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गुजरात की फैक्टरियों को मिल रहा दबा के पानी, लेकिन कच्छ और सौराष्ट्र के किसान झेल रहे सूखे की मार

गुजरात की फैक्टरियों और घेरलू उपयोग के लिए 11% पानी की सीमा तय की गई। लेकिन, यहां सिंचाई के लिए आंवटित पानी को हड़पकर फैक्टरियों तथा शहरों को मुहैया करा दिया गया। आज भी खेत पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस रहे हैं।

गुजरात के कच्छ और सौराष्ट्र में सूखे की मार सबसे ज्यादा है।हालांकि, विभिन्न सिंचाई परियोजनाओं के जरिए इन इलाकों को सूखे की मार से बचाने का रास्ता भी निकाला गया। लेकिन, आज किसानों के हिस्से का पानी क्षेत्र में स्थित फैक्टरियों को दे दिया जा रहा है। इंडियास्पेंड की एक रिपोर्ट के मुताबिक आज की तारीख में इन इलाकों में फैक्टरियों को दबा के पानी दिया जा रहा है, जबकि किसानों को अपने खेतों के लिए बूंद-बूंद के लिए तरसना पड़ रहा है।

गुजरात के सूखाग्रस्त इलाकों की बदहाली को दूर करने के लिए 1946 में ‘नर्मदा घाटी परियोजना’ को अमल में लाया गया। सिंचाई और हाइड्रो परियोजना को बड़े स्तर पर विस्तार देने के लिए ‘सरदार सरोवर’ और ‘नर्मदा सागर’ बांध का निर्माण किया गया और इसके अलावा 3,000 से अधिक छोटे बांध तथा नहरें बनाई गईं। गौरतलब है कि सौराष्ट्र और कच्छ में पानी खपत को देखते हुए सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई भी 300 फीट से बढ़ाकर 320 फीट कर दी गई। NWDT (नर्मदा वाटर डिस्प्यूट ट्रिब्यूनल) के तहत गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में पानी का बंटवारा किया गया। इसके तहत गुजरात के हिस्से में 30,414.62 MLD पानी आया।

गुजरात सरकार ने 11% (3,582.17 MLD) पानी विभिन्न उद्योगों और घरेलू इस्तेमाल के लिए अलग आवंटित किया दिया। इनमें कच्छ, उत्तरी गुजरात तथा सौराष्ट्र के क्षेत्र शामिल थे। मगर, नर्मदा कंट्रोल अथॉरिटी (1980 में स्थापित, जो NWDT के निर्देशों का लगू कराती है) के मुताबिक 2013 और 2016 के बीच गैर-कृषि योग्य पानी का उपभोग 11% से अधिक किया गया। 2016 में 18% से अधिक पानी का इस्तेमाल घरेलू एवं फैक्टरियों के लिए किया गया। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिली जानकारी में राज्य सरकार ने माना कि 2014 से 2018 के बीच मुंद्रा और कच्छ स्थित फैक्टरियों को नर्मदा घाटी परियोजना से 25MLD पानी मुहैया कराया गया। इसके अलावा अहमदाबाद और गांधी नगर के शहरों में 75 MLD पीने का पानी दिया गया। गौरतलब है कि इस पानी से करीब 22,502 हेक्टेअर जमीन की सिंचाई की जा सकती हैं।

रिकॉर्ड सूखे की मार झेल रहे कच्छ और सौराष्ट्र के कई क्षेत्र आज भी बारिश के पानी पर निर्भर हैं। 2017 के बाद से बारिश की हालत यहां तो और भी खराब है। व्यापक तौर पर देखें तो पिछले साल गुजरात में 19 फीसदी बारिश कम हुई। जबकि, सिर्फ अकेले कच्छ क्षेत्र की बात करें तो यहां पर 75 फीसदी कम बरिश हुई। कच्छा को 2011-12 और 2014-15 में सूखा प्रभावित क्षेत्र घोषित किया जा चुका है। सबसे बड़ी बात की 1901 के बाद 2018 में सबसे ज्यादा सूखे की मार झेल रहे इस क्षेत्र को बारिश का मौसम बीत जाने के बाद भी ‘सूखा प्रभावित’ घोषित करने में 3 महीने से ज्यादा वक्त लग गए। कई महीनों तक पानी की कमी से जूझने के बाद इस क्षेत्र के 16 जिलों के 51 तालुका को 17 दिसंबर, 2018 में सूखाग्रस्त घोषित किया गया।

कच्छ की बात करें तो यहां पर कृषि और पशुपालन ही व्यवसाय के मुख्य साधन हैं। यहां 72 फीसदी छोटे और सीमांत किसान हैं। इंडियास्पेंड की रिपोर्ट के मुताबिक यहां कि अधिकांश आबादी अपना कारोबार छोड़ शहरों की ओर पलायन कर चुकी है। कई गांव ऐसे हैं जहां पर लोगों की संख्या गिनती भर रह गई है। रिपोर्ट के मुताबिक यहां किसानों का गुस्सा इस बात पर सबसे ज्यादा है कि उनके हिस्से का पानी फैक्टरियों को क्यों दिया जा रहा है। कच्छ और सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित फैक्टरियों को 844.85 MLD पानी दिया जा रहा है, जबकि इसकी सीमा 6.75.88 MLD है। इस इलाके में स्थापित सभी उद्योगों की लाइफ-लाइन सरदार सरोवर बांध है, जबकि खेत तक पानी दूर की कौड़ी साबित हो रही है।

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