुल करीम और हसन रजा नकवी अपने जीवन की मुश्किलों से पार पाने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार, शिक्षा और आत्मविश्वास के बारे में टैगोर के दर्शन को आत्मसात कर रहे हैं।

12वीं कक्षा की छात्रा अदीबा का कहना है ‘रविन्द्रनाथ टैगोर ने न केवल मेरे काम को प्रभावित किया है बल्कि उनके विचारों ने जीवन के प्रति मुझे नया नजरिया प्रदान किया है। मुझे कैनवस पर कुमुदनी, मृणाल और चारूलता जैसे उनके महिला किरदारों की पेंटिंग बनाना अच्छा लगता है। ये किरदार आधुनिक दौर की महिलाओं का प्रतीक हैं।’ असीम आशा उस्मान ने जामिया नगर इलाके में सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़े बच्चों के लिए कला के माध्यम से बच्चों को अधिकार संपन्न बनाने के उद्देश्य से वर्ष 2008 में असीम आशा फाउंडेशन की शुरुआत की थी।

उनका कहना है कि टैगोर की शिक्षा में जागरूकता फैलाने और अधिकार संपन्न बनाने की क्षमता है। उस्मान ने कहा ‘टैगोर कवि, कहानीकार, चित्रकार, गीतकार और लेखक के तौर पर बहुत कुछ कहते हैं। हम टैगोर के काम पर आधारित वृत्तचित्र निर्माण, तस्वीरों वाली कैलिग्राफी, संगीत, नृत्य, कशीदाकारी, सिलाई, चित्रकारी और अन्य प्रकार की कला पर कार्यशालाएं आयोजित करते हैं।’

इलाके में धार्मिक धु्रवीकरण और घरेलू हिंसा के मुद्दों से दो चार हो रहे असीम आशा की पढ़ाई जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में हुई है और उनका कहना है कि उनके केंद्र का धर्मावलंबियों तथा सनकी आलोचकों से टकराव हुआ लेकिन वह आगे बढ़ते रहे। उन्होंने कहा ‘इलाके में घरेलू हिंसा बड़ा मुद्दा है। केंद्र में आने वाले छात्र अक्सर इसी समस्या के शिकार होते हैं। हम उन्हें लैंगिक भूमिकाओं के बारे में संवेदनशील बनाते हैं। लड़के अलग-अलग बैच में काम करते हैं और सामुदायिक किचन संभालते हैं। उनके लिए यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि महिलाओं को एक ही तरह की भूमिका में नहीं देखा जाना चाहिए।’ असीम आशा ने कहा कि उलेमाओं के साथ उनका टकराव हो चुका है। उन्हें गैरपरंपरागत तरीके से सीखने का विचार पसंद ही नहीं है। वह बच्चों को एक ही तरह की भूमिका में रखना चाहते हैं। लेकिन मैं उसके पक्ष में नहीं हूं।’ परेशानियों के बावजूद फाउंडेशन की इलाके में, खासतौर पर बच्चों में खासी पकड़ है।

फिल्म निर्माता बनने और एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी चलाने के इच्छुक, 18 वर्षीय अब्दुल करीम ने बताया ‘घर की माली हालत ठीक न होने की वजह से मैंने पढ़ाई छोड़ कर एक पैथलैब में काम शुरू कर दिया। लेकिन असीम सर ने मेरे परिवार को बताया कि शिक्षा कितनी जरूरी है। उन्होंने मुझे बताया कि पढ़ने के बाद कैसे मुझे अच्छा रोजगार मिल सकता है। मैं फिर से पढ़ने लगा और केंद्र में वृत्तचित्र की कक्षाएं भी जाने लगा।’ आर्थिक संकट से निपटने में फाउंडेशन को स्थानीय गैर सरकारी संगठनों से मदद मिली। उन्होंने बताया ‘सोशल मीडिया ने कई तरह के अवसर दिए हैं। फेसबुक, ट्विटर और अन्य नेटवर्किंग साइट्स से बहुत मदद मिली। राम वी सुतार, अरुणा वासुदेव, मुजफ्फर अली, महाश्वेता देवी, कमर डागर, पद्मश्री उस्ताद वसीफुद्दीन डागर आदि ने हमारे काम को सराहा और सहयोग दिया। जामिया मिलिया इस्लामिया हमें विभिन्न आयोजनों और कार्यशालाओं के लिए जगह देता है।’

 

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